न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० यो हि ब्रवीति—'लोष्टप्रकाशो मध्यन्दिने आदित्यप्रकाशाभिभावान्नोलभ्यते' इति, तस्यैतत् स्यात्— न; रात्रावप्यनुपलब्धेः ॥ ४१ ॥ अप्यनुमानतोऽनुपलब्धेरिति । एवमत्यन्तानुपलब्धेर्लोष्टप्रकाशो नास्ति, न त्वेवं चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ४१ ॥ उपपन्नरूपा चेयम्— बाह्यप्रकाशानुग्रहाद् विषयोपलब्धेरनभिव्यक्तितोऽनुपलब्धिः ॥ ४२ ॥ बाह्ये न प्रकाशेनानुगृहीतं चक्षुर्विषयग्राहकं तद्भावेऽनुपलब्धिः । सति च प्रकाशानुग्रहे शीतस्पर्शोपलब्धौ च सत्यां तदाश्रयस्य द्रव्यस्य चक्षुषाऽग्रहणम्, रूपस्यानुद्भूतत्वात् । सेयं रूपानभिव्यक्तितो रूपाश्रयस्य द्रव्यस्यानुपलब्धिर्दृष्टा । तत्र यदुक्तम्—'तदनुपलब्धेरहेतुः' (३.१.३५) इत्येतदयुक्तम् ॥ ४२ ॥ कस्मात् पुनरभिभवोऽनुपलब्धिकारणं चाक्षुषस्य रश्मेर्नोच्यत इति ? अभिव्यक्तौ चाभिभवात् ॥ ४३ ॥ बाह्यप्रकाशानुग्रहनिरपेक्षतायां चेति चार्थः । यद्रूपमभिव्यक्तमुद्भूतं बाह्य- जो यह कहें—'ढेले का प्रकाश भी मध्याह्न में आदित्य के प्रकाश से अभिभूत होने के कारण उपलब्ध नहीं होता', उनको यह उत्तर देना चाहिये— रात्रि में भी उसकी उपलब्धि न होने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ४१ ॥ उस ढेले के प्रकाश की अनुमान से भी उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार उसकी अत्यन्तानुपलब्धि से 'ढेले में प्रभा नहीं होती'—यही सिद्ध होता है । ऐसी अत्यन्तानुपलब्धि अनुमान से चक्षूरश्मि में सिद्ध नहीं की जा सकती ॥ ४१ यह चक्षूरश्मि में अनुपलब्धि उपपन्नरूपवाली भी है— बाह्य प्रकाश के सहारे रूपोपलब्धि होने से उस रूप की अनभिव्यक्ति से भी अनुपलब्धि हो सकती है ॥ ४२ ॥ चक्षु बाह्य प्रकाश का सहारा लेकर ही विषय को गृहीत करता है उस के रहते भी रूप की उपलब्धि नहीं हो पाती । अर्थात् प्रकाश का सहारा मिलने पर, तथा शीतस्पर्श की उपलब्धि होने पर भी रूपानभिव्यक्ति से रूपाश्रित द्रव्य ( तारागण आदि ) की अनुपलब्धि देखी जाती है; क्योंकि वह रूप उद्भूत नहीं है । उसके लिये आपका 'उसके न मिलने से वह नहीं है' ऐसा कहना अयुक्तियुक्त है ॥ ४२ ॥ तो यही क्यों नहीं कहते कि चाक्षुषरश्मि की अनुपलब्धि में उसका अभिभव ही कारण है ? नहीं; क्योंकि अभिव्यक्ति में भी अभिभव देखा जाता है ॥ ४३ ॥ 'बाह्यप्रकाश के सहारे की अपेक्षा न रखने की अवस्था में' सूत्रस्थ 'च' शब्द का अर्थ है । जिसका रूप अभिव्यक्त तथा उद्भूत होकर बाह्य प्रकाश के सहारे की जरूरत नहीं