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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० न, कार्याश्रयकर्तृवधात् ॥ ६ ॥ न ब्रूम :—‘नित्यस्य सत्त्वस्य वधो हिंसा’, अपि त्वनुच्छित्तिधर्मकस्य सत्त्वस्य कार्याश्रयस्य शरीरस्य स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणामुपघातः पीडा, वैकल्यलक्षणः प्रबन्धोच्छेदो वा, प्रमापणलक्षणो वधो वा हिंसेति । कार्यं तु सुखदुःखवेदनम्, तस्यायतनमधिष्ठानमाश्रयः शरीरम्; कार्याश्रयस्य शरीरस्य स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणां वधो हिंसा, न नित्यस्यात्मनः । तत्र यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्' इत्येतदयुक्तम् । यस्य सत्त्वोच्छेदो हिंसा, तस्य कृतहानमकृताभ्यागमश्चेति दोषः । एतावच्चैतत् स्यात्—सत्त्वोच्छेदो वा हिंसा, अनुच्छित्तिधर्मकस्य सत्त्वस्य कार्याश्रयकर्तृवधो वा; न कल्पान्तरमस्ति । सत्त्वोच्छेदश्च प्रतिषिद्धः, तत्र किम- न्यच्छेषं यथाभूतमिति । अथ वा¹—कार्याश्रयकर्तृवधादिति, कार्याश्रयो देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घातः, नित्यस्यात्मानस्तत्र सुखदुःखप्रतिसंवेदनं तस्याधिष्ठानमाश्रयः तदायतनं तद् भवति न ततोऽन्यदिति स एव कर्ता । तन्निमित्ता हि सुखदुःखवेदनस्य निर्वृत्तिः उक्त प्रतिषेध उचित नहीं; क्योंकि हम शरीर तथा तदाश्रयभूत इन्द्रियों के उच्छेद को 'हिंसा' कहते हैं ॥ ६ ॥ हम ( आस्तिक दर्शनकार ) यह नहीं कहते कि नित्य द्रव्य का वध 'हिंसा' है, अपितु अनुच्छिन्न हो कर रहने वाले धर्म के सम्बन्धी आत्मा के कार्याश्रय शरीर का, तथा स्वविषयोपलब्धि की कर्ता इन्द्रियों का उपघात = पीड़ा, उनमें विकलता लाने वाला प्रवाहविच्छेद या विनाशलक्षण वध हमारे मत में हिंसा है। यहाँ सुखदुःखसंवेदन कार्य है, उसका अधिष्ठान = आश्रय शरीर है। ऐसे कार्याश्रय शरीर का, तथा स्वविषय ज्ञान को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों का वध 'हिंसा' है, न कि नित्य आत्मा का। अतः पूर्वपक्षी ने 'सात्मक शरीरप्रदाह में भी पातक नहीं होता; क्योंकि आत्मा नित्य है'— यह जो कहा था वह अयुक्तियुक्त है। एक बात और है—सत्त्वोच्छेद को ही हिंसा माना जाय तो अकृताभ्यागम आदि दोष हो सकता है। वह हम मानते नहीं, क्योंकि पूर्वपक्षी ने ही उसका खण्डन किया है। अतः हिंसापदार्थ कोई दूसरा ही मानना चाहिये। हिंसा दो तरह से ही बन सकती है—१. या तो सत्त्वोच्छेद को हिंसा माने; २. या फिर अनुच्छिन्नधर्मक के कार्याश्रयभूत शरीर या इन्द्रियों के उच्छेद को हिंसा मानें। तीसरा कोई विकल्प नहीं। यहाँ सत्त्वो- च्छेद का तो तुमने भी उसे नित्य मान कर प्रतिषेध ही कर दिया, अब दूसरे विकल्प वाली हिंसा मानने के अतिरिक्त कौन मार्ग है ? अथवा—'कार्याश्रयकर्तृवधात्' पद का व्याख्यान यों समझना चाहिये—कार्याश्रय हुआ देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घात । शरीर में रहने वाले नित्य आत्मा के सुखदुःखप्रतिसंवेदन कार्य हैं, अतः उनका सङ्घात अधिष्ठान है, वही संघात तदायतन है अन्यायतन नहीं, १. वार्त्तिककर्तुरप्यत्रैव व्याख्यानपक्षे सम्मतिरिति ध्येयम् ।

८. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८१

८. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८१ न तमन्तरेणेति । तस्य वधः, उपघातः, पीडा, प्रमापणं वा = हिंसा, न नित्यत्वे- नात्मोच्छेदः। तत्र यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्', एतन्नेति ॥ ६ ॥ प्रासङ्गिकं चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् [ ७-१४ ] २. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा; सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥ पूर्वपरयोर्विज्ञानयोरेकविषये प्रतिसन्धिज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम्—'तमेवैतर्हि पश्यामि यमज्ञासिषं स एवायमर्थः' इति, सव्येन चक्षुषा दृष्टस्येतरेणापि चक्षुषा प्रत्यभिज्ञानाद् 'यमद्राक्षं तमेवैतर्हि पश्यामि' इति । इन्द्रियचैतन्ये तु नान्यदृष्ट- मन्यः प्रत्यभिजानातीति प्रत्यभिज्ञानुपपत्तिः । अस्ति त्विदं प्रत्यभिज्ञानम्, तस्मा- दिन्द्रियव्यतिरिक्तश्चेतनः ॥ ७ ॥ नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ? ॥ ८ ॥ एकमिदं चक्षुर्मध्ये नासास्थिव्यवहितम्, तस्यान्तौ गृह्यमाणौ द्वित्वाभिमानं प्रयोजयतो मध्यव्यवहितस्य दीर्घस्येव ? ॥ ८ ॥ अतः वही ( देहेन्द्रियसंधात ) कर्ता है, उक्त संवेदन की निवृत्ति तन्निमित्तक ही है, न कि उसके बिना । अतः उस देहेन्द्रियसंधात का वध = उपघात, पीड़ा, हिंसा, प्रमापण ( प्राणवियोजन ) बन सकता है । नित्य आत्मा का उच्छेद नहीं बनता । यों, 'सात्मक शरीर के प्रदाह में पातक नहीं होता'—यह पूर्वपक्षी का कथन अयुक्तियुक्त ही है॥६॥ २. इस कारण भी आत्मा देहादि से व्यतिरिक्त है— वाम चक्षु द्वारा देखे गये का दक्षिण चक्षु से प्रत्यभिज्ञान होने के कारण ॥ ७ ॥ पूर्व, पर के विज्ञान का एक विषय में प्रतिसन्धिज्ञान 'प्रत्यभिज्ञान' कहलाता है । जैसे—'अब मैं उसी अर्थ को देख रहा हूँ, जिसे मैंने पहले जान लिया था, यह वही विषय है' । वायीं आँख द्वारा देखे गये का दूसरी (दाहिनी) आँख द्वारा 'जिसको मैंने पहले देखा था अब उसीको देख रहा हूँ'—ऐसा प्रत्यभिज्ञान होने से । इन्द्रियचैतन्य मानने पर इन्द्रियों में भिन्नत्व होने से अन्य इन्द्रिय द्वारा दृष्ट का अन्य इन्द्रिय प्रत्यभिज्ञान नहीं कर सकती अतः, उक्त प्रत्यभिज्ञान नहीं बनेगा । जब कि यह प्रत्यभिज्ञान होता है, अतः यह सिद्ध है कि चेतन इन्द्रियों से व्यतिरिक्त है ॥ ७ ॥ उक्त प्रत्यभिज्ञान वास्तविक नहीं; अपितु एक चक्षुरिन्द्रिय में नासास्थि के व्यवधान से द्वित्व का भ्रम हो जाता है ? ॥ ८ ॥ यह एक ही चक्षु, बीच में नासास्थि ( नाक की हड्डी ) के व्यवधान से उस की दोनों कोटियों ( अन्तों ) के गृह्यमाण होने के कारण दो की तरह प्रमाता द्वारा प्रमित होता है, जैसे—एक ही लम्बे बाँस के मध्यभाग को लेकर दो किनारों की कल्पना कर लेते हैं ? ॥ ८ ॥

१८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० एकविनाशे द्वितीयाविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥ एकस्मिन्नुपहते चोद्धृते वा चक्षुषि द्वितीयमवतिष्ठते चक्षुर्विषयग्रहणलिङ्गम् । तस्मादेकस्य व्यवधानानुपपत्तिः ॥ ९ ॥ अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ? ॥ १० ॥ एकविनाशे द्वितीयाविनाशादित्यहेतुः । कस्मात् ? वृक्षस्य हि कासुचिच्छा- खासु छिन्नासूपलभ्यत एव वृक्षः ? ॥ १० ॥ दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥ न कारणद्रव्यस्य विभागे कार्यद्रव्यमवतिष्ठते; नित्यत्वप्रसङ्गात् । बहुष्वव- यविषु यस्य कारणानि विभक्तानि तस्य विनाशः, येषां कारणान्यविभक्तानि तानि अवतिष्ठन्ते । अथवा, दृश्यमानार्थविरोधो दृष्टान्तविरोधः । मृतस्य हि शिरःकपाले द्वाव- वटौ नासास्थिव्यवहितौ चक्षुषः स्थाने भेदेन गृह्येते । न चैतदेकस्मिन्नासास्थि- व्यवहिते सम्भवति । एक का विनाश होने पर भी अन्य विनाश न होने से एकत्वसिद्धि नहीं ॥ ९ ॥ एक चक्षु के नष्ट होने या निकाल लेने पर भी दूसरी रहती है; क्योंकि प्रमाता उस समय भी दूसरी अवशिष्ट चक्षु से विषय को गृहीत करता हुआ देखा जाता है। इसलिए 'नासिकास्थि के व्यवधान से वहाँ द्वित्वभ्रम हो रहा हैं'-ऐसा मानना अयुक्तियुक्त है ॥ ९ ॥ शङ्का-( आपका उक्त हेतु भी नहीं बनता; क्योंकि ) लोक में अवयव के खण्डित होने पर भी अवयवी से काम चलता हुआ देखा जाता है ? ॥ १० ॥ एक के नाश होने पर भी दूसरे का नाश नहीं होता—अतः आपका हेतु असिद्ध है। जैसे वृक्ष की कुछ शाखाएँ काट दी जाने पर भी वह वृक्ष ही कहलाता है। तथा प्रमाता को पूर्ववत् अर्थसाधन में कोई बाधा न होगी ? ॥ १० ॥ समाधान- विरुद्ध दृष्टान्त देकर प्रतिषेध नहीं किया जा सकता ॥ ११ ॥ कारणद्रव्य के विभाग (विनाश) हो जाने पर कार्य द्रव्य की सत्ता नहीं रह जाती; अन्यथा वह कार्य द्रव्य नित्य हो जायेगा । जहाँ बहुत से अवयवी हैं, उनमें जिसके कारण नष्ट हो गये उसका नाश हो गया । जिनके कारण नष्ट नहीं हुए वे अवस्थित रहते हैं। उक्त दृष्टा में 'पहले जैसा यह वृक्ष'-ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं; अपितु 'कटी शाखा वाला वृक्ष'—ऐसा प्रत्यभिज्ञान होता है । अथवा, इस सूत्र का व्याख्यान यों है—यहाँ प्रत्यक्ष दृश्यमान अर्थ का विरोध होने से 'दृष्टान्तविरोध' हो गया ! मृतक के कङ्कालस्थ शिरःकपाल में नासास्थि से व्यवहित

१३. सू० ] । चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८४

१३. सू० ] । चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८४ अथ वा, एकविनाशस्यानियमाद् द्वाविमावर्थौ, तौ च पृथगावरणोपघातौ अनुमीयेते—विभिन्नाविति । अवपीडनाच्चैकस्य चक्षुषो रश्मिविषयसन्निकर्षस्य भेदाद् दृश्यभेद इव गृह्यते, तच्चैकत्वे विरुध्यते । अवपीडननिवृत्तौ चाभिन्नप्रतिसन्धानमिति । तस्मा- देकस्य व्यवधानानुपपत्तिः ॥ ११ ॥ ३. अनुमीयते चायं देहादिसङ्घातव्यतिरिक्तश्चेतन इति; इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥ कस्यचिदम्लफलस्य गृहीततद्रससाहचर्ये रूपे गन्धे वा केनचिदिन्द्रियेण गृह्यमाणे रसनस्येन्द्रियान्तरस्य विकारो रसानुस्मृतौ रसगद्ध्प्रिवृत्तितोदन्तोदक- सम्प्लवभूतो गृह्यते । तस्येन्द्रियचैतन्येऽनुपपत्तिः, नान्यदृष्टमन्यः स्मरति ॥१२॥ न; स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात् ? ॥ १३ ॥ स्मृतिर्नाम धर्मो निमित्तादुत्पद्यते, तस्याः स्मर्त्तव्यो विषयः, तत्कृत इन्द्रिया- चक्षु के दो छिद्र (गड्ढे) अलग-अलग देखे जाते हैं । चक्षु के एक मानने पर, नासास्थि के व्यवधान से ये दो छिद्र कैसे होते ! अथवा—'एक का विनाश दूसरे की स्थिति या विनाश का नियामक नहीं होता' इस सिद्धान्त से ये चक्षु दो हैं, इन दोनों के अपने पृथक्-पृथक् आवरण और विनाश हैं, अतः अनुमान होता है कि ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। एक आंख को अंगुली से अवपीड़ित करने (कौंचने) पर उसी एक के रश्मिविषयक सन्निकर्ष का भेद होने से सीमित मात्रा में दृश्यभेद (एक चांद के दो चांद दिखायी देना आदि) दिखायी देता है, अवपीडन के निवृत्त होने पर वह भेद भी निवृत्त हो जाता है— यह बात चक्षु के एकत्वसिद्धान्त में कैसे बनेगी । अतः एक में व्यवधानहेतु अनुपपन्न ही है ॥ ११ ॥ ३. इसलिए भी इस आत्मा का देहादिसङ्घात से पार्थक्य अनुमित होता है— इन्द्रियान्तर में विकार होने से ॥ १२ ॥ किसी आम-इत्यादि खट्टे फल का पहले से रससाहचर्य गृहीत होने पर, किसी अन्य इन्द्रिय द्वारा रूप या गन्ध के जान लेने के बाद इसकी अनुस्मृति होने पर दूसरी इन्द्रिय रसना में अम्लरस की तृष्णा से जनित विकार (मुंह में पानी भर आना) देखा जाता है । यह बात, इन्द्रियचैतन्य मानने पर कैसे बनेगी; क्योंकि अन्य द्वारा देखे गये का अन्य कैसे स्मरण कर सकता है ! ॥ १२ ॥ शङ्का— स्मृति के स्मर्त्तव्यविषयक होने से उससे आत्मा का पार्थक्य सिद्ध नहीं होता ॥१३॥ स्मृति नामक धर्म अपने संस्कारकारण से उत्पन्न होता है, स्मर्त्तव्य उसका विषय है । उक्त इन्द्रियान्तरविकार तत्स्मृतिप्रयुक्त है, आत्मकृत नहीं ? ॥ १३ ॥

१८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० न्तरविकारो नात्मकृत इति¹ ? ॥ १३ ॥ तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ तस्या आत्मगुणत्वे सति सद्भावादप्रतिषेध आत्मनः । यदि स्मृतिरात्म- गुणः ? एवं सति स्मृतिरुपपद्यते, नान्यदृष्टमन्यः स्मरतीति । इन्द्रियचैतन्ये तु नानाकर्तृकाणां विषयग्रहणानामप्रतिसन्धानम्, अप्रतिसन्धाने वा विषयव्यवस्था- नुपपत्तिः । एकस्तु चेतनोऽनेकार्थदर्शी भिन्ननिमित्तः पूर्वदृष्टमर्थं स्मरतीति एक- स्यानेकार्थदर्शिनो दर्शनप्रतिसन्धानात् स्मृतेरात्मगुणत्वे सति सद्भावः, विपर्यये चानुपपत्तिः । स्मृत्याश्रयाः प्राणभृतां सर्वे व्यवहाराः । आत्मलिङ्गम् उदाहरण- मात्रमिन्द्रियान्तरविकार इति । अपरिसङ्ख्यानाच्च स्मृतिविषयस्य² । अपरिसङ्ख्याय च स्मृतिविषयमिदमुच्यते 'न स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात्' इति । येयं स्मृतिर्गृह्यमाणेऽर्थे 'अज्ञासिषमहममुमर्थम्' इति, एतस्या ज्ञातृज्ञानवि- समाधान— उस स्मृति को आत्म-धर्म मानने से आपकी शंका नहीं उठेगी ॥ १४ ॥ उस स्मृति को आत्मा का गुण मानते हैं, क्योंकि आत्मा स्मृति का समवाय सम्बन्ध से आधार है । अतः स्मृति की सत्ता मानने पर आत्मा का प्रतिषेध नहीं बनता; क्योंकि स्मृति को जब आत्मा का धर्म मानोगे तभी वह उसका धर्म बनेगी; अन्यथा अन्य दृष्ट का अन्य स्मरण कैसे करेगा ! इन्द्रियचैतन्य मानने पर, नाना इन्द्रियों द्वारा गृहीत विषयों का प्रतिसन्धान कैसे बनेगा ! प्रतिसन्धान न बनने पर विषय-व्यवस्था कैसे बनेगी ! एक चेतन मान लेते हो तो वह अनेकार्थदर्शी है, भिन्ननिमित्त है, पूर्वदृष्ट अर्थ को स्मरण कर लेता है, अतः अनेकार्थदर्शी का एक में दर्शनप्रतिसन्धान बन जाने से, स्मृति के आत्मगुण मान लेने पर, स्मृति होने पर आत्मा को उस रस की अनुभूति होगी, स्मृति न रहने पर नहीं होगी । क्योंकि सभी प्राणियों के व्यवहार स्मृत्याश्रित हैं । इन्द्रि- यान्तरविकार का यह प्रयोजक स्मृतिरूप आत्मगुण एक उदाहरण दिखा दिया है, अन्य उदाहरणों की उत्प्रेक्षा कर लेना चाहिये । स्मृतिविषय का परिकलन ( कर्त्ता, कर्म क्रिया का प्रतिसन्धान ) न होने से भी वह आत्मा का ही गुण है । स्मृतिविषयों का परिकलन न करके भी आप कहते हैं—'स्मृति स्मर्त्तव्यविषया होती है, न कि आत्मविषया'। वर्तमान में अगृह्यमाण अर्थ की 'यह अर्थ मैं जानता १. 'स्मृतेरात्मा न कारणम्, तस्याः संस्कारकारणकत्वात्; न स्मृतेरात्मा विषयः, स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात्; तस्मात् स्मृत्यादिविषयादिन्द्रियान्तरविकारो नात्मकृतः'—इति शंकाकर्त्तुराशयः. २. इदं सूत्रमेवेति केचित् ।

१४. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८५

१४. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८५ शिष्टः पूर्वज्ञातोऽर्थो विषयो नार्थमात्रम्, 'ज्ञातवानहममुमर्थम्, असावर्थो मया ज्ञातः, अस्मिन्नर्थे मम ज्ञानमभूत्' इति चतुर्विधमेतद्वाक्यं स्मृतिविज्ञापकं समानार्थम् । सर्वत्र खलु ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं च गृह्यते । अथ प्रत्यक्षेऽर्थे या स्मृतिस्तया त्रीणि ज्ञानानि एकस्मिन्नर्थे प्रतिसन्धीयन्ते समानकर्तृकाणि, न नानाकर्तृकाणि, नाकर्तृकाणि, किं तर्हि ? एककर्तृकाणि- 'अद्राक्षममुमर्थं यमेवैतर्हि पश्यामि' । अद्राक्षमिति दर्शनं दर्शनसंविच्च, न खल्व- संविदिते स्वे दर्शने स्यादेतत् 'अद्राक्षम्' इति, ते खल्वेते द्वे ज्ञाने; 'यमेवैतर्हि पश्यामि' इति तृतीयं ज्ञानम्, एवमेकोऽर्थस्त्रिभिर्ज्ञानैर्यूज्यमानो नाकर्तृको न नानाकर्तृकः, किं तर्हि ? एककर्तृक इति । सोऽयं स्मृतिविषयोऽपरिसङ्ख्यायमानो विद्यमानः प्रज्ञातोऽर्थः प्रतिषिध्यते- 'नास्त्यात्मा स्मृतेः स्मर्तव्यविषयत्वात्' इति । न चेदं स्मृतिमात्रं स्मर्तव्यमात्र- विषयं वा। इदं खलु ज्ञानप्रतिसन्धानवद् स्मृतिप्रतिसन्धानम्; एकस्य सर्वविषय- त्वात् । एकोऽयं ज्ञाता सर्वविषयः स्वानि ज्ञानानि प्रतिसन्धत्ते-अमुमर्थं ज्ञास्यामि, अमुमर्थं विजानामि, अमुमर्थमज्ञासिषम्, अमुमर्थं जिज्ञासमानश्चिरमज्ञात्वाऽध्य- था'—यह स्मृति अर्थमात्र नहीं; अपितु ज्ञातृज्ञानविशिष्ट पूर्वज्ञात अर्थ इसका विषय है। 'इस अर्थ को मैं जान चुका', 'यह अर्थ मेरे द्वारा जाना गया', 'इस विषय में मेरा ज्ञान था'—ये चारों वाक्य स्मृतिविषयज्ञापक तुल्य ही हैं, अर्थात् उक्त चारों वाक्यों का ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता तीनों का समान ज्ञान होता है। एक बात और सुनिये—प्रत्यक्ष अर्थ की स्मृति में ज्ञानत्रय का एक साथ समान- कर्तृक प्रतिसन्धान होता है, वे ज्ञान न तो नानाकर्तृक हैं न अकर्तृक ही; अपितु एक- कर्तृक हैं। 'इस अर्थ को मैंने पहले भी देखा था जिसको कि अब देख रहा हूँ' यहाँ 'देखा था' यह दर्शन तथा दर्शनसंवित्—दो चीज एकत्र हैं; क्योंकि 'देखा था' यह प्रत्यभिज्ञान असंविदित स्वदर्शन में नहीं हो सकता। यों, ये दो ज्ञान हुए। तीसरा ज्ञान है 'जिसको कि मैं अब देख रहा हूँ'। इस प्रकार एक ही अर्थ तीन ज्ञानों से युक्त होता हुआ न तो अकर्तृक हो सकता है, न नानाकर्तृक ही होगा। यों यह अपरिसंख्यायमान स्मृतिविषय, प्रमाणों द्वारा सिद्धार्थ है, विद्यमान है; फिर भी पूर्वपक्षी नास्तिक द्वारा खण्डित किया जा रहा है कि 'स्मृति हेतु से आत्मा की सिद्धि नहीं बनेगी; क्योंकि स्मृति तो स्मर्तव्यविषया हैं' ! हम कहते हैं—न तो यह स्मृतिमात्र है, और न स्मर्तव्यविषयमात्र है; यह तो ज्ञानप्रतिसन्धान की तरह स्मृतिप्रतिसन्धान है; क्योंकि यहाँ एक (आत्मा) ही सभी विषयों का ग्राहक है। यह एक ज्ञाता (आत्मा) सब विषयों वाला है, अतः अपने ज्ञानों का प्रतिसन्धान करता है—'इस अर्थ को जानूँगा', 'इस अर्थ को जानता हूँ', 'इस अर्थ को जानता था'। अमुक अर्थ को जानने को इच्छा

१८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० वस्यति-‘अज्ञासिषम्’ इति। एवं स्मृतिमपि त्रिकालविशिष्टां सुस्मूर्षाविशिष्टां च प्रतिसन्धत्ते। संस्कारसन्ततिमात्रे तु सत्त्वे उत्पद्योत्पद्य संस्कारास्तिरोभवन्ति । स नास्त्येकोऽपि संस्कारो यस्त्रिकालविशिष्टं ज्ञानं स्मृतिं चानुभवेत् । न चानुभव- मन्तरेण ज्ञानस्य स्मृतेश्च प्रतिसन्धानमहं ममेति चोत्पद्यते, देहान्तरवत्। अतोऽ- नुमीयते-‘अस्त्येकः सर्वविषयः प्रतिदेहं स्वज्ञानप्रबन्धं स्मृतिप्रबन्धं च प्रतिसन्धत्ते’ इति। यस्य देहान्तरेषु वृत्तेरभावान्न प्रतिसन्धानं भवतीति ॥ १४ ॥ आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् [ १५-१७ ] न; आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात् ? ॥ १५ ॥ न देहादिसङ्घातव्यतिरिक्त आत्मा। कस्मात् ? आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात् । ‘दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्’ ( ३.१.१. ) इत्येवमादीनामात्म- प्रतिपादकानां हेतूनां मनसि सम्भवः; यतः मनो हि सर्वविषयमिति । तस्मान्न शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिसङ्घातव्यतिरिक्त आत्मेति ? ॥ १५ ॥ ज्ञातुर्ज्ञानसाधनोपपत्तेः संज्ञाभेदमात्रम् ॥ १६ ॥ करता हुआ बहुत देर तक कोई एकतरफा फैसला न करके अन्त में अचानक निश्चय करता है कि 'अरे, इसे तो मैं जानता था !' इसी तरह त्रिकालविशिष्ट तथा स्मरणेच्छा- विशिष्ट स्मृति का भी यह आत्मा प्रतिसन्धान करता है। स्मृत्यनुभवक्रियाकारक को संस्कार-सन्ततिधारामात्र मानेंगे तो संस्कार उत्पन्न हो हो कर विनष्ट हो जाते हैं, तो ऐसा एक भी संस्कार कहाँ मिलेगा जो त्रिकालविशिष्ट ज्ञान तथा स्मृति का अनुभव कर सके ! अनुभव के बिना ज्ञान तथा स्मृति का देहान्तर में 'मैं—मेरा' ऐसे प्रतिसन्धान की तरह प्रतिसन्धान बन नहीं सकता । अतः अनुमान होता है—अवश्य कोई एक प्रमाता है जो बाह्यान्तरभूत सब विषयों का ग्राहक है, तथा अपने प्रत्येक देह में ज्ञानप्रबन्ध तथा स्मृतिप्रबन्ध का चिन्तन करता है। जिसकी देहान्तर में वृत्ति न मानेंगे तो यह ज्ञान-स्मृतिचिन्तन सिद्ध नहीं होगा ॥ १४ ॥ शंका— आत्मा नहीं है, आत्मा के साधक हेतुओं के मन में सम्भव होने से ? ॥ १५ ॥ देहादिसंघात से अतिरिक्त आत्मा नहीं हैं; क्योंकि सिद्धान्ती द्वारा आत्मा के साधन में दिये गये हेतुओं से मन का ही सम्बन्ध है। 'दर्शन-स्पर्शन द्वारा एक अर्थ के ग्रहण से' ( ३. १. १. ) आदि हेतुओं से आत्मा के स्थान में मनकी ही सिद्धि हो पायेगी; क्योंकि मन भी सर्व विषय का ग्राहक है। अतः हम यह क्यों न मान लें—'शरीरेन्द्रियमनोबुद्धि- संघात से पृथक् कोई आत्मा नामक पदार्थ नहीं हैं' ? ॥ १५ ॥ उत्तर— ज्ञाता से ज्ञानसाधन उपपन्न होने के कारण यह संज्ञाभेदमात्र है ॥ १६ ॥

१७. सू० ] आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् १८७

१७. सू० ] आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् १८७ ज्ञातुः खलु ज्ञानसाधनान्युपपद्यन्ते—चक्षुषा पश्यति, घ्राणेन जिघ्रति, स्पर्श- नेन स्पृशति । एवं मन्तुः सर्वविषयस्य मतिसाधनं मनःकरणभूतं सर्वविषयं विद्यते येनायं मन्यत इति । एवं सति ज्ञातर्यात्मसंज्ञा न मृष्यते, मनःसंज्ञाऽभ्यनु- ज्ञायते; मनसि च मनःसंज्ञा न मृष्यते, मतिसाधनंत्वभ्यनुज्ञायते, तदिदं संज्ञा- भेदमात्रम्, नार्थे विवाद इति । प्रत्याख्याने वा सर्वेन्द्रियविलोप्रप्रसङ्गः । अथ मन्तुः सर्वविषयस्य मति- साधनं सर्वविषयं प्रत्याख्यायते नास्तीति ? एवं रूपादिर्विषयग्रहणसाधनान्यपि न सन्ति इति सर्वेन्द्रियविलोप्रः प्रसज्यत इति ॥ १६ ॥ नियमश्च निरनुमानः ॥ १७ ॥ योऽयं नियम इष्यते—'रूपादिग्रहणसाधनान्यस्य सन्ति, मतिसाधनं सर्वविषयं नास्ति' इति, अयं नियमो निरनुमानः । नात्रानुमानमस्ति येन नियमं प्रतिपद्यामह इति । ज्ञाता से ज्ञानसधनों को प्रामाण्य मिलता है, जैसे—'आंख से देखता हैं', 'नाक से सूंघता हैं', त्वक् से स्पर्श करता हैं'। इसी तरह मन्ता ( चक्षुरादिकरण-दर्शनक्रिया- कर्ता ) से सर्वविषयक मतिसाधन उपपन्न होते हैं, उनमें मन भी उसकी मति में साधन है, जिससे वह सब विषयों पर मनन करता है, तो मन की स्वीकृति से आत्मा का प्रतिषेध कैसे कर सकोगे ! यह कैसी विडम्बना है कि अपनी पराजय छिपाने के लिये उस ज्ञाता को 'मन' संज्ञा तो दे देना चाहते हो, पर उसे 'आत्मा' मानने में आपको संकोच लग रहा है ! मन को भी 'मन' नाम नहीं देना चाहते, पर उस का मतिसाधनत्व स्वीकार करते चले आ रहे हो ! तो यह केवल नाम पर अडंगा लगाया जा रहा है, आत्मा की सत्ता तो आप को भी स्वीकार है ही । और यदि आत्मा के प्रतिषेध पर ही तुले हुए हो तो आपके मत में सब इन्द्रियों के विलोप ( अभाव ) की स्थिति आ पड़ेगी ! क्योंकि सर्वविषयग्राहक मन्ता का मतिसाधन तथा उसके सर्वविषयक प्रत्याख्यान पर आग्रह करोगे तब भी इन्द्रियविलोप की स्थिति का सामना करना अभीष्ट है तो इस तरह रूपादिविषयज्ञान के साधन ही न रह जायेंगे, अतः इन्द्रियविलोप स्पष्ट ही है ॥ १६ ॥ यह नियम अनुमान प्रमाण से सिद्ध नहीं होता ॥ १७ ॥ यह जो नियम बनाना चाह रहे हो—'ज्ञाता के रूपादिविषय ज्ञान के साधन तो हैं, परन्तु मतिसाधन (सुखादिज्ञानकरण, मन ) सर्वविषय वाला नहीं हैं', यह नियम नहीं बनेगा; क्योंकि यह निरनुमान है। अर्थात् ऐसा कोई अनुमान नहीं, जिससे इस नियम को प्रमाणित कर सकें। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

पादित कर देने पर भी उसके नित्यत्व के बारे में अभी संदेह निवृत्त नहीं हुआ ?

१८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० रूपादिभ्यश्च विषयान्तरं सुखादयः, तदुपलब्धौ करणान्तरसद्भावः। यथा चक्षुषा गन्धो न गृह्यत इति करणान्तरं घ्राणम्, एवं चक्षुर्घाणाभ्यां रसो न गृह्यत इति करणान्तरं रसनम्, एवं शेषेष्वपि । तथा चक्षुरादिभिः सुखादयो न गृह्यन्त इति करणान्तरेण भवितव्यम् । तच्च ज्ञानायौगपद्यलिङ्गम् । यच्च सुखाद्युपलब्धौ करणं तच्च ज्ञानायौगपद्यलिङ्गम्, तस्येन्द्रियमिन्द्रियं प्रति सन्निधे- रसन्निधेश्च न युगपज्ज्ञानान्युत्पद्यन्ते इति । तत्र यदुक्तम्—'आत्मप्रतिपत्तिहेतूनां मनसि सम्भवात्' इति तदयुक्तम् ॥ १७ ॥ आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १८-२६ ] किं पुनरयं देहादिसङ्घातादन्यो नित्यः ? उतानित्य इति ? कुतः संशयः ? उभयथा दृष्टत्वात् संशयः । विद्यमानमुभयथा भवति— नित्यम्, अनित्यं च । प्रतिपादिते चात्मसद्भावे संशयानिवृत्तेरिति । आत्मसद्भावहेतुभिरेवास्य प्राग्देहभेदादवस्थानं सिद्धमूर्ध्वमपि देहभेदाद- वतिष्ठते । कुतः ? पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः ॥ १८ ॥ रूपादि से सुखादि भिन्न विषय हैं, उनके ज्ञान के लिये अलग एक साधन (इन्द्रिय) मानना ही पड़ेगा । जैसे चक्षु से गन्धज्ञान नहीं हो पाता, अतः उस ज्ञान के लिए पृथक् एक घ्राणेन्द्रिय माननी पड़ती है । तथा चक्षु और घ्राण से रसज्ञान नहीं होता, उसके लिये इन्द्रियान्तर रसनेन्द्रिय माननी पड़ती है। बाकी इन्द्रियों की आवश्यकता के बारे में भी यही समझ लेना चाहिये । इसी प्रकार चक्षु-आदि से सुखादि ज्ञान गृहीत नहीं हो सकता, अतः उक्त ज्ञान के लिये इन्द्रियान्तर मानना ही पड़ेगा । वह इन्द्रिय ज्ञानायौग- पद्य हेतु वाली ( मन ) है । जो इन्द्रिय सुखाद्युपलब्धि में कारण ( साधन ) है वही ज्ञानायौगपद्य हेतु वाली है। प्रत्येक इन्द्रिय के साथ इस इन्द्रिय के सामीप्य या असामीप्य से ज्ञान उत्पन्न या अनुत्पन्न होते रहते हैं । अतः आपका यह कहना सर्वथा अनुचित है कि 'आत्मप्रतिपादक हेतुओं का मन से सम्बन्ध होने से मन सिद्ध होता है, आत्मा नहीं' ॥ १७ ॥ क्या यह आत्मा देहादिसंघात से अन्य होता हुआ नित्य है; या अनित्य ? यह संशय क्यों है ? क्योंकि लोक में दोनों ही नय देखे जाने से यहाँ संशय हो गया । लोक में, विद्यमान प्रमाणसिद्ध वस्तु नित्य भी देखी जाती है, अनित्य भी । आत्मा की सत्ता प्रति- पादित कर देने पर भी उसके नित्यत्व के बारे में अभी संदेह निवृत्त नहीं हुआ ? आत्मसत्ताप्रतिपादक हेतुओं से आत्मा की अवस्थिति देहादि से पूर्व सिद्ध हो चुकी, उन्हीं हेतुओं से वह देहादिनाश के बाद भी अवस्थित हैं, क्यों ?— पूर्वजन्माभ्यस्त स्मृत्यनुबन्ध से उत्पन्न हर्ष, भय, शोक आदि के सम्प्रतिपन्न होने से ॥ १८ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१९. सू० ] . आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १८९

१९. सू० ] . आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १८९ जातः खल्वयं कुमारकोऽस्मिन् जन्मन्यगृहीतेषु हर्षभयशोकहेतुषु हर्षभय- शोकान् प्रतिपद्यते लिङ्गानुमेयान् । ते च स्मृत्यनुबन्धादुत्पद्यन्ते, नान्यथा । स्मृत्यनुबन्धश्च पूर्वाभ्यासमन्तरेण न भवति । पूर्वाभ्यासश्च पूर्वजन्मनि सति, नान्यथेति सिद्धयत्येतत्—अवतिष्ठतेऽयमूर्ध्वं शरीरभेदादिति ॥ १८ ॥ पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवत् तद्विकारः ? ॥ १९ ॥ यथा पद्मादिष्वनित्येषु प्रबोधसम्मीलनं विकारो भवति, एवमनित्यस्यात्मनो हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तिर्विकारः स्यात् ? हेत्वभावादयुक्तम् । अनेन हेतुना पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवदनित्य- स्यात्मनो हर्षादिसम्प्रतिपत्तिरिति नात्रोदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतु; न वैधर्म्यादस्ति, हेत्वभावाद् असम्बद्धार्थकमपार्थकमुच्यते इति । दृष्टान्ताच्च हर्षादिनिमित्तस्यानिवृत्तिः । या चेयमासेवितेषु विषयेषु हर्षा- दिसम्प्रतिपत्तिः स्मृत्यनुबन्धकृता प्रत्यात्मं गृह्यते, सेयं पद्मादिसम्मीलनदृष्टान्तेन न निवर्तते । यथा चेयं न निर्वर्त्तते तथा जातस्यापीति । क्रियाजाताश्च पर्णसंयोग- यह उत्पन्न हुआ बालक इस जन्म में अगृहीत परन्तु लिंग से अनुमेय हर्ष, भय, शोक आदि से ग्रस्त होता है । ये हर्ष-भयादि उन्हीं की स्मृति के अनुबन्ध से उत्पन्न हो सकते हैं, अन्यथा नहीं । यह स्मृत्यनुबन्ध पूर्वाभ्यास से उत्पन्न हो सकता है, अन्यथा नहीं । पूर्वाभ्यास पूर्व जन्म मानने पर बन सकता है, अन्यथा नहीं । अतः सिद्ध होता है कि शरीरनाश के बाद भी आत्मा विद्यमान है ॥ १८ ॥ शंका— पद्मादि के संकोच-विकासादि विकारों की तरह आत्मा के विकार मान लें ? ॥१९॥ जैसे लोक में अनित्य पद्मादि में संकोच-विकास रूप विकार देखा जाता है, वैसे ही अनित्य आत्मा में हर्ष, शोक भय आदि का सम्प्रतिपत्तिरूपविकार मान लें ? ॥ १९ ॥ उत्तर—हेतुत्व न होने से ऐसा मानना अयुक्त है । 'इस हेतु से पद्मादि के संकोच- विकास की तरह अनित्य आत्मा को हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति होती है'—इस उदा- हरणसाधर्म्य तथा उदाहरणवैधर्म्य मात्र से जन्मान्तरीय,अनुभवजन्य संस्कार बालक में नहीं बनता; अतः हेतु न होने से इसके असम्बद्धार्थ हो जाने पर यह उदाहरण निरर्थक है । दृष्टान्त से भी हर्षादि निमित्त का अनिषेध ही रहेगा । विषयों के आसेवन से हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति पूर्वानुभवज स्मृति-अनुबन्ध से होती हुई प्रत्येक आत्मा को गृहीत होती है, यह पद्मादि के संकोच विकासवाले दृष्टान्त से प्रतिषिद्ध नहीं की जा सकती । अथ च, जैसे पद्मादि की संकोच-विकास क्रिया निवृत्त नहीं होती, वैसे ही उत्पन्न बालक की हर्ष-शोकादि सम्प्रतिपत्तियां निवृत्त नहीं होती । वहां संकोचविकास क्रियोत्पन्न पत्रा- दिसंयोगविभाग से अतिरिक्त नहीं हैं । क्रियाहेतु का क्रिया से अनुमान किया जाता है । ऐसा

१९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० विभागाः प्रबोधसम्मीलने, क्रियाहेतुश्च क्रियानुमेयः । एवं च सति किं दृष्टान्तेन प्रतिषिध्यते ! ॥ १९ ॥ अथ निर्निमित्तः पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकार इति मतम्, एवमात्मनोऽपि हर्षादिसम्प्रतिपत्तिरिति ? । तन्न— न; उष्णशीतवर्षकालनिमित्तत्वात् पञ्चात्मकविकाराणाम् ॥ २० ॥ उष्णादिषु सत्सु भावादसत्स्वभावात्तन्निमित्ताः पञ्चभूतानुग्रहेण निर्वृत्तानां पद्मादीनां प्रबोधसम्मीलनविकारा इति न निर्निमित्ताः । एवं हर्षादयोऽपि विकारा निमित्ताद्भवितुमर्हन्ति, न निमित्तमन्तरेण । न चान्यत् पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धा- न्निमित्तमस्तीति । न चोत्पत्तिनिरोधकारणानुमानमात्मनो दृष्टान्तात्, न हर्षा- दीनां निमित्तमन्तरेणोत्पत्तिः, नोष्णादिवन्निमित्तान्तरोपादानं हर्षादीनाम् । तस्मादयुक्तमेतत् ॥ २० ॥ ४. इतश्च नित्य आत्मा— प्रेत्याहाराभ्यासकृतात् स्तन्याभिलाषात् ॥ २१ ॥ जातमात्रस्य वत्सस्य प्रवृत्तिलिङ्गः स्तन्याभिलाषो गृह्यते, स च नान्तरे- णाहाराभ्यासम् । कया युक्त्या ? दृश्यते हि शरीरिणां क्षुधा पीड्यमानानामा- मानने के बाद, हम नहीं समझ पाये कि आप पद्मादि दृष्टान्त से क्या प्रतिषिद्ध कर रहे हैं ! शङ्का—'पद्मादिक में संकोच-विकास अहेतुक हैं'—यह मत है, इसी प्रकार आत्मा में भी हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति बन जायेगी ? वह तो नहीं बनेगी; पञ्चात्मक विकारों का उष्ण, शीत, वर्षा काल हेतु होने से ॥ २० ॥ उष्णादि हेतु होने पर वे होते हैं, न होने पर नहीं होते, अतः वे पञ्चभूतानुगृहीत व्यापार से निष्पन्न पद्मादि के संकोच-विकास अहेतुक नहीं हैं। इसी तरह हर्षादि विकार भी निमित्त से ही बन सकते हैं, निमित्त के विना नहीं। वह निमित्त पूर्वाभ्यस्त स्मृत्यनु- बन्ध के अतिरिक्त क्या हो सकता है ! दृष्टान्त से आत्मा के उत्पत्ति-विनाशकारण का अनुमान नहीं कर सकते । हर्षादि की निमित्त के विना उत्पत्ति नहीं बन सकती । उष्णादि की तरह निमित्तान्तर से भी हर्षादि की उत्पत्ति हो नहीं सकती। अतः आपकी हर्षादिकों के निर्निमित्तवाली बात अयुक्त ही है ॥ २० ॥ ४. इस कारण भी आत्मा नित्य है— जन्म होते ही आहाराभ्यासजन्य स्तन्याभिलाष से ॥ २१ ॥ उत्पन्न होते ही शिशु का प्रवृत्तिहेतुक स्तन्याभिलाष ( स्तन्यपानेच्छा ) देखा जाता है, वह आहाराभ्यास के विना नहीं बन सकता । किस युक्ति से ? लोक में देखते हैं कि क्षुधा से पीड़ित प्राणियों का, आहाराभ्यासजन्य स्मरणानुबन्ध से आहाराभिलाष देखा

२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१

२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१ हाराभ्यासकृतात् स्मरणानुबन्धादाहाराभिलाषः । न च पूर्वशरीराभ्यासमन्तरेणा- सौ जातमात्रस्योपपद्यते । तेनानुमीयते—भूतपूर्वं शरीरम्, यत्रानेनाहारोऽभ्यस्त इति । स खल्वयमात्मा पूर्वशरीरात् प्रेत्य शरीरान्तरमापन्नः क्षुत्पीडितः पूर्वा- भ्यस्तमाहारमनुस्मरन् स्तन्यमभिलषति । तस्मान्न देहभेदादात्मा भिद्यते, भवत्येवोर्ध्वं देहभेदादिति ॥ २१ ॥ अयसोऽयस्कान्ताभिगमनवत्तदुपसर्पणम् ? ॥ २२ ॥ यथा खल्वयोऽभ्यासमन्तरेणायस्कान्तमुपसर्पति, एवमाहाराभ्यासमन्तरेण बालः स्तन्यमभिलषति ? ॥ २२ ॥ किमिदमयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं निर्निमित्तम्, अथ निमित्तादिति ? निर्नि- मित्तं तावत्— न; अन्यत्र प्रवृत्त्यभावात् ॥ २३ ॥ यदि निर्निमित्तम् ? लोष्टादयोऽप्ययस्कान्तमुपसर्पेयुः ! न जातु नियमे कारणमस्तीति । अथ निमित्तात् ? तत्केनोपलभ्यते इति ! क्रियालिङ्गः क्रिया- हेतुः, क्रियानियमलिङ्गश्च क्रियाहेतुनियमः, तेनान्यत्र प्रवृत्त्यभावः । बालस्यापि जाता है । पूर्वाभ्यास के बिना उत्पन्न होते ही बालक को यह कैसे बन सकता है ! पूर्व शरीर से च्युत होकर शरीरान्तर से अवच्छिन्न यह आत्मा क्षुधा से पीड़ित हो, पूर्व- जन्माभ्यस्त आहार का अनुस्मरण करता हुआ स्तन्य की इच्छा करता है । अतः सिद्ध होता है कि देहनाश से आत्मा का नाश नहीं हो जाता, अपितु वही आत्मा दूसरे देहों में भी अवच्छिन्न है ॥ २१ ॥ शङ्का— अयस्कान्त मणि के पास लोह के अभिगमन की तरह उस शिशु का स्तन्य की ओर उपसर्पण मान लें ? ॥ २२ ॥ जैसे अभ्यास के बिना ही लोह अयस्कान्तमणि की ओर सरकता है, वैसे ही बालक भी स्तन्य की ओर झुकता है, उसकी इच्छा रखता है । ( पूर्वजन्माभ्यास कारण मानोगे तो जात्यन्ध या बधिरों को पूर्वाभ्यस्त रूपशब्दादिक का इस जन्म में भी प्रत्यक्ष होने लगेगा ? ) ॥ २२ ॥ उत्तर—क्या यह लोह का अयस्कान्तमणि की ओर उपसर्पण अनिमित्तक है या सनिमित्तिक ? यदि अनिमित्तक कहोगे तो— ऐसा नहीं कह सकते; अन्यत्र प्रवृत्ति न देखी जाने से ॥ २३ ॥ यदि अनिमित्तक मानोगे तो ईंट पत्थर आदि भी अयस्कान्तमणि की ओर सरकने लगेंगे, क्योंकि नियम में कोई कारण तो है नहीं । यदि निमित्त मानोगे तो वह किससे उपलब्ध होता है ! क्रियालिङ्गक साध्य क्रियाजनक होता है, तथा क्रियानियमलिङ्ग क्रियाजनकनियम होता है, इसलिये अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती । बालक की भी नियत

१९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० नियतमुपसर्पणं क्रियोपलभ्यते । न च स्तन्याभिलाषलिङ्गमन्यदाहाराभ्यासकृतात् स्मरणानुबन्धात् । निमित्तं दृष्टान्तेनोपपाद्यते, न चासति निमित्ते कस्यचिदु- त्पत्तिः । न च दृष्टान्ते दृष्टमभिलाषहेतुं बाधते । तस्मादयसोऽयस्कान्ताभिगम- नमदृष्टान्त इति । अयसः खल्वपि नान्यत्र प्रवृत्तिर्भवति, न जात्वयो लोष्टमुपसर्पति, किंकृतोऽ- स्य नियम इति ? यदि कारणनियमात् ? स च क्रियानियमलिङ्गः । एवं बाल- स्यापि नियतविषयोऽभिलाषः कारणनियमाद्भवितुमर्हति । तच्च कारणमभ्यस्त- स्मरणम्, अन्यद्वेति दृष्टेन विशिष्यते । दृष्टो हि शरीरिणामभ्यस्तस्मरणादाहारा- भिलाष इति ॥ २३ ॥ ५. इतश्च नित्य आत्मा । कस्मात् ? वीतरागजन्मादर्शनात् ॥ २४ ॥ 'सरागो जायते' इत्यर्थादापद्यते । अयं जायमानो रागानुबद्धो जायते, रागस्य पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनं योनिः । पूर्वानुभवश्च विषयाणामन्यस्मिन् जन्मनि शरीरमन्तरेण नोपपद्यते । सोऽयमात्मा पूर्वशरीरानुभूतान् विषयान् अनुस्मरन् उपसर्पणक्रिया उपलब्ध होती है, स्तन्याभिलाषहेतुकनिमित्त दूसरे आहार से जन्म अभ्यास के स्मरणानुबन्ध के विना नहीं हो सकता । निमित्त दृष्टान्त से उपपन्न होता है, निमित्त के बिना किसी की उपपत्ति नहीं होती । दृष्टान्त में दृष्ट तत्त्व अभिलाषनिमित्त का बाध नहीं करता, इसलिये लोह का अयस्कान्त मणि के पास जानेवाला दृष्टान्त युक्त नहीं । लोह की भी अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती, लोह कभी पत्थर की तरफ नहीं सरकता— यह नियम किस हेतु से बना ? यदि कारणनियम से मानोगे तो वह क्रियानियमलिङ्ग बन गया । इसी तरह शिशु का भी नियतविषयक अभिलाष कारणनियम से बन सकता है । वह कारण अभ्यस्त स्मरण है, या कोई अन्य—यह निर्णय अस्मदादि दृष्ट से किया जा सकता है । प्राणियों का अभ्यस्त स्मरण से आहाराभिलाष हम लोग देखते ही हैं । अतः उक्त नियम में कोई बाधा नहीं है ॥ २३ ॥ ५. इस कारण भी आत्मा नित्य है; क्योंकि वीतराग का जन्म नहीं देखा जाता ॥ २४ ॥ इससे 'सराग प्राणी उत्पन्न होता है'—यह अर्थात् आपन्न हुआ । यह प्राणी उत्पन्न होता हुआ रागानुबद्ध होता है । राग का कारण है पूर्वानुभूत विषयों का पुनः पुनः चिन्तन । विषयों का पूर्वानुभव अन्य जन्म में शरीर धारण किये बिना नहीं बन सकता । यह आत्मा पूर्व शरीर में अनुभूत विषयों का अनुस्मरण करता हुआ उन उन विषयों में

२६. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९३

२६. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९३ तेषु तेषु रज्यते, तथा चायं द्वयोर्जन्मनोः प्रतिसन्धिः । एवं पूर्वशरीरस्य पूर्व- तरेण, पूर्वतरस्य पूर्वतमेनेत्यादिनाऽनादिश्चेतनस्य शरीरयोगः, अनादिश्च रागा- नुबन्ध इति सिद्धं नित्यत्वमिति ॥ २४ ॥ कथं पुनर्ज्ञायते—पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनजनितो जातस्य रागः, न पुनः— सगुणद्रव्योत्पत्तिवत् तदुत्पत्तिः ? ॥ २५ ॥ यथोत्पत्तिधर्मकस्य द्रव्यस्य गुणाः कारणत उत्पद्यन्ते, तथोत्पत्तिधर्मकस्या- त्मनो रागः कुतश्चिदुत्पद्यते ? ॥ २५ ॥ अत्रायमुदितानुवादो निदर्शनार्थः । न; सङ्कल्पनिमित्तत्वाद्भागादीनाम् ॥ २६ ॥ न खलु सगुणद्रव्योत्पत्तिवदुत्पत्तिरात्मनो रागस्य च । कस्मात् ? सङ्कल्पनि- मित्तत्वाद्भागादीनाम् । अयं खलु प्राणिनां विषयानासेवमानानां सङ्कल्पजनितो रागो गृह्यते, सङ्कल्पश्च पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनयोनिः । तेनानुमीयते—जात- स्यापि पूर्वानुभूतार्थचिन्तनकृतो राग इति । आत्मोत्पादाधिकरणानां तु रागोत्पत्ति- राग को प्राप्त होता है । यही राग दो जन्मों की प्रतिसन्धि कहलाता है । इस रीति से पूर्वशरीर का उससे पहलेवाले शरीर के साथ, तथा उससे पहलेवाले का उससे भी पहलेवाले शरीर के साथ—यों यह चेतन शरीर का सम्बन्ध अनादि चला आ रहा है, इसी के साथ साथ राग भी अनादि प्रवाह से चला आ रहा है । अतः इस राग के उत्पत्तिविनाश हेतु से भी आत्मा का नित्यत्व सिद्ध होता है ॥ २४ ॥ शङ्का—यह कैसे ज्ञात हो कि उत्पन्न शिशु का यह राग पूर्वानुभूत विषयानुचिन्तन से ही जनित है, क्यों नहीं— सगुण द्रव्य की उत्पत्ति की तरह उस राग की उत्पत्ति मान लें ? ॥ २५ ॥ जैसे उत्पत्तिधर्मा घटादि द्रव्य के गुण कारण से उत्पन्न होते हैं, उसी तरह उत्पत्ति- धर्मक आत्मा का राग भी किसी कारण से उत्पन्न होता होगा ? ॥ २५ ॥ उत्तर—यहाँ यह कथित का अनुकथन नये दृष्टान्त मात्र के लिये है, पहले अयस्कान्त के दृष्टान्त से यह बात कही थी, अब घटादि के दृष्टान्त से कह रहे हो । रागादिक के सङ्कल्पनिमित्तक होने से यह नहीं कह सकते ॥ २६ ॥ सगुण द्रव्य की उत्पत्ति की तरह आत्मा तथा उसके राग की उत्पत्ति नहीं मान सकते; क्योंकि रागादि संकल्पनिमित्तक है । यह संकल्पजनित राग विषयों का आसेवन करने वाले प्राणियों में ही देखा जाता है । तथा उक्त संकल्प पूर्वानुभूत विषयानुचिन्तन से होता है । अतः अनुमान होता है—'सद्योजात शिशु को भी पूर्वानुभूतार्थचिन्तनजनित राग उत्पन्न होता है' । आत्मोत्पत्तिपक्ष में तो संकल्प से अन्य रागकारण सिद्ध होने पर, कार्यद्रव्य गुण की तरह, रागोत्पत्ति होती हुई कही जा सकती है; परन्तु आत्मोत्पत्ति न्या० द० : १३ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१९४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० र्भवन्ती सङ्कल्पादन्यस्मिन् रागकारणे सति वाच्या, कार्यद्रव्यगुणवत् । न चात्मोत्पादः सिद्धः, नापि सङ्कल्पादन्यद्रागकारणमस्ति । तस्मादयुक्तम्-‘सगुण- द्रव्योत्पत्तिवत् तस्योत्पत्तिः’ इति । अथापि सङ्कल्पादन्यद्रागकारणं धर्माधर्मलक्षणमदृष्टमुपादीयते, तथापि पूर्वशरीरयोगोऽप्रत्याख्येयः । तत्र हि तस्य निर्वृत्तिः, नास्मिन् जन्मनि, तन्मय- त्वाद्राग इति । विषयाभ्यासः खल्वयं भावनाहेतुः तन्मयत्वमुच्यते इति । जातिविशेषाच्च रागविशेष इति । कर्म खल्विदं जातिविशेषनिर्वर्तकं तादात्म्या- त्ताच्र्छब्द्यं विज्ञायते । तस्मादनुपपन्नं सङ्कल्पादन्यद्रागकारणमिति ॥ २६ ॥ शरीरपरीक्षाप्रकरणम् [ २७-३१ ] अनादिश्चेतनस्य शरीरयोग इत्युक्तम् । स्वकृतकर्मनिमित्तं चास्य शरीरं सुखदुःखाधिष्ठानम्, तत् परीक्ष्यते-किं घ्राणादिवदेकप्रकृतिकम् ? उत नानाप्रकृ- तीति ? कुतः संशयः ? विप्रतिपत्तेः संशयः । पृथिव्यादीनि भूतानि सङ्ख्या- विकल्पेन शरीरप्रकृतिरिति प्रतिजानत इति । किं तत्र तत्त्वम् ? सिद्ध नहीं होती, न सङ्कल्प से अन्य रागकारण ही सिद्ध हैं । इसलिए यह कहना कि 'सगुण द्रव्य की तरह आत्मा के राग की उत्पत्ति होती हैं'—अयुक्त ही है । यदि उक्त सङ्कल्प से अन्य रागकारण अदृष्ट धर्माधर्म मानें तो भी शरीर से शरीरान्तर के सम्बन्ध का प्रत्याख्यान नहीं होगा । इस पक्ष में, उस जन्म में उसकी निर्वृत्ति बन सकती है, इस जन्म में नहीं; क्योंकि विषयाभ्यासमूलक राग तन्मय होता है । यह भावनाहेतुक विषयाभ्यास ही 'तन्मय' कहलाता है । करभादि-जन्मविशेष से कण्टक- भक्षणादि रागविशेष की उपपत्ति बनती है । कर्म ही उस-उस जातिविशेष का निर्वर्तक है । आत्मा में उस शरीर का तादात्म्य होने से उपचारात् उन-उन शरीरवाचक पदों का उस (आत्मा) में व्यवहार होता है । कर्म जातिविशेष का निर्वर्तक माना जाता है । अतः यह कहना भी अयुक्तियुक्त ही है कि 'सङ्कल्प से अतिरिक्त कोई अन्य राग का कारण बन सकता है' ॥ २६ ॥ चेतन तथा शरीर का सम्बन्ध अनादि है—यह हम अभी पीछे कह आये हैं ! इस चेतन का यह शरीर स्वकर्मनिमित्तक तथा इसके सुख दुःख का अधिष्ठान ( = अवच्छेदक, भोगाश्रय ) है ! उसके विषय में अब विचार करना है कि वह घ्राणादि की तरह एक- भूतसमवायिकारणक है, या नानाभूतों से बना है ? यह संशय क्यों हुआ ? विप्रतिपत्ति के कारण । ये विप्रतिपन्न वादी पृथिव्यादि पञ्चभूतों को सङ्ख्याविकल्प से शरीर का समवायिकारण स्थापित करते हैं । इन विभिन्न वादियों के मतों में कौन सा मत समीचीन है ?

३०. सू० ] शरीरपरीक्षाप्रकरणम् १९५

३०. सू० ] शरीरपरीक्षाप्रकरणम् १९५ पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः ॥ २७ ॥ तत्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् । कस्मात् ? गुणान्तरोपलब्धेः । गन्धवती पृथिवी, गन्धवच्च शरीरम् । अबादीनामगन्धत्वात् तत्प्रकृत्यगन्धं स्यात् । न त्विदमबादिभिरसम्पृक्तया पृथिव्याऽऽरब्धं चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयभावेन कल्पते इत्यतः पञ्चानां भूतानां संयोगे सति शरीरं भवति । भूतसंयोगो हि मिथः पञ्चानां न निषिद्ध इति । आप्यतैजसवायव्यानि लोकान्तरे शरीराणि, तेष्वपि भूतसं- योगः पुरुषार्थतन्त्र इति । स्थाल्यादिद्रव्यनिष्पत्तावपि निःसंशया नाबादिसंयोग- मन्तरेण निष्पत्तिरिति ॥ २७ ॥ पार्थिवाप्यतैजसं तद्गुणोपलब्धेः ? ॥ २८ ॥ निःश्वासोच्छ्वासोपलब्धेश्चातुर्भौतिकम् ? ॥ २९ ॥ गन्धक्लेदपाकव्यूहावकाशदानेभ्यः पाञ्चभौतिकम् ? ॥ ३० ॥ त इमे सन्दिग्धा हेतव इत्युपेक्षितवान् सूत्रकारः । कथं सन्दिग्धाः ? सति पृथ्वी गुण की उपलब्धि होने से यह मानव शरीर पार्थिव हैं ॥ २७ ॥ यह मनुष्य-शरीर पार्थिव है; क्योंकि उसमें पार्थिव गुण विशेष की उपलब्धि होती है । पृथिवी गन्धवती है, शरीर भी गन्धवान् है । यदि यह शरीर जलादिप्रकृतिक होता तो यह भी जलादि की तरह निर्गन्ध होता । परन्तु यह जलादि से सम्पृक्त हुए विना अकेले पृथ्वी से आरब्ध (निर्मित) होता तो इसमें चेष्टा, इन्द्रिय, अर्थाश्रयत्व इत्यादि न बन पाते; क्योंकि ये गुण पृथ्वी में नहीं हैं, अतः पाँचों भूतों के संयोग से ही इस शरीर की निष्पत्ति हुई है । इन पाँचों भूतों का आपस में मिलना किसी भी वादी को अनिष्ट भी नहीं है । यद्यपि दूसरे लोकों में शरीर केवल जल-वायु-तेजःप्रकृतिक है, पर उनमें भी इन भूतों का संयोग पुरुषार्थसाध्य है । स्थाल्यादि पदार्थों का निष्पादन भी निस्सन्देह जलादिसंयोग के विना नहीं हो पाता ॥ २७ ॥ शङ्का— इस शरीर को पार्थिव, आप्य तथा तैजस मान लें, उन भूतों के गुणों की उपलब्धि होने से ? ॥ २८ ॥ शरीर में निःश्वास, उच्छ्वास की उपलब्धि से इसे चातुर्भौतिक मान लें ? ॥२९॥ अथवा—इसमें गन्ध, आर्द्रता, अन्नपाक, भुक्तान्नपान, रससञ्चरण तथा दूसरे भूतों को इतस्ततः सञ्चरण के लिये अवकाशदान से इसे पाञ्चभौतिक मान लें ? ॥ ३० ॥ इन तीनों सूत्रों में कथित हेतु सन्दिग्ध हैं, अतः सूत्रकार ने इनकी उपेक्षा की । सन्दिग्ध कैसे हैं ? तत्तद्गुणवान् द्रव्य के प्रकृतिभाव में भी भूतों के धर्मों की

१९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० च प्रकृतिभावे भूतानां धर्मोपलब्धिरसति च संयोगाप्रतिषेधात् सन्निहितानामिति । यथा स्थाल्यामुदकतेजोवाय्वाकाशानामिति । तदिदमनेकभूतप्रकृति शरीरमगन्ध- मरसमरूपमस्पर्शं च प्रकृत्यनुविधानात् स्यात् । न त्विदमित्थम्भूतम्, तस्मात् ‘पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः’ ॥ २८-३० ॥ श्रुतिप्रामाण्याच्च ॥ ३१ ॥ ‘सूर्यं ते चक्षुर्गच्छतात्’ इत्यत्र मन्त्रे ‘पृथिवीं ते शरीरम्’ इति श्रूयते, तदिदं प्रकृतौ विकारस्य प्रलयाभिधानमिति । ‘सूर्यं ते चक्षुः स्पृणोमि’ इत्यत्र मन्त्रान्तरे ‘पृथिवीं ते शरीरं स्पृणोमि’ इति श्रूयते, सेयं कारणाद्विकारस्य सृष्टिर- भिधीयत इति । स्थाल्यादिषु च तुल्यजातीयानामेककार्यारम्भदर्शनाद् भिन्न- जातीयानामेककार्यारम्भानुपपत्तिः ॥ ३१ ॥ इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् [ ३२-५१ ] अथेदानीमिन्द्रियाणि प्रमेयक्रमेण विचार्यन्ते—किमाव्यक्तिकानि ? आहो- स्विद् भौतिकानीति ? उपलब्धि बन सकती है; अथवा—परस्पर संयुक्त भूतों का संयोग के अप्रतिषेध से भी गुणों को उपलब्धि हो सकती है । जैसे—एक ही स्थाली पार्थिव होती हुई भी वह्नि- संयुक्त हो तो अन्न को पका देती है, उदकसंयुक्त हो तो मध्यपाती पदार्थों को आर्द्र कर देती है, वायुसंयुक्त हो तो मध्यपाती पदार्थों का सञ्चरण करती है, आकाशसंयुक्त हो तो अन्य भूतों के कर्मों को इतस्ततः सञ्चरण के लिये अवकाश देती है । यह मानव शरीर यदि अनेकभूतप्रकृतिक होता तो तत्तद्भूतों को प्रकृति के अनुसार दूसरे के गुण दूसरे में नहीं आ सकते, अतः शरीर निर्गन्ध, नीरस, नीरूप, निःस्पर्श होता; परन्तु यह ऐसा नहीं है, अतः सिद्ध होता है कि—'इसमें गुणविशेष की विशेषोपलब्धि होने से यह पार्थिव है' ॥ २८-३० ॥ श्रुतिप्रामाण्य से भी ( मानव शरीर पार्थिव है ) ॥ ३१ ॥ 'तुम्हारे ( प्रेतात्मा के ) चक्षु सूर्य ( तेजस् ) में विलीन हो जायें' इस मन्त्र में 'तुम्हारा शरीर पृथ्वी में विलीन हो जाये'—इस प्रकार पृथ्वी प्रकृति में उसके विकार का विलय बतलाया है । 'तेरे लिये सूर्य को चक्षु रूप से सृजन करता हूँ' इस दूसरे मन्त्र में—'पृथ्वी को तेरे शरीर रूप में सृजन करता हूँ' यह कहते सुना जाता है! इसमें कारण से पृथ्वी के विकार की सृष्टि कही गयी है । स्थाल्यादि द्रव्यों में तुल्यजातियों का समान कार्य होता हुआ देखा जाता है; अतः भिन्नजातियों का समान कार्यारम्भ शरीर में अनुपपन्न है ॥ ३१ ॥ प्रमेयक्रम से, अब इन्द्रियों पर विचार किया जा रहा है—क्या ये इन्द्रियाँ सांख्य- मतानुसार अव्यक्त की विकार हैं ? या ( नैयायिकतानुसार ) भूतविकार हैं ?

३३. सू० ] इन्द्रिपरीक्षाप्रकरणम् १९७

३३. सू० ] इन्द्रिपरीक्षाप्रकरणम् १९७ कुतः संशयः ? कृष्णसारे सत्युपलम्भाद् व्यतिरिच्य चोपलम्भात् संशयः ॥ ३२ ॥ कृष्णसारं भौतिकम्, तस्मिन्ननुपहते रूपोपलब्धिः, उपहते चानुपलब्धिरिति । व्यतिरिच्य कृष्णसारमवस्थितस्य विषयस्य उपलम्भः, न कृष्णसारप्राप्तस्य । न चाप्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां तदिदमभौतिकत्वे विभुत्वात्सम्भवति । एवमुभय- धर्मोपलब्धेः संशयः ॥ ३२ ॥ साङ्ख्यमतखण्डनम् अभौतिकानीत्याह १। कस्मात् ? महदणुग्रहणात् ॥ ३३ ॥ 'महत्' इति महत्तरं महत्तमं चोपलभ्यते, यथा—न्यग्रोधपर्वतादि । 'अणु' इति अणुतरमणुतमं च गृह्यते, यथा—न्यग्रोधधानादि । तदुभयमुपलभ्यमानं चक्षुषो भौतिकत्वं बाधते । भौतिकं हि यावत्तावदेव व्याप्नोति । अभौतिकं तु विभुत्वात् सर्वव्यापकमिति ॥ ३३ ॥ यह संशय क्यों उठा ? कनीनिका के होने पर रूपोपलब्धि होने से, तथा उस कनीनिका के समीपस्थ विषय की उपलब्धि होने से ॥ ३२ ॥ कृष्णसार ( = कनीनिका ) भौतिक ( तैजस ) है । क्योंकि उसके रहने पर रूपो- पलब्धि होती है, न रहने पर नहीं हो पाती । कनीनिका से कुछ दूर पड़े पदार्थ की उपलब्धि हो पाती है, परन्तु उसको कनीनिका से सर्वथा सम्बद्ध कर देने पर रूपोपलब्धि नहीं होती । और, इन्द्रियाँ अप्राप्यकारी नहीं हैं, अतः उन्हें अभौतिक मानने पर भी विभुत्व धर्म से उनमें यह उपलब्धि बन सकती है । यों इन्द्रियों के विषय में दोनों तरह की कोटि मिलने से संशय होता है ॥ ३२ ॥ 'इन्द्रियाँ अभौतिक हैं'—ऐसा सांख्यमत हैं; कैसे ?— बड़े से बड़े तथा न्यून से न्यून परिमाण का ग्रहण होने से ॥ ३३ ॥ 'महत्' से महत्तर, महत्तम का भी ग्रहण होता है, जैसे—विशाल वट वृक्ष या पर्वत आदि । 'अणु' से भी अणुतर, अणुतम का ग्रहण होता है, जैसे—वटबीज आदि । इन दोनों—'महद्' तथा 'अणु' के कनीनिका द्वारा गृहीत होने से चक्षु का भौतिकत्व बाधित होता है, क्योंकि भौतिक विकार एक सीमित परिमाण को ही व्याप्त कर सकता है । हाँ, अभौतिक अपेक्षानुसार व्यापक परिमाण को भी व्याप्त कर सकता है; क्योंकि वह विभु है ॥ ३३ ॥ १. सांख्य इति शेषः । इदानीं सूत्रकारः सांख्यमतमुत्थाप्य 'अक्षिकनीनिकैवेन्द्रियम्' इति बौद्धमतं दूषयति ।

१९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० न महदणुग्रहणमात्रादभौतिकत्वं विभुत्वं चेन्द्रियाणां शक्यं प्रतिपत्तुम्। इदं खलु— रश्म्यर्थसन्निकर्षविशेषात् तद्ग्रहणम् ॥ ३४ ॥ तयोर्महदण्वोर्ग्रहणं चक्षूरश्मेरर्थस्य च सन्निकर्षविशेषाद्भवति, यथा-प्रदीप- रश्मेरर्थस्य चेति । रश्म्यर्थसन्निकर्षश्चावरणलिङ्गः । चाक्षुषो हि रश्मिः कुड्या- दिभिरावृतमर्थं न प्रकाशयति, यथा-प्रदीपरश्मिरिति ॥ ३४ ॥ आवरणानुमेयत्वे सतीदमाह— तदनुपलब्धेरहेतुः ॥ ३४ ॥ रूपस्पर्शवद्धि तेजः, महत्त्वदनेकद्रव्यवत्त्वाद् रूपवत्त्वाच्चोपलब्धिरिति प्रदीप- वत् प्रत्यक्षत उपलभ्येत चाक्षुषो रश्मिर्यदि स्यादिति ? ॥ ३५ ॥ नानुमीयमानस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिरभावहेतुः ॥ ३६ ॥ सन्निकर्षप्रतिषेधार्थेनावरणेन लिङ्गेनानुमीयमानस्य रश्मेर्या प्रत्यक्षतोऽनुप- [ अब नैयायिक सांख्यमत का खण्डन करता है— ] केवल महद् या अणु परिमाण- ग्रहण से इन्द्रियों का अभौतिकत्व या विभुत्व सिद्ध नहीं होता; यह— महद्-अणु का ग्रहण रश्मि तथा अर्थ के सन्निकर्षविशेष से होता है ॥ ३४ ॥ उन दोनों—महत् तथा अणु का ग्रहण चक्षूरश्मि तथा अर्थ के सन्निकर्षविशेष से होता है, जैसे—प्रदीपप्रभा तथा अर्थ के सन्निकर्ष से महदणु का ग्रहण होता है। यह रश्मि-अर्थ का सन्निकर्ष आवरण से अनुमित है । चाक्षुष रश्मि भित्ति-आदि का आवरण रहते अर्थ को प्रकाशित नहीं कर पातीं, जैसे प्रदीपप्रभा भित्ति-आवरण के रहते द्रव्य को प्रकाशित नहीं करती ॥ ३४ ॥ शङ्का—आवरण से अनुमेय मानने पर साङ्ख्यवादी कहता है— उसकी उपलब्धि न होने से वह अहेतु है ? ॥ ३५ ॥ तेज रूपस्पर्शवाला है । महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्व तथा रूपवत्त्व होने से उसकी उप- लब्धि, प्रदीपप्रभावाले दृष्टान्त की तरह, प्रत्यक्ष से हो सकती थी, यदि चाक्षुष रश्मि वहाँ होती ! तात्पर्य यह है कि अनुपलब्धिलक्षणप्राप्त भी यदि उपलभ्यमान नहीं है तो आव- रणादि का अनुमेय बनाना उचित नहीं; अन्यथा नरविषाण आदि का भी अनुमान होने लगेगा ? ॥ ३५ ॥ उत्तर— अनुमीयमान की प्रत्यक्षतः अनुपलब्धि उसके अभाव का कारण नहीं बना करती ॥ ३६ ॥ सन्निकर्षप्रतिषेधार्थक आवरण से अनुमीयमान रश्मि की प्रत्यक्षतः अनुपलब्धि रश्मि के अभाव का प्रतिपादन नहीं करती, जैसे—चन्द्रमा का परभाग या पृथ्वी का अधोभाग

३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९

३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९ लब्धिर्नासावभावं प्रतिपादयति, यथा—चन्द्रमसः परभागस्य, पृथिव्याश्चाधो- भागस्य ॥ ३६ ॥ द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोपलब्धिनियमः ॥ ३७ ॥ भिन्नः खल्वयं द्रव्यधर्मो गुणधर्मश्च, महदनेकद्रव्यञ्च १विषक्तावयवमाप्यं द्रव्यं प्रत्यक्षतो नोपलभ्यते, स्पर्शस्तु शीतो गृह्यते, तस्य द्रव्यस्यानुबन्धात् हेमन्त- शिशिरौ कल्पेते, तथाविधमेव च तैजसं द्रव्यमनुद्भूतरूपं सह रूपेण नोपलभ्यते, स्पर्शस्त्वस्योष्ण उपलभ्यते; तस्य द्रव्यस्यानुबन्धाद् ग्रीष्मवसन्तौ कल्पेते ॥ ३७ ॥ यत्र त्वेषा भवति— अनेकद्रव्यसमवायात् २ रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ३ ॥ ३८ ॥ यत्र रूपं च द्रव्यं च तदाश्रयः प्रत्यक्षत उपलभ्यते, रूपविशेषस्तु यद्भावात् क्वचिद्रूपोपलब्धिः, यदभावाच्च द्रव्यस्य क्वचिदनुपलब्धिः—स रूपधर्मोऽयमुद्भव- समाख्यात इति । अनुद्भूतरूपश्चायं नायनो रश्मिः, तस्मात् प्रत्यक्षतो नोपलभ्यत प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता तो उनके विषय में क्या हम यह मान बैठते हैं कि उनका अभाव है ! ॥ ३६ ॥ तथा द्रव्यगुणभेद से उपलब्धि में नियम होता है ॥ ३७ ॥ ये द्रव्य तथा गुण के धर्म भिन्न-भिन्न हैं। कोई प्रत्यक्षतः उपलब्ध हो जाता है, कोई नहीं होता। जैसे जलीय द्रव्य ( वायुनीत जलीय त्र्यणुकादि ) महान्, अनेकद्रव्यवान् तथा विभक्तावयव होते हुए भी प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता, परन्तु उसका शीतस्पर्श प्रत्य- क्षतः गृहीत है; उसी से द्रव्य अनुमेय है। अतः उस द्रव्य के अनुबन्ध से हेमन्त-शिशिर ऋतु की कल्पना की जाती है। इसी प्रकार, तैजस द्रव्य, जिसका रूप अनुद्भूत है, रूप से युक्त होने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता; परन्तु उसका उष्ण स्पर्श प्रत्यक्षतः अनुभूत होता है; उसीसे द्रव्य अनुमेय होता है। उस द्रव्य के अनुबन्ध से ग्रीष्म-वसन्त ऋतु की कल्पना की जाती है ॥ ३७ ॥ जहाँ यह रूपोपलब्धि होती है, वहाँ— अनेक द्रव्यों के समवाय सम्बन्ध होने से तथा ('उद्भूत' नामक) रूपविशेष से रूप- सहित द्रव्यों की उपलब्धि होती है ॥ ३८ ॥ जहाँ रूप, द्रव्य तथा तदाश्रय प्रत्यक्षतः उपलब्ध होते हैं; वहाँ रूपविशेष प्रयोजक है, जिसकी सत्ता से रूपोपलब्धि होती है, तथा अभाव से कहीं रूपोपलब्धि नहीं हो पाती— यह रूपधर्म 'उद्भव' कहलाता है। यह चाक्षुष रश्मि अनुद्भूत होने के कारण प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं हो पाती। लोक में तेज का भी धर्मभेद देखा जाता है, यथा—तेज १. विभक्तावयवम्—इति पाठः । २. अनेकद्रव्येण समवायादिति वार्त्तिकसम्मतः पाठः । ३. इदं सूत्रं वैशेषिकसूत्रेष्वपि ( ४. अ० १. आ० ६ सू० ) दृश्यते ।