भारतकोश
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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१

२३. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९१ हाराभ्यासकृतात् स्मरणानुबन्धादाहाराभिलाषः । न च पूर्वशरीराभ्यासमन्तरेणा- सौ जातमात्रस्योपपद्यते । तेनानुमीयते—भूतपूर्वं शरीरम्, यत्रानेनाहारोऽभ्यस्त इति । स खल्वयमात्मा पूर्वशरीरात् प्रेत्य शरीरान्तरमापन्नः क्षुत्पीडितः पूर्वा- भ्यस्तमाहारमनुस्मरन् स्तन्यमभिलषति । तस्मान्न देहभेदादात्मा भिद्यते, भवत्येवोर्ध्वं देहभेदादिति ॥ २१ ॥ अयसोऽयस्कान्ताभिगमनवत्तदुपसर्पणम् ? ॥ २२ ॥ यथा खल्वयोऽभ्यासमन्तरेणायस्कान्तमुपसर्पति, एवमाहाराभ्यासमन्तरेण बालः स्तन्यमभिलषति ? ॥ २२ ॥ किमिदमयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं निर्निमित्तम्, अथ निमित्तादिति ? निर्नि- मित्तं तावत्— न; अन्यत्र प्रवृत्त्यभावात् ॥ २३ ॥ यदि निर्निमित्तम् ? लोष्टादयोऽप्ययस्कान्तमुपसर्पेयुः ! न जातु नियमे कारणमस्तीति । अथ निमित्तात् ? तत्केनोपलभ्यते इति ! क्रियालिङ्गः क्रिया- हेतुः, क्रियानियमलिङ्गश्च क्रियाहेतुनियमः, तेनान्यत्र प्रवृत्त्यभावः । बालस्यापि जाता है । पूर्वाभ्यास के बिना उत्पन्न होते ही बालक को यह कैसे बन सकता है ! पूर्व शरीर से च्युत होकर शरीरान्तर से अवच्छिन्न यह आत्मा क्षुधा से पीड़ित हो, पूर्व- जन्माभ्यस्त आहार का अनुस्मरण करता हुआ स्तन्य की इच्छा करता है । अतः सिद्ध होता है कि देहनाश से आत्मा का नाश नहीं हो जाता, अपितु वही आत्मा दूसरे देहों में भी अवच्छिन्न है ॥ २१ ॥ शङ्का— अयस्कान्त मणि के पास लोह के अभिगमन की तरह उस शिशु का स्तन्य की ओर उपसर्पण मान लें ? ॥ २२ ॥ जैसे अभ्यास के बिना ही लोह अयस्कान्तमणि की ओर सरकता है, वैसे ही बालक भी स्तन्य की ओर झुकता है, उसकी इच्छा रखता है । ( पूर्वजन्माभ्यास कारण मानोगे तो जात्यन्ध या बधिरों को पूर्वाभ्यस्त रूपशब्दादिक का इस जन्म में भी प्रत्यक्ष होने लगेगा ? ) ॥ २२ ॥ उत्तर—क्या यह लोह का अयस्कान्तमणि की ओर उपसर्पण अनिमित्तक है या सनिमित्तिक ? यदि अनिमित्तक कहोगे तो— ऐसा नहीं कह सकते; अन्यत्र प्रवृत्ति न देखी जाने से ॥ २३ ॥ यदि अनिमित्तक मानोगे तो ईंट पत्थर आदि भी अयस्कान्तमणि की ओर सरकने लगेंगे, क्योंकि नियम में कोई कारण तो है नहीं । यदि निमित्त मानोगे तो वह किससे उपलब्ध होता है ! क्रियालिङ्गक साध्य क्रियाजनक होता है, तथा क्रियानियमलिङ्ग क्रियाजनकनियम होता है, इसलिये अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती । बालक की भी नियत

१९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० नियतमुपसर्पणं क्रियोपलभ्यते । न च स्तन्याभिलाषलिङ्गमन्यदाहाराभ्यासकृतात् स्मरणानुबन्धात् । निमित्तं दृष्टान्तेनोपपाद्यते, न चासति निमित्ते कस्यचिदु- त्पत्तिः । न च दृष्टान्ते दृष्टमभिलाषहेतुं बाधते । तस्मादयसोऽयस्कान्ताभिगम- नमदृष्टान्त इति । अयसः खल्वपि नान्यत्र प्रवृत्तिर्भवति, न जात्वयो लोष्टमुपसर्पति, किंकृतोऽ- स्य नियम इति ? यदि कारणनियमात् ? स च क्रियानियमलिङ्गः । एवं बाल- स्यापि नियतविषयोऽभिलाषः कारणनियमाद्भवितुमर्हति । तच्च कारणमभ्यस्त- स्मरणम्, अन्यद्वेति दृष्टेन विशिष्यते । दृष्टो हि शरीरिणामभ्यस्तस्मरणादाहारा- भिलाष इति ॥ २३ ॥ ५. इतश्च नित्य आत्मा । कस्मात् ? वीतरागजन्मादर्शनात् ॥ २४ ॥ 'सरागो जायते' इत्यर्थादापद्यते । अयं जायमानो रागानुबद्धो जायते, रागस्य पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनं योनिः । पूर्वानुभवश्च विषयाणामन्यस्मिन् जन्मनि शरीरमन्तरेण नोपपद्यते । सोऽयमात्मा पूर्वशरीरानुभूतान् विषयान् अनुस्मरन् उपसर्पणक्रिया उपलब्ध होती है, स्तन्याभिलाषहेतुकनिमित्त दूसरे आहार से जन्म अभ्यास के स्मरणानुबन्ध के विना नहीं हो सकता । निमित्त दृष्टान्त से उपपन्न होता है, निमित्त के बिना किसी की उपपत्ति नहीं होती । दृष्टान्त में दृष्ट तत्त्व अभिलाषनिमित्त का बाध नहीं करता, इसलिये लोह का अयस्कान्त मणि के पास जानेवाला दृष्टान्त युक्त नहीं । लोह की भी अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं होती, लोह कभी पत्थर की तरफ नहीं सरकता— यह नियम किस हेतु से बना ? यदि कारणनियम से मानोगे तो वह क्रियानियमलिङ्ग बन गया । इसी तरह शिशु का भी नियतविषयक अभिलाष कारणनियम से बन सकता है । वह कारण अभ्यस्त स्मरण है, या कोई अन्य—यह निर्णय अस्मदादि दृष्ट से किया जा सकता है । प्राणियों का अभ्यस्त स्मरण से आहाराभिलाष हम लोग देखते ही हैं । अतः उक्त नियम में कोई बाधा नहीं है ॥ २३ ॥ ५. इस कारण भी आत्मा नित्य है; क्योंकि वीतराग का जन्म नहीं देखा जाता ॥ २४ ॥ इससे 'सराग प्राणी उत्पन्न होता है'—यह अर्थात् आपन्न हुआ । यह प्राणी उत्पन्न होता हुआ रागानुबद्ध होता है । राग का कारण है पूर्वानुभूत विषयों का पुनः पुनः चिन्तन । विषयों का पूर्वानुभव अन्य जन्म में शरीर धारण किये बिना नहीं बन सकता । यह आत्मा पूर्व शरीर में अनुभूत विषयों का अनुस्मरण करता हुआ उन उन विषयों में

२६. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९३

२६. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९३ तेषु तेषु रज्यते, तथा चायं द्वयोर्जन्मनोः प्रतिसन्धिः । एवं पूर्वशरीरस्य पूर्व- तरेण, पूर्वतरस्य पूर्वतमेनेत्यादिनाऽनादिश्चेतनस्य शरीरयोगः, अनादिश्च रागा- नुबन्ध इति सिद्धं नित्यत्वमिति ॥ २४ ॥ कथं पुनर्ज्ञायते—पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनजनितो जातस्य रागः, न पुनः— सगुणद्रव्योत्पत्तिवत् तदुत्पत्तिः ? ॥ २५ ॥ यथोत्पत्तिधर्मकस्य द्रव्यस्य गुणाः कारणत उत्पद्यन्ते, तथोत्पत्तिधर्मकस्या- त्मनो रागः कुतश्चिदुत्पद्यते ? ॥ २५ ॥ अत्रायमुदितानुवादो निदर्शनार्थः । न; सङ्कल्पनिमित्तत्वाद्भागादीनाम् ॥ २६ ॥ न खलु सगुणद्रव्योत्पत्तिवदुत्पत्तिरात्मनो रागस्य च । कस्मात् ? सङ्कल्पनि- मित्तत्वाद्भागादीनाम् । अयं खलु प्राणिनां विषयानासेवमानानां सङ्कल्पजनितो रागो गृह्यते, सङ्कल्पश्च पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनयोनिः । तेनानुमीयते—जात- स्यापि पूर्वानुभूतार्थचिन्तनकृतो राग इति । आत्मोत्पादाधिकरणानां तु रागोत्पत्ति- राग को प्राप्त होता है । यही राग दो जन्मों की प्रतिसन्धि कहलाता है । इस रीति से पूर्वशरीर का उससे पहलेवाले शरीर के साथ, तथा उससे पहलेवाले का उससे भी पहलेवाले शरीर के साथ—यों यह चेतन शरीर का सम्बन्ध अनादि चला आ रहा है, इसी के साथ साथ राग भी अनादि प्रवाह से चला आ रहा है । अतः इस राग के उत्पत्तिविनाश हेतु से भी आत्मा का नित्यत्व सिद्ध होता है ॥ २४ ॥ शङ्का—यह कैसे ज्ञात हो कि उत्पन्न शिशु का यह राग पूर्वानुभूत विषयानुचिन्तन से ही जनित है, क्यों नहीं— सगुण द्रव्य की उत्पत्ति की तरह उस राग की उत्पत्ति मान लें ? ॥ २५ ॥ जैसे उत्पत्तिधर्मा घटादि द्रव्य के गुण कारण से उत्पन्न होते हैं, उसी तरह उत्पत्ति- धर्मक आत्मा का राग भी किसी कारण से उत्पन्न होता होगा ? ॥ २५ ॥ उत्तर—यहाँ यह कथित का अनुकथन नये दृष्टान्त मात्र के लिये है, पहले अयस्कान्त के दृष्टान्त से यह बात कही थी, अब घटादि के दृष्टान्त से कह रहे हो । रागादिक के सङ्कल्पनिमित्तक होने से यह नहीं कह सकते ॥ २६ ॥ सगुण द्रव्य की उत्पत्ति की तरह आत्मा तथा उसके राग की उत्पत्ति नहीं मान सकते; क्योंकि रागादि संकल्पनिमित्तक है । यह संकल्पजनित राग विषयों का आसेवन करने वाले प्राणियों में ही देखा जाता है । तथा उक्त संकल्प पूर्वानुभूत विषयानुचिन्तन से होता है । अतः अनुमान होता है—'सद्योजात शिशु को भी पूर्वानुभूतार्थचिन्तनजनित राग उत्पन्न होता है' । आत्मोत्पत्तिपक्ष में तो संकल्प से अन्य रागकारण सिद्ध होने पर, कार्यद्रव्य गुण की तरह, रागोत्पत्ति होती हुई कही जा सकती है; परन्तु आत्मोत्पत्ति न्या० द० : १३ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१९४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० र्भवन्ती सङ्कल्पादन्यस्मिन् रागकारणे सति वाच्या, कार्यद्रव्यगुणवत् । न चात्मोत्पादः सिद्धः, नापि सङ्कल्पादन्यद्रागकारणमस्ति । तस्मादयुक्तम्-‘सगुण- द्रव्योत्पत्तिवत् तस्योत्पत्तिः’ इति । अथापि सङ्कल्पादन्यद्रागकारणं धर्माधर्मलक्षणमदृष्टमुपादीयते, तथापि पूर्वशरीरयोगोऽप्रत्याख्येयः । तत्र हि तस्य निर्वृत्तिः, नास्मिन् जन्मनि, तन्मय- त्वाद्राग इति । विषयाभ्यासः खल्वयं भावनाहेतुः तन्मयत्वमुच्यते इति । जातिविशेषाच्च रागविशेष इति । कर्म खल्विदं जातिविशेषनिर्वर्तकं तादात्म्या- त्ताच्र्छब्द्यं विज्ञायते । तस्मादनुपपन्नं सङ्कल्पादन्यद्रागकारणमिति ॥ २६ ॥ शरीरपरीक्षाप्रकरणम् [ २७-३१ ] अनादिश्चेतनस्य शरीरयोग इत्युक्तम् । स्वकृतकर्मनिमित्तं चास्य शरीरं सुखदुःखाधिष्ठानम्, तत् परीक्ष्यते-किं घ्राणादिवदेकप्रकृतिकम् ? उत नानाप्रकृ- तीति ? कुतः संशयः ? विप्रतिपत्तेः संशयः । पृथिव्यादीनि भूतानि सङ्ख्या- विकल्पेन शरीरप्रकृतिरिति प्रतिजानत इति । किं तत्र तत्त्वम् ? सिद्ध नहीं होती, न सङ्कल्प से अन्य रागकारण ही सिद्ध हैं । इसलिए यह कहना कि 'सगुण द्रव्य की तरह आत्मा के राग की उत्पत्ति होती हैं'—अयुक्त ही है । यदि उक्त सङ्कल्प से अन्य रागकारण अदृष्ट धर्माधर्म मानें तो भी शरीर से शरीरान्तर के सम्बन्ध का प्रत्याख्यान नहीं होगा । इस पक्ष में, उस जन्म में उसकी निर्वृत्ति बन सकती है, इस जन्म में नहीं; क्योंकि विषयाभ्यासमूलक राग तन्मय होता है । यह भावनाहेतुक विषयाभ्यास ही 'तन्मय' कहलाता है । करभादि-जन्मविशेष से कण्टक- भक्षणादि रागविशेष की उपपत्ति बनती है । कर्म ही उस-उस जातिविशेष का निर्वर्तक है । आत्मा में उस शरीर का तादात्म्य होने से उपचारात् उन-उन शरीरवाचक पदों का उस (आत्मा) में व्यवहार होता है । कर्म जातिविशेष का निर्वर्तक माना जाता है । अतः यह कहना भी अयुक्तियुक्त ही है कि 'सङ्कल्प से अतिरिक्त कोई अन्य राग का कारण बन सकता है' ॥ २६ ॥ चेतन तथा शरीर का सम्बन्ध अनादि है—यह हम अभी पीछे कह आये हैं ! इस चेतन का यह शरीर स्वकर्मनिमित्तक तथा इसके सुख दुःख का अधिष्ठान ( = अवच्छेदक, भोगाश्रय ) है ! उसके विषय में अब विचार करना है कि वह घ्राणादि की तरह एक- भूतसमवायिकारणक है, या नानाभूतों से बना है ? यह संशय क्यों हुआ ? विप्रतिपत्ति के कारण । ये विप्रतिपन्न वादी पृथिव्यादि पञ्चभूतों को सङ्ख्याविकल्प से शरीर का समवायिकारण स्थापित करते हैं । इन विभिन्न वादियों के मतों में कौन सा मत समीचीन है ?

३०. सू० ] शरीरपरीक्षाप्रकरणम् १९५

३०. सू० ] शरीरपरीक्षाप्रकरणम् १९५ पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः ॥ २७ ॥ तत्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् । कस्मात् ? गुणान्तरोपलब्धेः । गन्धवती पृथिवी, गन्धवच्च शरीरम् । अबादीनामगन्धत्वात् तत्प्रकृत्यगन्धं स्यात् । न त्विदमबादिभिरसम्पृक्तया पृथिव्याऽऽरब्धं चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयभावेन कल्पते इत्यतः पञ्चानां भूतानां संयोगे सति शरीरं भवति । भूतसंयोगो हि मिथः पञ्चानां न निषिद्ध इति । आप्यतैजसवायव्यानि लोकान्तरे शरीराणि, तेष्वपि भूतसं- योगः पुरुषार्थतन्त्र इति । स्थाल्यादिद्रव्यनिष्पत्तावपि निःसंशया नाबादिसंयोग- मन्तरेण निष्पत्तिरिति ॥ २७ ॥ पार्थिवाप्यतैजसं तद्गुणोपलब्धेः ? ॥ २८ ॥ निःश्वासोच्छ्वासोपलब्धेश्चातुर्भौतिकम् ? ॥ २९ ॥ गन्धक्लेदपाकव्यूहावकाशदानेभ्यः पाञ्चभौतिकम् ? ॥ ३० ॥ त इमे सन्दिग्धा हेतव इत्युपेक्षितवान् सूत्रकारः । कथं सन्दिग्धाः ? सति पृथ्वी गुण की उपलब्धि होने से यह मानव शरीर पार्थिव हैं ॥ २७ ॥ यह मनुष्य-शरीर पार्थिव है; क्योंकि उसमें पार्थिव गुण विशेष की उपलब्धि होती है । पृथिवी गन्धवती है, शरीर भी गन्धवान् है । यदि यह शरीर जलादिप्रकृतिक होता तो यह भी जलादि की तरह निर्गन्ध होता । परन्तु यह जलादि से सम्पृक्त हुए विना अकेले पृथ्वी से आरब्ध (निर्मित) होता तो इसमें चेष्टा, इन्द्रिय, अर्थाश्रयत्व इत्यादि न बन पाते; क्योंकि ये गुण पृथ्वी में नहीं हैं, अतः पाँचों भूतों के संयोग से ही इस शरीर की निष्पत्ति हुई है । इन पाँचों भूतों का आपस में मिलना किसी भी वादी को अनिष्ट भी नहीं है । यद्यपि दूसरे लोकों में शरीर केवल जल-वायु-तेजःप्रकृतिक है, पर उनमें भी इन भूतों का संयोग पुरुषार्थसाध्य है । स्थाल्यादि पदार्थों का निष्पादन भी निस्सन्देह जलादिसंयोग के विना नहीं हो पाता ॥ २७ ॥ शङ्का— इस शरीर को पार्थिव, आप्य तथा तैजस मान लें, उन भूतों के गुणों की उपलब्धि होने से ? ॥ २८ ॥ शरीर में निःश्वास, उच्छ्वास की उपलब्धि से इसे चातुर्भौतिक मान लें ? ॥२९॥ अथवा—इसमें गन्ध, आर्द्रता, अन्नपाक, भुक्तान्नपान, रससञ्चरण तथा दूसरे भूतों को इतस्ततः सञ्चरण के लिये अवकाशदान से इसे पाञ्चभौतिक मान लें ? ॥ ३० ॥ इन तीनों सूत्रों में कथित हेतु सन्दिग्ध हैं, अतः सूत्रकार ने इनकी उपेक्षा की । सन्दिग्ध कैसे हैं ? तत्तद्गुणवान् द्रव्य के प्रकृतिभाव में भी भूतों के धर्मों की

१९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० च प्रकृतिभावे भूतानां धर्मोपलब्धिरसति च संयोगाप्रतिषेधात् सन्निहितानामिति । यथा स्थाल्यामुदकतेजोवाय्वाकाशानामिति । तदिदमनेकभूतप्रकृति शरीरमगन्ध- मरसमरूपमस्पर्शं च प्रकृत्यनुविधानात् स्यात् । न त्विदमित्थम्भूतम्, तस्मात् ‘पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः’ ॥ २८-३० ॥ श्रुतिप्रामाण्याच्च ॥ ३१ ॥ ‘सूर्यं ते चक्षुर्गच्छतात्’ इत्यत्र मन्त्रे ‘पृथिवीं ते शरीरम्’ इति श्रूयते, तदिदं प्रकृतौ विकारस्य प्रलयाभिधानमिति । ‘सूर्यं ते चक्षुः स्पृणोमि’ इत्यत्र मन्त्रान्तरे ‘पृथिवीं ते शरीरं स्पृणोमि’ इति श्रूयते, सेयं कारणाद्विकारस्य सृष्टिर- भिधीयत इति । स्थाल्यादिषु च तुल्यजातीयानामेककार्यारम्भदर्शनाद् भिन्न- जातीयानामेककार्यारम्भानुपपत्तिः ॥ ३१ ॥ इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् [ ३२-५१ ] अथेदानीमिन्द्रियाणि प्रमेयक्रमेण विचार्यन्ते—किमाव्यक्तिकानि ? आहो- स्विद् भौतिकानीति ? उपलब्धि बन सकती है; अथवा—परस्पर संयुक्त भूतों का संयोग के अप्रतिषेध से भी गुणों को उपलब्धि हो सकती है । जैसे—एक ही स्थाली पार्थिव होती हुई भी वह्नि- संयुक्त हो तो अन्न को पका देती है, उदकसंयुक्त हो तो मध्यपाती पदार्थों को आर्द्र कर देती है, वायुसंयुक्त हो तो मध्यपाती पदार्थों का सञ्चरण करती है, आकाशसंयुक्त हो तो अन्य भूतों के कर्मों को इतस्ततः सञ्चरण के लिये अवकाश देती है । यह मानव शरीर यदि अनेकभूतप्रकृतिक होता तो तत्तद्भूतों को प्रकृति के अनुसार दूसरे के गुण दूसरे में नहीं आ सकते, अतः शरीर निर्गन्ध, नीरस, नीरूप, निःस्पर्श होता; परन्तु यह ऐसा नहीं है, अतः सिद्ध होता है कि—'इसमें गुणविशेष की विशेषोपलब्धि होने से यह पार्थिव है' ॥ २८-३० ॥ श्रुतिप्रामाण्य से भी ( मानव शरीर पार्थिव है ) ॥ ३१ ॥ 'तुम्हारे ( प्रेतात्मा के ) चक्षु सूर्य ( तेजस् ) में विलीन हो जायें' इस मन्त्र में 'तुम्हारा शरीर पृथ्वी में विलीन हो जाये'—इस प्रकार पृथ्वी प्रकृति में उसके विकार का विलय बतलाया है । 'तेरे लिये सूर्य को चक्षु रूप से सृजन करता हूँ' इस दूसरे मन्त्र में—'पृथ्वी को तेरे शरीर रूप में सृजन करता हूँ' यह कहते सुना जाता है! इसमें कारण से पृथ्वी के विकार की सृष्टि कही गयी है । स्थाल्यादि द्रव्यों में तुल्यजातियों का समान कार्य होता हुआ देखा जाता है; अतः भिन्नजातियों का समान कार्यारम्भ शरीर में अनुपपन्न है ॥ ३१ ॥ प्रमेयक्रम से, अब इन्द्रियों पर विचार किया जा रहा है—क्या ये इन्द्रियाँ सांख्य- मतानुसार अव्यक्त की विकार हैं ? या ( नैयायिकतानुसार ) भूतविकार हैं ?

३३. सू० ] इन्द्रिपरीक्षाप्रकरणम् १९७

३३. सू० ] इन्द्रिपरीक्षाप्रकरणम् १९७ कुतः संशयः ? कृष्णसारे सत्युपलम्भाद् व्यतिरिच्य चोपलम्भात् संशयः ॥ ३२ ॥ कृष्णसारं भौतिकम्, तस्मिन्ननुपहते रूपोपलब्धिः, उपहते चानुपलब्धिरिति । व्यतिरिच्य कृष्णसारमवस्थितस्य विषयस्य उपलम्भः, न कृष्णसारप्राप्तस्य । न चाप्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां तदिदमभौतिकत्वे विभुत्वात्सम्भवति । एवमुभय- धर्मोपलब्धेः संशयः ॥ ३२ ॥ साङ्ख्यमतखण्डनम् अभौतिकानीत्याह १। कस्मात् ? महदणुग्रहणात् ॥ ३३ ॥ 'महत्' इति महत्तरं महत्तमं चोपलभ्यते, यथा—न्यग्रोधपर्वतादि । 'अणु' इति अणुतरमणुतमं च गृह्यते, यथा—न्यग्रोधधानादि । तदुभयमुपलभ्यमानं चक्षुषो भौतिकत्वं बाधते । भौतिकं हि यावत्तावदेव व्याप्नोति । अभौतिकं तु विभुत्वात् सर्वव्यापकमिति ॥ ३३ ॥ यह संशय क्यों उठा ? कनीनिका के होने पर रूपोपलब्धि होने से, तथा उस कनीनिका के समीपस्थ विषय की उपलब्धि होने से ॥ ३२ ॥ कृष्णसार ( = कनीनिका ) भौतिक ( तैजस ) है । क्योंकि उसके रहने पर रूपो- पलब्धि होती है, न रहने पर नहीं हो पाती । कनीनिका से कुछ दूर पड़े पदार्थ की उपलब्धि हो पाती है, परन्तु उसको कनीनिका से सर्वथा सम्बद्ध कर देने पर रूपोपलब्धि नहीं होती । और, इन्द्रियाँ अप्राप्यकारी नहीं हैं, अतः उन्हें अभौतिक मानने पर भी विभुत्व धर्म से उनमें यह उपलब्धि बन सकती है । यों इन्द्रियों के विषय में दोनों तरह की कोटि मिलने से संशय होता है ॥ ३२ ॥ 'इन्द्रियाँ अभौतिक हैं'—ऐसा सांख्यमत हैं; कैसे ?— बड़े से बड़े तथा न्यून से न्यून परिमाण का ग्रहण होने से ॥ ३३ ॥ 'महत्' से महत्तर, महत्तम का भी ग्रहण होता है, जैसे—विशाल वट वृक्ष या पर्वत आदि । 'अणु' से भी अणुतर, अणुतम का ग्रहण होता है, जैसे—वटबीज आदि । इन दोनों—'महद्' तथा 'अणु' के कनीनिका द्वारा गृहीत होने से चक्षु का भौतिकत्व बाधित होता है, क्योंकि भौतिक विकार एक सीमित परिमाण को ही व्याप्त कर सकता है । हाँ, अभौतिक अपेक्षानुसार व्यापक परिमाण को भी व्याप्त कर सकता है; क्योंकि वह विभु है ॥ ३३ ॥ १. सांख्य इति शेषः । इदानीं सूत्रकारः सांख्यमतमुत्थाप्य 'अक्षिकनीनिकैवेन्द्रियम्' इति बौद्धमतं दूषयति ।

१९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० न महदणुग्रहणमात्रादभौतिकत्वं विभुत्वं चेन्द्रियाणां शक्यं प्रतिपत्तुम्। इदं खलु— रश्म्यर्थसन्निकर्षविशेषात् तद्ग्रहणम् ॥ ३४ ॥ तयोर्महदण्वोर्ग्रहणं चक्षूरश्मेरर्थस्य च सन्निकर्षविशेषाद्भवति, यथा-प्रदीप- रश्मेरर्थस्य चेति । रश्म्यर्थसन्निकर्षश्चावरणलिङ्गः । चाक्षुषो हि रश्मिः कुड्या- दिभिरावृतमर्थं न प्रकाशयति, यथा-प्रदीपरश्मिरिति ॥ ३४ ॥ आवरणानुमेयत्वे सतीदमाह— तदनुपलब्धेरहेतुः ॥ ३४ ॥ रूपस्पर्शवद्धि तेजः, महत्त्वदनेकद्रव्यवत्त्वाद् रूपवत्त्वाच्चोपलब्धिरिति प्रदीप- वत् प्रत्यक्षत उपलभ्येत चाक्षुषो रश्मिर्यदि स्यादिति ? ॥ ३५ ॥ नानुमीयमानस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिरभावहेतुः ॥ ३६ ॥ सन्निकर्षप्रतिषेधार्थेनावरणेन लिङ्गेनानुमीयमानस्य रश्मेर्या प्रत्यक्षतोऽनुप- [ अब नैयायिक सांख्यमत का खण्डन करता है— ] केवल महद् या अणु परिमाण- ग्रहण से इन्द्रियों का अभौतिकत्व या विभुत्व सिद्ध नहीं होता; यह— महद्-अणु का ग्रहण रश्मि तथा अर्थ के सन्निकर्षविशेष से होता है ॥ ३४ ॥ उन दोनों—महत् तथा अणु का ग्रहण चक्षूरश्मि तथा अर्थ के सन्निकर्षविशेष से होता है, जैसे—प्रदीपप्रभा तथा अर्थ के सन्निकर्ष से महदणु का ग्रहण होता है। यह रश्मि-अर्थ का सन्निकर्ष आवरण से अनुमित है । चाक्षुष रश्मि भित्ति-आदि का आवरण रहते अर्थ को प्रकाशित नहीं कर पातीं, जैसे प्रदीपप्रभा भित्ति-आवरण के रहते द्रव्य को प्रकाशित नहीं करती ॥ ३४ ॥ शङ्का—आवरण से अनुमेय मानने पर साङ्ख्यवादी कहता है— उसकी उपलब्धि न होने से वह अहेतु है ? ॥ ३५ ॥ तेज रूपस्पर्शवाला है । महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्व तथा रूपवत्त्व होने से उसकी उप- लब्धि, प्रदीपप्रभावाले दृष्टान्त की तरह, प्रत्यक्ष से हो सकती थी, यदि चाक्षुष रश्मि वहाँ होती ! तात्पर्य यह है कि अनुपलब्धिलक्षणप्राप्त भी यदि उपलभ्यमान नहीं है तो आव- रणादि का अनुमेय बनाना उचित नहीं; अन्यथा नरविषाण आदि का भी अनुमान होने लगेगा ? ॥ ३५ ॥ उत्तर— अनुमीयमान की प्रत्यक्षतः अनुपलब्धि उसके अभाव का कारण नहीं बना करती ॥ ३६ ॥ सन्निकर्षप्रतिषेधार्थक आवरण से अनुमीयमान रश्मि की प्रत्यक्षतः अनुपलब्धि रश्मि के अभाव का प्रतिपादन नहीं करती, जैसे—चन्द्रमा का परभाग या पृथ्वी का अधोभाग

३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९

३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९ लब्धिर्नासावभावं प्रतिपादयति, यथा—चन्द्रमसः परभागस्य, पृथिव्याश्चाधो- भागस्य ॥ ३६ ॥ द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोपलब्धिनियमः ॥ ३७ ॥ भिन्नः खल्वयं द्रव्यधर्मो गुणधर्मश्च, महदनेकद्रव्यञ्च १विषक्तावयवमाप्यं द्रव्यं प्रत्यक्षतो नोपलभ्यते, स्पर्शस्तु शीतो गृह्यते, तस्य द्रव्यस्यानुबन्धात् हेमन्त- शिशिरौ कल्पेते, तथाविधमेव च तैजसं द्रव्यमनुद्भूतरूपं सह रूपेण नोपलभ्यते, स्पर्शस्त्वस्योष्ण उपलभ्यते; तस्य द्रव्यस्यानुबन्धाद् ग्रीष्मवसन्तौ कल्पेते ॥ ३७ ॥ यत्र त्वेषा भवति— अनेकद्रव्यसमवायात् २ रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ३ ॥ ३८ ॥ यत्र रूपं च द्रव्यं च तदाश्रयः प्रत्यक्षत उपलभ्यते, रूपविशेषस्तु यद्भावात् क्वचिद्रूपोपलब्धिः, यदभावाच्च द्रव्यस्य क्वचिदनुपलब्धिः—स रूपधर्मोऽयमुद्भव- समाख्यात इति । अनुद्भूतरूपश्चायं नायनो रश्मिः, तस्मात् प्रत्यक्षतो नोपलभ्यत प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता तो उनके विषय में क्या हम यह मान बैठते हैं कि उनका अभाव है ! ॥ ३६ ॥ तथा द्रव्यगुणभेद से उपलब्धि में नियम होता है ॥ ३७ ॥ ये द्रव्य तथा गुण के धर्म भिन्न-भिन्न हैं। कोई प्रत्यक्षतः उपलब्ध हो जाता है, कोई नहीं होता। जैसे जलीय द्रव्य ( वायुनीत जलीय त्र्यणुकादि ) महान्, अनेकद्रव्यवान् तथा विभक्तावयव होते हुए भी प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता, परन्तु उसका शीतस्पर्श प्रत्य- क्षतः गृहीत है; उसी से द्रव्य अनुमेय है। अतः उस द्रव्य के अनुबन्ध से हेमन्त-शिशिर ऋतु की कल्पना की जाती है। इसी प्रकार, तैजस द्रव्य, जिसका रूप अनुद्भूत है, रूप से युक्त होने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता; परन्तु उसका उष्ण स्पर्श प्रत्यक्षतः अनुभूत होता है; उसीसे द्रव्य अनुमेय होता है। उस द्रव्य के अनुबन्ध से ग्रीष्म-वसन्त ऋतु की कल्पना की जाती है ॥ ३७ ॥ जहाँ यह रूपोपलब्धि होती है, वहाँ— अनेक द्रव्यों के समवाय सम्बन्ध होने से तथा ('उद्भूत' नामक) रूपविशेष से रूप- सहित द्रव्यों की उपलब्धि होती है ॥ ३८ ॥ जहाँ रूप, द्रव्य तथा तदाश्रय प्रत्यक्षतः उपलब्ध होते हैं; वहाँ रूपविशेष प्रयोजक है, जिसकी सत्ता से रूपोपलब्धि होती है, तथा अभाव से कहीं रूपोपलब्धि नहीं हो पाती— यह रूपधर्म 'उद्भव' कहलाता है। यह चाक्षुष रश्मि अनुद्भूत होने के कारण प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं हो पाती। लोक में तेज का भी धर्मभेद देखा जाता है, यथा—तेज १. विभक्तावयवम्—इति पाठः । २. अनेकद्रव्येण समवायादिति वार्त्तिकसम्मतः पाठः । ३. इदं सूत्रं वैशेषिकसूत्रेष्वपि ( ४. अ० १. आ० ६ सू० ) दृश्यते ।

२०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० इति । दृष्टश्च तेजसो धर्मभेदः—उद्भूतरूपस्पर्शं प्रत्यक्षं तेजः, यथा-आदित्य- रश्मयः; उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शं च प्रत्यक्षं तेजः, यथा-प्रदीपरश्मयः; उद्भूत- स्पर्शमनुद्भूतरूपमप्रत्यक्षम्, यथा-अवादिसंयुक्तं तेजः। अनुद्भूतरूपस्पर्शोऽ- प्रत्यक्षश्चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ३८ ॥ कर्मकारितश्चेन्द्रियाणां व्यूहः पुरुषार्थतन्त्रः ॥ ३९ ॥ यथा चेतनस्यार्थो विषयोपलब्धिभूतः सुखदुःखोपलब्धिभूतश्च कल्प्यते, तथेन्द्रियाणि व्यूढानि, विषयप्राप्त्यर्थश्च रश्मेश्चाक्षुषस्य व्यूहः । रूपस्पर्शानिभि- व्यक्तिश्च व्यवहारप्रवृत्त्यर्था१ द्रव्यविशेषे च प्रतिघातादावरणोपपत्तिर्व्यवहा- रार्था। सर्वद्रव्याणां विश्वरूपो व्यूह इन्द्रियवत् कर्मकारितः पुरुषार्थतन्त्रः । कर्म तु धर्माधर्मभूतं चेतनस्योपभोगार्थमिति । अव्यभिचाराच्च प्रतिघातो भौतिकधर्मः२ । यश्चावरणोपलम्भादिन्द्रियस्य द्रव्यविशेषे प्रतिघातः स भौतिकधर्मो न भूतानि अद्भूतरूपस्पर्श वाला प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, जैसे—सूर्य की किरणें । उद्भूतरूप तथा अनुद्भूतस्पर्श वाला तेज प्रत्यक्षतः उपलब्ध होता है, जैसे—दीपक की लो । परन्तु वही उद्भूतस्पर्श तथा अनुद्भूतरूप वाला होता हुआ प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता, जैसे जलादिसंयुक्त तेज । इस नय से चाक्षुष रश्मि ( कनीनिका ) अनुद्भूतरूपस्पर्श वाली होती हुई प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होती ॥ ३८ ॥ कर्म से प्रेरित यह इन्द्रियों की रचना उपभोग की साधिका है ॥ ३९ ॥ जिस प्रकार चेतन के अभीप्सित या जिहासित अर्थ सुख दुःख उसके हेतु हैं, उसी प्रकार चेतन के लिये सुखदुःखोपलब्धिरूप विषयोपलब्धि की कल्पना की जाती है, उसी चेतन के लिये ये इन्द्रियाँ भी रची गयी हैं। विषयसंयोग के लिये चाक्षुषरश्मि की रचना की गयी है । रूप या स्पर्श का अनुभूतत्व व्यवहारप्रवृत्ति के लिये है । द्रव्य-विशेष में गतिनिरोधक संयोग से चक्षु की आवरणोपपत्ति भी व्यवहार के लिये है । सभी द्रव्यों की विश्व के रूप में विचित्र रूपरचना इन्द्रियों की तरह ही कर्मप्रेरित है, यह रचना पुरुषार्थ- साधिका है । तथा कर्म धर्माधर्म रूप से चेतन के उपभोग के लिये है । व्यभिचार न होने से यह गतिनिरोधक संयोग होना भौतिक धर्म माना गया है । जो यह आवरण की उपलब्धि से इन्द्रिय का द्रव्यविशेष में गतिनिरोधक संयोग है, वह १. ०प्रक्लृप्त्यर्था—इति पाठ० । २. केविट्टीकाकाराः सूत्रकारीयं सूत्रमिदं मन्यन्ते । वस्तुतस्तु भाष्यकारीयमेवेदं सूत्रम्; न्यायसूचीनिबन्धेऽदृष्टत्वात् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४०. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०१

४०. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०१ व्यभिचरति, नाभौतिकं प्रतिघातधर्मकं दृष्टमिति । अप्रतिघातस्तु व्यभिचारी; भौतिकाभौतिकयोः समानत्वादिति । यदपि मन्यते—प्रतिघाताद् भौतिकानीन्द्रियाणि, अप्रतिघातादभौतिकानीति प्राप्तम् ? दृष्टश्चाप्रतिघातः काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ? तन्न युक्तम्; कस्मात् ? यस्माद्भौतिकमपि न प्रतिहन्यते, काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितप्रका- शात् प्रदीपरश्मीनाम्, स्थाल्यादिषु पाचकस्य तेजसोऽप्रतिघातः ॥ ३९ ॥ उपपद्यते चानुपलब्धिः, कारणभेदात् । मध्यन्दिनोल्काप्रकाशानुपलब्धिवत् तदनुपलब्धिः ॥ ४० ॥ यथा 'अनेकद्रव्येण समवायाद्रूपविशेषाच्चोपलब्धिः' (३.१.३८) इति सत्यु- पलब्धिकारणे मध्यन्दिनोल्काप्रकाशो नोपलभ्यते आदित्यप्रकाशेनाभिभूतः, एवं महदनेकद्रव्यवत्ताद् रूपविशेषाच्चोपलब्धिरिति सत्युपलब्धिकारणे चाक्षुषो रश्मिर्नोपलभ्यते निमित्तान्तरतः। तच्च व्याख्यातम्—अनुद्भूतरूपस्पर्शस्य द्रव्यस्य प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धिरिति अत्यन्तानुपलब्धिश्चाभावकारणम् ॥ ४० ॥ भौतिक धर्म है, तथा वह भूतों से व्यभिचरित नहीं होता । अर्थात् ऐसा संयोग कहीं भी अभौतिक नहीं देखा गया । हाँ, अप्रतिघात ( अतादृश संयोग ) अवश्य व्यभिचारी हो सकता हैं; क्योंकि वह भौतिक, अभौतिक—दोनों में ही समानतया घट सकता है । जो यह मानता है—'प्रतिघात से इन्द्रियाँ भौतिक सिद्ध होती हैं, अप्रतिघात से भी हो सकती है; क्योंकि काचाभ्रपटलस्फटिकादि में अप्रतिघात देखा जाने से इन्द्रियों में भी अप्रतिघात बन सकता है, तब तो इन्द्रियों को अभौतिक भी मानना पड़ेगा ?' यह अयुक्तियुक्त है; क्योंकि कभी-कभी भौतिक में प्रतिघात नहीं भी होता, जैसे काचाभ्र- पटलस्फटिकादि के मध्य से भी प्रदीपरश्मियों का प्रकाश निकल ही जाता है । स्थाली आदि में भी विक्लेित्तिजनक तेज ( अग्नि ) का अप्रतिघात देखा जाता है ॥ ३९ ॥ हां, कारणभेद से वह अनुपलब्धि भी उपपन्न होती है । मध्याह्न में ताराप्रकाश की अनुपलब्धि की तरह उसकी अनुपलब्धि बन सकती है ॥ ४० ॥ जैसे "अनेक द्रव्यों से समवायसमवेतत्व सम्बन्ध और 'उद्भूत' नामक रूपविशेष से द्रव्योपलब्धि होती है" ( ३.१.३८ )—इस नियम से उपलब्धिकारण होने पर भी मध्य दिन में ताराओं का प्रकाश नहीं दिखायी पड़ता; क्योंकि वह आदित्यप्रकाश से अभिभूत रहता है, उसी प्रकार 'महत्त्ववान्, अनेकद्रव्यवान् होने से रूपविशेष से उप- लब्धि होती है' (वै० सू० ४.१.६) इस नियम से उपलब्धिकारण होने पर भी चाक्षुष- की उपलब्धि रश्मि निमित्तान्तर से नहीं हो पाती । यह हम पीछे कह ही चुके हैं कि अनुद्भूतरूपस्पर्शवान् द्रव्य की प्रत्यक्षतः उपलब्धि नहीं होती। अत्यन्तानुपलब्धि ('यदि स्यात् तर्हि उपलभ्येत' ऐसी योग्यानुपलब्धि) तदभाव का कारण बन सकती है ॥ ४० ॥

२०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० यो हि ब्रवीति—'लोष्टप्रकाशो मध्यन्दिने आदित्यप्रकाशाभिभावान्नोलभ्यते' इति, तस्यैतत् स्यात्— न; रात्रावप्यनुपलब्धेः ॥ ४१ ॥ अप्यनुमानतोऽनुपलब्धेरिति । एवमत्यन्तानुपलब्धेर्लोष्टप्रकाशो नास्ति, न त्वेवं चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ४१ ॥ उपपन्नरूपा चेयम्— बाह्यप्रकाशानुग्रहाद् विषयोपलब्धेरनभिव्यक्तितोऽनुपलब्धिः ॥ ४२ ॥ बाह्ये न प्रकाशेनानुगृहीतं चक्षुर्विषयग्राहकं तद्भावेऽनुपलब्धिः । सति च प्रकाशानुग्रहे शीतस्पर्शोपलब्धौ च सत्यां तदाश्रयस्य द्रव्यस्य चक्षुषाऽग्रहणम्, रूपस्यानुद्भूतत्वात् । सेयं रूपानभिव्यक्तितो रूपाश्रयस्य द्रव्यस्यानुपलब्धिर्दृष्टा । तत्र यदुक्तम्—'तदनुपलब्धेरहेतुः' (३.१.३५) इत्येतदयुक्तम् ॥ ४२ ॥ कस्मात् पुनरभिभवोऽनुपलब्धिकारणं चाक्षुषस्य रश्मेर्नोच्यत इति ? अभिव्यक्तौ चाभिभवात् ॥ ४३ ॥ बाह्यप्रकाशानुग्रहनिरपेक्षतायां चेति चार्थः । यद्रूपमभिव्यक्तमुद्भूतं बाह्य- जो यह कहें—'ढेले का प्रकाश भी मध्याह्न में आदित्य के प्रकाश से अभिभूत होने के कारण उपलब्ध नहीं होता', उनको यह उत्तर देना चाहिये— रात्रि में भी उसकी उपलब्धि न होने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ४१ ॥ उस ढेले के प्रकाश की अनुमान से भी उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार उसकी अत्यन्तानुपलब्धि से 'ढेले में प्रभा नहीं होती'—यही सिद्ध होता है । ऐसी अत्यन्तानुपलब्धि अनुमान से चक्षूरश्मि में सिद्ध नहीं की जा सकती ॥ ४१ यह चक्षूरश्मि में अनुपलब्धि उपपन्नरूपवाली भी है— बाह्य प्रकाश के सहारे रूपोपलब्धि होने से उस रूप की अनभिव्यक्ति से भी अनुपलब्धि हो सकती है ॥ ४२ ॥ चक्षु बाह्य प्रकाश का सहारा लेकर ही विषय को गृहीत करता है उस के रहते भी रूप की उपलब्धि नहीं हो पाती । अर्थात् प्रकाश का सहारा मिलने पर, तथा शीतस्पर्श की उपलब्धि होने पर भी रूपानभिव्यक्ति से रूपाश्रित द्रव्य ( तारागण आदि ) की अनुपलब्धि देखी जाती है; क्योंकि वह रूप उद्भूत नहीं है । उसके लिये आपका 'उसके न मिलने से वह नहीं है' ऐसा कहना अयुक्तियुक्त है ॥ ४२ ॥ तो यही क्यों नहीं कहते कि चाक्षुषरश्मि की अनुपलब्धि में उसका अभिभव ही कारण है ? नहीं; क्योंकि अभिव्यक्ति में भी अभिभव देखा जाता है ॥ ४३ ॥ 'बाह्यप्रकाश के सहारे की अपेक्षा न रखने की अवस्था में' सूत्रस्थ 'च' शब्द का अर्थ है । जिसका रूप अभिव्यक्त तथा उद्भूत होकर बाह्य प्रकाश के सहारे की जरूरत नहीं

४५. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०३

४५. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०३ प्रकाशानुग्रहं च नापेक्षते तद्विषयोऽभिभवः, विपर्ययेऽभिभवाभावात् । अनुद्भूत- रूपत्वाच्चानुपलभ्यमानं बाह्यप्रकाशानुग्रहाच्चोपलभ्यमानं नाभिभूयत इति एवमुपपन्नम्—अस्ति चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ४३ ॥ नक्तञ्चरनयनरश्मिदर्शनाच्च ॥ ४४ ॥ दृश्यन्ते हि नक्तं नयनरश्मयो नक्तञ्चराणां वृषदंशप्रभृतीनाम् । तेन शेष- स्यानुमानमिति । जातिभेदवदिन्द्रियभेद इति चेत् ? धर्मभेदमात्रं चानुपपन्नम्; आवरणस्य प्राप्तिप्रतिषेधार्थस्य दर्शनादिति ॥ ४४ ॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वानुपपत्तिः, कस्मात् ? अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ? ॥ ४५ ॥ तृणादि सर्पद् द्रव्यं काचे, अभ्रपटले वा प्रतिहतं दृष्टमव्यवहितेन सन्निकृष्यते व्याहन्यते वै प्राप्तिर्व्यवधानेनेति । यदि च रश्म्यर्थसन्निकर्षो ग्रहणहेतुः स्याद्, न व्यवहितस्य सन्निकर्ष इत्यग्रहणं स्यात् । अस्ति चेयं काचाभ्रपटल- रखता, उसका अभिभव हो सकता है, इसके विपरीत का नहीं । अर्थात् अनुद्भूतरूप होने से अनुपलभ्यमान, और बाह्य प्रकाश के सहारे से उपलभ्यमान द्रव्य अभिभूत नहीं होता । यों सिद्ध हो गया कि चाक्षुष रश्मि है ॥ ४३ ॥ रात्रि में घूमने फिरने वाले प्राणियों की चक्षूरश्मि भी देखी जाती है ॥ ४४ ॥ रात्रि में विचरण करनेवाले प्राणी विडालादि की चक्षूरश्मि रात्रिकाल में भी दीख पाती है । अतः उससे मनुष्यादि-नेत्र का अनुमान हो सकता है । जातिभेद की तरह इन्द्रियों का भी भेद मान लें, ताकि विडालादि-चक्षूरश्मियों से मनुष्य चक्षु का अनुमान न हो सके ? तो भी धर्मभेद अनुपपन्न ही रह जायेगा; क्योंकि वहाँ संयोगप्रतिषेधार्थक आवरण तो समान रूप से मिलता ही है ॥ ४४ ॥ [ यों तैजसत्व सिद्ध कर, अब विषयदेशप्राप्यकारित्वपक्ष का स्थापन करते हैं—] शंका—इन्द्रिय तथा अर्थ का सन्निकर्ष ज्ञानकारण कैसे होगा ? है, क्योंकि— चक्षुरादि अप्राप्य के ज्ञानसाधन हैं, काच, अभ्रपटल, स्फटिकादि के व्यवधान में भी उपलब्धि देखी जाने से ? ॥ ४५ ॥ लोक में, सरकता हुआ तृणादि पदार्थ काच या अभ्रपटल में निरुद्धगतिक तथा अव्यवधान होने पर वही पदार्थ काचान्तर्गत पदार्थ से सम्बद्ध होता देखा गया है, और संयोग कुड्यादि के व्यवधान से निरुद्ध हो जाता है । यदि चक्षूरश्मि तथा अर्थ का सन्निकर्ष ज्ञानकारण होता तो व्यवहित के साथ सन्निकर्ष होता नहीं, अतः उसका ज्ञान नहीं होता । जब कि लोक में काच, अभ्रपटल, स्फटिकादि से व्यवधान होने पर भी व्यवहित CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० स्फटिकान्तरितोपलब्धिः, सा ज्ञापयति—अप्राप्यकारीणीन्द्रियाणि, अत एवा- भौतिकानि । प्राप्यकारित्वं हि भौतिकधर्म इति ॥ ४५ ॥ कुड्यान्तरितानुपलब्धेरप्रतिषेधः ॥ ४६ ॥ अप्राप्यकारित्वे सतीन्द्रियाणां कुड्यान्तरितस्यानुपलब्धिर्न स्यात् ॥ ४६ ॥ प्राप्यकारित्वेऽपि तु काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धिर्न स्यात् ? अप्रतिघातात् सन्निकर्षोपपत्तिः ॥ ४७ ॥ न च काचः, अभ्रपलं वा नयनरश्मि विष्टभ्नाति, सोऽप्रतिहन्यमानः सन्निन- कृष्टयत इति ॥ ४७ ॥ यश्च मन्यते—न भौतिकस्याप्रतिघात इति ? तन्न; आदित्यरश्मेः स्फटिकान्तरितेऽपि दाह्येऽविघातात् ॥ ४८ ॥ आदित्यरश्मेरविघातात्, स्फटिकान्तरितेऽप्यविघातात्, दाह्येऽविघातात् । अविघातादिति च पदाभिसम्बन्धाद् वाक्यभेद इति । प्रतिवाक्यं¹ चार्थभेद इति । आदित्यरश्मिः कुम्भादिषु न प्रतिहन्यते; अविघातात् कुम्भस्थमुदकं तपति, उपलब्धि देखी जाती है, अतः वह सिद्ध करती है कि इन्द्रियां अप्राप्य का ज्ञान कराने वाली हैं। अतएव ये अभौतिक भी हैं, क्योंकि प्राप्त का ज्ञान कराना भौतिक धर्म हैं ? ॥ ४५ ॥ कुड्यादि के व्यवधान द्वारा अनुपलब्धि हेतु से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ४६ ॥ इन्द्रियों को अप्राप्यकारित्व मानने पर कुड्यादि से व्यवहित की अनुपलब्धि नहीं बनेगी ॥ ४६ ॥ प्राप्यकारित्व मानने पर भी तो काच, अभ्रपटल, स्फटिकादि से व्यवहित की उप- लब्धि नहीं होगी ? अप्रतिघात ( गत्यनिरोध ) से सन्निकर्षोपलब्धि हो जायगी ॥ ४७ ॥ काच या अभ्रपटल चक्षूरश्मि की गति में अवरोध नहीं करते । अतः वह अनिरुद्ध होती हुई अर्थ से सन्निकृष्ट हो जाती है ॥ ४७ ॥ जो यह मानता है—'भौतिक का गत्यनिरोध नहीं होता', यह उचित नहीं; आदित्यरश्मि के स्फटिक से व्यवहित होने पर भी दाह्यकर्म में गतिनिरोध न होने से ॥ ४८ ॥ . इस सूत्र में 'अविघातात्' इस पद के अभिसम्बन्ध से आदित्यरश्मि के अविघात से, स्फटिक के अविघात से, दाह्य में अविघात से—ये तीन वाक्य हैं। वाक्यों के अनुसार ही तीन अर्थ हैं। आदित्यरश्मि घटादिक में निरुद्ध नहीं होतीं, अविघात होने से। क्योंकि १. 'यथावाक्यम्'—इति पाठ० ।

४९. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०५

४९. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०५ प्राप्तौ हि द्रव्यान्तरगुणस्य उष्णस्य स्पर्शस्य ग्रहणम्, तेन च शीतस्पर्शाभिभव इति । स्फटिकान्तरितेऽपि प्रकाशनीये प्रदीपपरश्मीनामप्रतिघातः, अप्रतिघातात् प्राप्तस्य ग्रहणमिति । भर्जनकपालादिस्थं च द्रव्यमाग्नेयेन तेजसा दह्यते, तत्रा- विघातात् प्राप्तिः, प्राप्तौ तु दाहः । नाप्राप्यकारि तेज इति । अविघातादिति च केवलं पदमुपादीयते । कोऽयमविघातो नाम ? अव्यूह्य- मानावयवेन व्यवधायकेन द्रव्येण सर्वतो द्रव्यस्याविष्टम्भः, क्रियाहेतोरप्रतिबन्धः, प्राप्तेरप्रतिषेध इति । दृष्टं हि कलशनिषिक्तानामपां बहिः शीतस्पर्शस्य ग्रहणम् । न चेन्द्रियेणासन्निकृष्टस्य द्रव्यस्य स्पर्शोपलब्धिः । दृष्टौ च प्रस्पन्दपरिस्रवौ । काचाभ्रपटलादिभिर्नयनरश्मेरप्रतिघाताद्विभिद्यार्थेन सहसन्निकर्षादुपपन्नं ग्रहण- मिति ॥ ४८ ॥ नेतरेतरधर्मप्रसङ्गात् ? ॥ ४९ ॥ काचाभ्रटपलादिवद्वा कुड्यादिभिरप्रतिघातः, कुड्यादिवद्वा काचाभ्रपटला- दिभिः प्रतिघात इति प्रसज्यते, नियमे कारणं वाच्यमिति ? ॥ ४९ ॥ घटस्थ जल उष्ण हो जाता है । संयोग होने पर, अन्य तेज के गुण उष्ण स्पर्श का ग्रहण हो जाता है, तथा जल का अपना गुण शीतस्पर्श अभिभूत हो जाता है । इसी तरह स्फटिक से व्यवहित प्रकाश्य अर्थ के सन्निकर्ष में प्रदीपपरश्मियों का निरोध नहीं होता, अविघात होने से संयुक्त अर्थ का ग्रहण हो जाता है । इसी प्रकार भ्राष्ट्र के खप्पर में पड़ा चणकादि पदार्थ आग्नेय तेज से भुन जाता है, वहां उस तेज का संयोग अविघात से ही होता है । संयोग से वहाँ दाह उत्पन्न होता है ! अतः तेज अप्राप्यकारी नहीं है । 'अविघात' यह पद केवल ( विशेषणशून्य ) लिया जाता है । यह अविघात क्या है ? वियुक्त न हो सकने योग्य अवयवों वाले व्यवधायक द्रव्य से द्रव्य का सर्वतः अविष्टम्भ ( गति का अप्रतिबन्ध ) = प्राप्ति ( संयोगव्यापार ) का अप्रतिबन्ध, अर्थात् संयोग का अप्रतिबन्ध । लोक में हम देखते हैं कि घट में भरे जल का शीतस्पर्श बाहर गृहीत होता है, जब कि इन्द्रियां असन्निकृष्ट द्रव्य के स्पर्श का ग्रहण नहीं कर पातीं । उसी तरह प्रस्पन्द ( अन्तःस्थितद्रव्य का बहिःसरण ), प्रस्रवण भी देखे जाते हैं । अतः काच, अभ्रपटलादि से चक्षूरश्मि का अप्रतिघात होने से वह काचावयव विभक्त होकर अर्थ के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने से सन्निकृष्ट का ग्रहण हो जाता है ॥ ४८ ॥ शंका— इतरेतरधर्मप्रसङ्ग से प्रतिघात नहीं बनेगा ? ॥ ४९ ॥ काच, अभ्रपटलादि की तरह कुड्यादि से अप्रतिघात, या कुड्यादि की तरह काच अभ्रपटलादि से प्रतिघात—यों उभयथा प्रसक्ति होने लगेगी । अतः आप अपने नियम में कोई हेतु बतायें ? ॥ ४९ ॥

पादन होने लगे, या जल की तरह अग्नि का भी प्रतिपादन न हो । कारण क्या है ?

२०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० आदर्शोदकयोः प्रसादस्वाभाव्याद् रूपोपलब्धिवत्तदुपलब्धिः ॥ ५० ॥ आदर्शोदकयोः प्रसादो रूपविशेषः स्वो धर्मः, नियमदर्शनात्; प्रसादस्य वा स्वो धर्मो रूपोपलम्भनम् । यथाऽऽदर्शप्रतिहतस्य परावृत्तस्य नयनरश्मेः स्वेन मुखेन सन्निकर्षे सति स्वमुखोपलम्भनं प्रतिबिम्बग्रहणाख्यमादर्शरूपानुग्रहात् तन्निमित्तं भवति, आदर्शरूपोपघाते तदभावाद्, कुड्यादिषु च प्रतिबिम्बग्रहणं न भवति; एवं काचाभ्रपटलादिभिरविघातश्चक्षूरश्मेः, कुड्यादिभिश्च प्रति- घातः; द्रव्यस्वभावनियमादिति ॥ ५० ॥ दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ ५१ ॥ प्रमाणस्य तत्त्वविषयत्वात् । न खलु भोः ! परीक्षमाणेन दृष्टानुमिता अर्थाः शक्या नियोक्तुम्-एवं भवतेति, नापि प्रतिषेद्धुम्-एवं न भवतेति । न हीद- मुपपद्यते-रूपवद्गन्धोऽपि चाक्षुषो भवत्विति, गन्धवद्वा रूपं चाक्षुषं मा भूदिति, अग्निप्रतिपत्तिवद् धूमेनोदकप्रतिपत्तिरपि भवत्विति, उदकाप्रतिपत्तिवद्वा धूमे- नाग्निप्रतिपत्तिरपि मा भूदिति । किं कारणम् ? यथा खल्वर्था भवन्ति य एषां स्वो भावः स्वो धर्म इति, तथाभूताः प्रमाणेन प्रतिपद्यते इति । तथाभूत- आदर्श तथा उदक के स्वच्छतारूप धर्म से रूपोपलब्धि की तरह उक्त उपलब्धि बन जायेगी ॥ ५० ॥ आदर्श (शीशा) तथा उदक का स्वच्छतानामक रूपविशेष नियमतः देखा जाने से नियत स्वधर्म है, अथवा स्वच्छता का स्वधर्म रूपोपलब्धि कराना है । जैसे—आदर्श का व्यवधान पाकर लौटती हुई नयनरश्मि का स्वमुख से सन्निकर्ष होने पर 'प्रतिविम्ब-ज्ञान' नामक स्वमुखोपलब्धि आदर्श की स्वच्छता के सहारे से तन्निमित्तक हो जाती है, आदर्शस्थ रूपोपघात होने पर वह नहीं हो पाती । इसी तरह काच या अभ्रपटलादि का अविघात, चक्षूरश्मि का कुडचादि से प्रतिघात—ये दोनों भी द्रव्यस्वभावनियम से बनते हैं ॥ ५० ॥ प्रत्यक्ष तथा अनुमान से सिद्ध विषयों के बारे में नियोग (आज्ञा) या निषेध नहीं बनते ॥ ५१ ॥ प्रमाण यथार्थवस्तुविषयक होता है । अरे भाई ! परीक्षकों द्वारा प्रत्यक्षकृत तथा अनुमित विषयों के बारे में अपनी इच्छा से नियम बनाकर 'आप ऐसा करें' यह आज्ञा या 'आप ऐसा न करें' यह निषेध नहीं बना करता । यह कभी भी नहीं हो सकता कि रूप की तरह गन्ध भी चक्षु से गृहीत होने लगे, या गन्ध की तरह रूप भी चक्षु से गृहीत न हो । और ऐसा भी नहीं होता कि धूम से अग्नि के प्रतिपादन की तरह जल का प्रति- पादन होने लगे, या जल की तरह अग्नि का भी प्रतिपादन न हो । कारण क्या है ? जैसे विषय होते हैं और जैसी उनकी सत्ता तथा धर्म होते हैं वैसे ही वे (तद्धर्मयुक्त)

५३. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०७

५३. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०७ विषयकं हि प्रमाणमिति । इमी खलु नियोगप्रतिषेधौ भवता देशितौ—काचाभ्र- पटलादिवद्वा कुड्यादिभिरप्रतिघातो भवतु, कुड्यादिवद्वा काचाभ्रपटलादिभिर- प्रतिघातो मा भूदिति ? न; दृष्टानुमिताः खल्विमे द्रव्यधर्माः, प्रतिघाताप्रति- घातयोर्ह्युपलब्ध्यनुपलब्धी व्यवस्थापिके। व्यवहितानुपलब्ध्याऽनुमीयते—कुड्या- दिभिः प्रतिघातः, व्यवहितोपलब्ध्याऽनुमीयते—काचाभ्रपटलादिभिरप्रतिघात इति ॥ ५१ ॥ इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ५२-६२ ] अथापि खल्वेकमिदमिन्द्रियम् ? बहूनीन्द्रियाणि वा ? कुतः संशयः ? स्थानान्यत्वे नानात्वादवयविनानास्थानत्वाच्च संशयः ॥ ५२ ॥ बहूनि द्रव्याणि नानास्थानानि दृश्यन्ते, नानास्थानश्च सन्नेकोऽवयवी चेति । तेनेन्द्रियेषु भिन्नस्थानेषु संशय इति ॥ ५२ ॥ एकमिन्द्रियम्; त्वग्व्यतिरेकात् ? ॥ ५३ ॥ त्वगेकमिन्द्रियमित्याह । कस्मात् ? अव्यतिरेकात् । न त्वचा किञ्चिद-

प्रमाण से प्रतिपन्न हो जाते हैं। प्रमाण भी तथा भूतविषयक (सत्यार्थप्रकाशक) होते हैं। आपने ये नियोग तथा प्रतिषेध प्रकृति में बतलाये—काच, अभ्रपटलादि की तरह कुड्यादि से अप्रतिघात हो (नियोग), या कुड्यादि की तरह काचाभ्रपटलादि से अप्रति- घात न हो (प्रतिषेध)—ये दोनों नहीं बनेंगे; क्योंकि ये द्रव्यधर्म या तो प्रत्यक्षगम्य हैं, या अनुमेय । उपलब्धि या अनुपलब्धि प्रतिघात तथा अप्रतिघात की व्यवस्थापिका हो सकती हैं। व्यवधान होने पर व्यवहित की अनुपलब्धि से अनुमान होता है कि कुड्यादि से प्रतिघात होता है, व्यवधान होने पर भी उपलब्धि से अनुमान होता है कि काचा- भ्रपटलादि से अप्रतिघात होता है ॥ ५१ ॥ एक इन्द्रिय है, या बहुत सी इन्द्रियां हैं ?—यह संशय क्यों हुआ ? स्थान के अन्य होने पर अनेकत्व देखा जाने से, तथा एक अनवयविद्रव्य के अनेक स्थानों में देखा जाने से ॥ ५२ ॥ बहुत से द्रव्य अनेक स्थानों में देखे जाते हैं, और कई वार एक ही अवयवी अनेक स्थानों में देखा जाता है। अतः उक्त उभयविध संशय भिन्न स्थान वाली इन्द्रियों के बारे में उत्पन्न हुआ ॥ ५२ ॥ शङ्का—इन्द्रिय एक है; क्योंकि अभेद सम्बन्ध से त्वक् (नामक एक ही इन्द्रिय है) ? ॥ ५३ ॥ पूर्वपक्षी कहता है कि 'त्वग्' ही एक इन्द्रिय हैं; क्योंकि वहाँ अभेद सम्बन्ध है। ऐसा कौन सा इन्द्रियाधिष्ठान है, जो त्वक् ने न प्राप्त किया हो, या त्वक् के न रहने पर कौन सा विषय

२०८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० निन्द्रियाधिष्ठानं न प्राप्तम्, न चासत्यां त्वचि किञ्चिद्विषयग्रहणं भवति, यया सर्वेन्द्रियस्थानानि व्याप्तानि, यस्यां च सत्यां विषयग्रहणं भवति, सा त्वगेक- मिन्द्रियमिति ? न; इन्द्रियान्तरार्थानुपलब्धेः। स्पर्शोपलब्धिलक्षणायां सत्यां त्वचि गृह्यमाणे त्वगिन्द्रियेण स्पर्शे इन्द्रियान्तरार्था रूपादयो न गृह्यन्ते अन्धादिभिः। न स्पर्श- ग्राहकादिन्द्रियादिन्द्रियान्तरमस्तीति स्पर्शवदन्धादिभिर्गृह्येरन् रूपादयः, न च गृह्यन्ते; तस्मान्नैकमिन्द्रियं त्वगिति। त्वगवयवविशेषेण धूमोपलब्धिवत्तदुपलब्धिः। यथा त्वचोऽवयवविशेषः कश्चि- च्चक्षुषि सन्निकृष्टो धूमस्पर्शं गृह्णाति नान्यः, एवं त्वचोऽवयवविशेषा रूपादि- ग्राहकाः, तेषामुपघातादन्धादिभिर्न गृह्यन्ते रूपादय इति ? व्याहतत्वादहेतुः। त्वग्व्यतिरेकादेकमिन्द्रियमित्युक्त्वा 'त्वगवयवविशेषेण धूमोपलब्धिवद्रूपाद्युपलब्धिः' इत्युच्यते। एवं च सति, नानाभूतानि विषयग्राह- काणि, विषयव्यवस्थानात्; तद्भावे विषयग्रहणस्य भावात्, तदुपघाते चाभावात्। तथा च पूर्वो वाद उत्तरेण वादेन व्याहन्यत इति। गृहीत हो सकता है ! अतः जिससे सभी इन्द्रियस्थान व्याप्त हैं, या जिसके रहने पर सब विषयों का ग्रहण हो पाता है, वह 'त्वग्' ही एक इन्द्रिय है ? उत्तर—नहीं, क्योंकि त्वगिन्द्रिय से दूसरी इन्द्रियों के विषय उपलब्ध नहीं हो पाते। स्पर्शोपलब्धिलक्षणवाली त्वगिन्द्रिय द्वारा गृह्यमाण स्पर्श से अन्ध पुरुष रूपादि का ग्रहण नहीं कर पाते ! यदि स्पर्शग्राहक इन्द्रिय से अतिरिक्त अन्य इन्द्रियाँ न होती तो स्पर्श की तरह रूपादि का ज्ञान भी अन्य पुरुषों को होना चाहिये। होता है नहीं, अतः निश्चित है कि एक 'त्वग्' ही इन्द्रिय नहीं है ( अपितु अन्य इन्द्रियाँ भी हैं )। 'त्वगवयव ही इन्द्रियाँ हैं' ऐसा मानकर त्वगवयवविशेष से धूमोपलब्धि की तरह तत्तदर्थ की उपलब्धि हो जायेगी। जैसे त्वग् का कोई अवयवविशेष चक्षु के समीप होता हुआ धूमस्पर्श का ग्रहण कर लेता है, अन्य अवयव नहीं; इसी तरह त्वग् के अवयवविशेष रूपादि के ज्ञाता हैं, उन अवयवविशेषों के उपघात से अन्ध पुरुषों को रूपादि गृहीत नहीं हो पाते ? वचनविरोध होने से यह हेतु नहीं बनता। पहले तो कहा था कि 'अभेद होने से केवल एक त्वगिन्द्रिय है'; अब कहते हो 'त्वगवयवविशेष से धूमाद्युपलब्धि की तरह रूपादि की उपलब्धि हो जाती है', ऐसा मानने पर विषयव्यवस्था से विषयग्राहक अनेक होंगे, जब वे होंगे तो विषयज्ञान हो जायगा, उनके उपघात होने पर विषयज्ञान न होगा। यों आपका वह पूर्वकथन इस उत्तरकथन से विरुद्ध पड़ रहा है।

५५. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २०९

५५. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २०९ सन्दिग्धश्चाव्यतिरेकः । पृथिव्यादिभिरपि भूतैरिन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि, न च तेष्वसत्सु विषयग्रहणं भवतीति । तस्मान्न त्वगन्यद्वा सर्वविषयमेक- मिन्द्रियमिति ॥ ५३ ॥ न युगपदर्थानुपलब्धेः ॥ ५४ ॥ आत्मा मनसा सम्बध्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियं सर्वार्थैः सन्निकृष्टमिति— आत्मेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षेभ्यो युगपद् ग्रहणानि स्युः । न च युगपद्रूपादयो गृह्यन्ते, तस्मान्नैकमिन्द्रियं सर्वविषयकमस्तीति । असाहचर्याच्च विषयग्रहणानां नैकमिन्द्रियं सर्वविषयकम्, साहचर्यं हि विषयग्रहणानामन्याद्यनुपपत्तिरिति ॥५४॥ विप्रतिषेधाच्च न त्वगेका ॥ ५५ ॥ न खलु त्वगेकमिन्द्रियम्; व्याघातात् । त्वचा रूपाण्यप्राप्तानि गृह्यन्त इति, अप्राप्यकारित्वे स्पर्शादिष्वप्येवं प्रसङ्गः । स्पर्शादीनां च प्राप्तानां ग्रहणाद् रूपा- दीनां प्राप्तानां ग्रहणमिति प्राप्तम् । प्राप्याप्राप्यकारित्वमिति चेत् ? आवरणानुपपत्तेर्विषयमात्रस्य ग्रहणम् । अथापि मन्येत—प्राप्ताः स्पर्शादयस्त्वचा गृह्यन्ते, रूपाणि त्वप्राप्तानीति ? एवं अभेद हेतु भी सन्दिग्ध है । पृथिवी आदि अन्य भूतों द्वारा इन्द्रियाधिष्ठान व्याप्त हैं, उन भूतों के रहे बिना विषयज्ञान नहीं हो सकता । अतः त्वग्, या कोई अन्य इन्द्रिय एकाकी सर्वविषयग्राहक नहीं है ॥ ५३ ॥ अर्थों को एक साथ उपलब्धि न होने से एक ही इन्द्रिय नहीं है ॥ ५४ ॥ 'आत्मा मन से सम्बद्ध होता है, मन इन्द्रिय से, इन्द्रिय सब अर्थों से सन्निकृष्ट हैं'— इस सिद्धान्त से आत्मा, मन, इन्द्रिय, अर्थ के सन्निकर्षों से एक ही साथ अनेक ज्ञान होने चाहिये ! जब कि रस-रूपादिज्ञान एक साथ नहीं होते । अतः यह निश्चित है कि सर्व- विषयग्राहक एक इन्द्रिय नहीं है । यदि युगपदर्थज्ञान मानोगे तो अन्धादि को भी स्पर्श के साथ-साथ रूपादि का ज्ञान होने लगेगा ॥ ५४ ॥ विप्रतिषेध के कारण एक त्वग् ही इन्द्रिय नहीं है ॥ ५५ ॥ अर्थविरोध होने से त्वग् ही एक इन्द्रिय नहीं है; क्योंकि त्वग् से रूप अप्राप्त होते हुए गृहीत होते हैं। यों अप्राप्यकारित्व मानने पर स्पर्शादि में भी अप्राप्यकारित्वप्रसंग होने लगेगा । प्राप्त स्पर्शादि के ग्रहण से प्राप्त रूपादि का भी ग्रहणप्रसङ्ग प्राप्त होगा । यदि इन्द्रिय को प्राप्याप्राप्यकारित्व मानें तो आवरणानुपपत्ति होने से विषयमात्र का ग्रहण होने लगेगा। यदि यह मानें कि 'प्राप्य स्पर्शादि त्वग् से गृहीत हो जाते हैं, किन्तु रूपादि न्या० द० : १४

एकत्वप्रतिषेधाच्च नानात्वसिद्धौ स्थापनाहेतुरप्युपादीयते—

२१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० सति नास्यावरणम्, आवरणानुपपत्तेश्च रूपमात्रस्य ग्रहणं व्यवहितस्य चाव्य- वहितस्य चेति। दूरान्तिकानुविधानं च रूपोपलब्ध्यनुपलब्ध्योर्न स्यात्। अप्राप्तं त्वचा गृह्यते रूपमिति दूरे रूपस्याग्रहणम्, अन्तिके च ग्रहणम्—इत्येतन्न स्यादिति ॥ ५५ ॥ एकत्वप्रतिषेधाच्च नानात्वसिद्धौ स्थापनाहेतुरप्युपादीयते— इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् ॥ ५६ ॥ अर्थः प्रयोजनम्, तत् पञ्चविधमिन्द्रियाणाम्, स्पर्शनेनेन्द्रियेण स्पर्शग्रहणे सति न तेनैव रूपं गृह्यत इति रूपग्रहणप्रयोजनं चक्षुरनुमीयते; स्पर्शरूपग्रहणे च ताभ्यामेव न गन्धो गृह्यत इति गन्धग्रहणप्रयोजनं घ्राणमनुमीयते; त्रयाणां ग्रहणे न तैरेव रसो गृह्यते इति रसग्रहणप्रयोजनं रसनमनुमीयते; चतुर्णां ग्रहणे न तैरेव शब्दः श्रूयते इति शब्दग्रहणप्रयोजनं श्रोत्रमनुमीयते। एवमिन्द्रिय- प्रयोजनस्यानितरेतरसाधनसाध्यत्वात् पञ्चैवेन्द्रियाणि ॥ ५६ ॥ न, तदर्थबहुत्वात् ? ॥ ५७ ॥ न खल्विन्द्रियार्थपञ्चत्वात् पञ्चेन्द्रियाणीति सिद्ध्यति। कस्मात् ? तेषा- प्राप्य होकर गृहीत नहीं होते हैं' तो आवरण की बात कहाँ आयेगी कि इसकी अनु- पपत्ति से व्यवहित या अव्यवहित रूपादि का ग्रहण होना चाहिये। सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट वाली बात रूपोपलब्धि या रूपानुपलब्धि में नहीं बनेगी। 'त्वग् द्वारा अप्राप्य रूप गृहीत होगा तो दूर होने से गृहीत नहीं होता, समीप का रूप गृहीत हो जाता है'—यह व्यवस्था नहीं बनेगी ॥ ५५ ॥ एकत्व के खण्डन से अनेकत्व सिद्ध हो जाने पर, उस अनेकत्व की स्थापना में हेतु भी देते हैं— इन्द्रियों के पांच अर्थ होने से ॥ ५६ ॥ अर्थ से सूत्रकार का तात्पर्य है—प्रयोजन। इन्द्रियों का वह प्रयोजन पांच प्रकार का है। त्वगिन्द्रिय से स्पर्शज्ञान होने पर उसी से रूपज्ञान नहीं हो पाता—अतः उस ज्ञान के लिए चक्षुरिन्द्रिय का अनुमान होता है ! स्पर्श तथा रूप का ज्ञान होने पर भी उन्हीं इन्द्रियों से गन्ध का ज्ञान नहीं होता; अतः गन्धज्ञानप्रयोजनवाली घ्राणेन्द्रिय का अनुमान किया जाता है। इन तीनों का ज्ञान होने पर भी उन्हीं तीनों इन्द्रियों से रस का ज्ञान नहीं हो पाता—अतः रसज्ञान के लिए रसनेन्द्रिय का अनुमान होता है। इन चारों का ज्ञान उन उन इन्द्रियों से होने पर भी उन्हीं से शब्द नहीं सुनायी पड़ता, अतः शब्द- ग्रहणप्रयोजनक श्रोत्रेन्द्रिय का अनुमान करना पड़ता है। इस तरह इन इन्द्रियप्रयोजनों के एक दूसरे के साधनों द्वारा साध्य न होने से पांच ही इन्द्रियाँ हैं ॥ ५६ ॥ शंका— उन इन्द्रियों का प्रयोजनबहुत्व होने से ऐसा नहीं ? ॥ ५७ ॥ इन्द्रियों के पाँच प्रयोजन होने से पाँच की सिद्धि करनी हो तो उतनी ही सिद्धि