न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१ हाराभ्यासकृतात् स्मरणानुबन्धादाहाराभिलाषः । न च पूर्वशरीराभ्यासमन्तरेणा- सौ जातमात्रस्योपपद्यते । तेनानुमीयते—भूतपूर्वं शरीरम्, यत्रानेनाहारोऽभ्यस्त इति । स खल्वयमात्मा पूर्वशरीरात् प्रेत्य शरीरान्तरमापन्नः क्षुत्पीडितः पूर्वा- भ्यस्तमाहारमनुस्मरन् स्तन्यमभिलषति । तस्मान्न देहभेदादात्मा भिद्यते, भवत्येवोर्ध्वं देहभेदादिति ॥ २१ ॥ अयसोऽयस्कान्ताभिगमनवत्तदुपसर्पणम् ? ॥ २२ ॥ यथा खल्वयोऽभ्यासमन्तरेणायस्कान्तमुपसर्पति, एवमाहाराभ्यासमन्तरेण बालः स्तन्यमभिलषति ? ॥ २२ ॥ किमिदमयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं निर्निमित्तम्, अथ निमित्तादिति ? निर्नि- मित्तं तावत्— न; अन्यत्र प्रवृत्त्यभावात् ॥ २३ ॥ यदि निर्निमित्तम् ? लोष्टादयोऽप्ययस्कान्तमुपसर्पेयुः ! न जातु नियमे कारणमस्तीति । अथ निमित्तात् ? तत्केनोपलभ्यते इति ! क्रियालिङ्गः क्रिया- हेतुः, क्रियानियमलिङ्गश्च क्रियाहेतुनियमः, तेनान्यत्र प्रवृत्त्यभावः । बालस्यापि जाता है । पूर्वाभ्यास के बिना उत्पन्न होते ही बालक को यह कैसे बन सकता है ! पूर्व शरीर से च्युत होकर शरीरान्तर से अवच्छिन्न यह आत्मा क्षुधा से पीड़ित हो, पूर्व- जन्माभ्यस्त आहार का अनुस्मरण करता हुआ स्तन्य की इच्छा करता है । अतः सिद्ध होता है कि देहनाश से आत्मा का नाश नहीं हो जाता, अपितु वही आत्मा दूसरे देहों में भी अवच्छिन्न है ॥ २१ ॥ शङ्का— अयस्कान्त मणि के पास लोह के अभिगमन की तरह उस शिशु का स्तन्य की ओर उपसर्पण मान लें ? ॥ २२ ॥ जैसे अभ्यास के बिना ही लोह अयस्कान्तमणि की ओर सरकता है, वैसे ही बालक भी स्तन्य की ओर झुकता है, उसकी इच्छा रखता है । ( पूर्वजन्माभ्यास कारण मानोगे तो जात्यन्ध या बधिरों को पूर्वाभ्यस्त रूपशब्दादिक का इस जन्म में भी प्रत्यक्ष होने लगेगा ? ) ॥ २२ ॥ उत्तर—क्या यह लोह का अयस्कान्तमणि की ओर उपसर्पण अनिमित्तक है या सनिमित्तिक ? यदि अनिमित्तक कहोगे तो— ऐसा नहीं कह सकते; अन्यत्र प्रवृत्ति न देखी जाने से ॥ २३ ॥ यदि अनिमित्तक मानोगे तो ईंट पत्थर आदि भी अयस्कान्तमणि की ओर सरकने लगेंगे, क्योंकि नियम में कोई कारण तो है नहीं । यदि निमित्त मानोगे तो वह किससे उपलब्ध होता है ! क्रियालिङ्गक साध्य क्रियाजनक होता है, तथा क्रियानियमलिङ्ग क्रियाजनकनियम होता है, इसलिये अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती । बालक की भी नियत