भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० न, कार्याश्रयकर्तृवधात् ॥ ६ ॥ न ब्रूम :—‘नित्यस्य सत्त्वस्य वधो हिंसा’, अपि त्वनुच्छित्तिधर्मकस्य सत्त्वस्य कार्याश्रयस्य शरीरस्य स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणामुपघातः पीडा, वैकल्यलक्षणः प्रबन्धोच्छेदो वा, प्रमापणलक्षणो वधो वा हिंसेति । कार्यं तु सुखदुःखवेदनम्, तस्यायतनमधिष्ठानमाश्रयः शरीरम्; कार्याश्रयस्य शरीरस्य स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणां वधो हिंसा, न नित्यस्यात्मनः । तत्र यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्' इत्येतदयुक्तम् । यस्य सत्त्वोच्छेदो हिंसा, तस्य कृतहानमकृताभ्यागमश्चेति दोषः । एतावच्चैतत् स्यात्—सत्त्वोच्छेदो वा हिंसा, अनुच्छित्तिधर्मकस्य सत्त्वस्य कार्याश्रयकर्तृवधो वा; न कल्पान्तरमस्ति । सत्त्वोच्छेदश्च प्रतिषिद्धः, तत्र किम- न्यच्छेषं यथाभूतमिति । अथ वा¹—कार्याश्रयकर्तृवधादिति, कार्याश्रयो देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घातः, नित्यस्यात्मानस्तत्र सुखदुःखप्रतिसंवेदनं तस्याधिष्ठानमाश्रयः तदायतनं तद् भवति न ततोऽन्यदिति स एव कर्ता । तन्निमित्ता हि सुखदुःखवेदनस्य निर्वृत्तिः उक्त प्रतिषेध उचित नहीं; क्योंकि हम शरीर तथा तदाश्रयभूत इन्द्रियों के उच्छेद को 'हिंसा' कहते हैं ॥ ६ ॥ हम ( आस्तिक दर्शनकार ) यह नहीं कहते कि नित्य द्रव्य का वध 'हिंसा' है, अपितु अनुच्छिन्न हो कर रहने वाले धर्म के सम्बन्धी आत्मा के कार्याश्रय शरीर का, तथा स्वविषयोपलब्धि की कर्ता इन्द्रियों का उपघात = पीड़ा, उनमें विकलता लाने वाला प्रवाहविच्छेद या विनाशलक्षण वध हमारे मत में हिंसा है। यहाँ सुखदुःखसंवेदन कार्य है, उसका अधिष्ठान = आश्रय शरीर है। ऐसे कार्याश्रय शरीर का, तथा स्वविषय ज्ञान को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों का वध 'हिंसा' है, न कि नित्य आत्मा का। अतः पूर्वपक्षी ने 'सात्मक शरीरप्रदाह में भी पातक नहीं होता; क्योंकि आत्मा नित्य है'— यह जो कहा था वह अयुक्तियुक्त है। एक बात और है—सत्त्वोच्छेद को ही हिंसा माना जाय तो अकृताभ्यागम आदि दोष हो सकता है। वह हम मानते नहीं, क्योंकि पूर्वपक्षी ने ही उसका खण्डन किया है। अतः हिंसापदार्थ कोई दूसरा ही मानना चाहिये। हिंसा दो तरह से ही बन सकती है—१. या तो सत्त्वोच्छेद को हिंसा माने; २. या फिर अनुच्छिन्नधर्मक के कार्याश्रयभूत शरीर या इन्द्रियों के उच्छेद को हिंसा मानें। तीसरा कोई विकल्प नहीं। यहाँ सत्त्वो- च्छेद का तो तुमने भी उसे नित्य मान कर प्रतिषेध ही कर दिया, अब दूसरे विकल्प वाली हिंसा मानने के अतिरिक्त कौन मार्ग है ? अथवा—'कार्याश्रयकर्तृवधात्' पद का व्याख्यान यों समझना चाहिये—कार्याश्रय हुआ देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घात । शरीर में रहने वाले नित्य आत्मा के सुखदुःखप्रतिसंवेदन कार्य हैं, अतः उनका सङ्घात अधिष्ठान है, वही संघात तदायतन है अन्यायतन नहीं, १. वार्त्तिककर्तुरप्यत्रैव व्याख्यानपक्षे सम्मतिरिति ध्येयम् ।