भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

४५. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०३ प्रकाशानुग्रहं च नापेक्षते तद्विषयोऽभिभवः, विपर्ययेऽभिभवाभावात् । अनुद्भूत- रूपत्वाच्चानुपलभ्यमानं बाह्यप्रकाशानुग्रहाच्चोपलभ्यमानं नाभिभूयत इति एवमुपपन्नम्—अस्ति चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ४३ ॥ नक्तञ्चरनयनरश्मिदर्शनाच्च ॥ ४४ ॥ दृश्यन्ते हि नक्तं नयनरश्मयो नक्तञ्चराणां वृषदंशप्रभृतीनाम् । तेन शेष- स्यानुमानमिति । जातिभेदवदिन्द्रियभेद इति चेत् ? धर्मभेदमात्रं चानुपपन्नम्; आवरणस्य प्राप्तिप्रतिषेधार्थस्य दर्शनादिति ॥ ४४ ॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वानुपपत्तिः, कस्मात् ? अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ? ॥ ४५ ॥ तृणादि सर्पद् द्रव्यं काचे, अभ्रपटले वा प्रतिहतं दृष्टमव्यवहितेन सन्निकृष्यते व्याहन्यते वै प्राप्तिर्व्यवधानेनेति । यदि च रश्म्यर्थसन्निकर्षो ग्रहणहेतुः स्याद्, न व्यवहितस्य सन्निकर्ष इत्यग्रहणं स्यात् । अस्ति चेयं काचाभ्रपटल- रखता, उसका अभिभव हो सकता है, इसके विपरीत का नहीं । अर्थात् अनुद्भूतरूप होने से अनुपलभ्यमान, और बाह्य प्रकाश के सहारे से उपलभ्यमान द्रव्य अभिभूत नहीं होता । यों सिद्ध हो गया कि चाक्षुष रश्मि है ॥ ४३ ॥ रात्रि में घूमने फिरने वाले प्राणियों की चक्षूरश्मि भी देखी जाती है ॥ ४४ ॥ रात्रि में विचरण करनेवाले प्राणी विडालादि की चक्षूरश्मि रात्रिकाल में भी दीख पाती है । अतः उससे मनुष्यादि-नेत्र का अनुमान हो सकता है । जातिभेद की तरह इन्द्रियों का भी भेद मान लें, ताकि विडालादि-चक्षूरश्मियों से मनुष्य चक्षु का अनुमान न हो सके ? तो भी धर्मभेद अनुपपन्न ही रह जायेगा; क्योंकि वहाँ संयोगप्रतिषेधार्थक आवरण तो समान रूप से मिलता ही है ॥ ४४ ॥ [ यों तैजसत्व सिद्ध कर, अब विषयदेशप्राप्यकारित्वपक्ष का स्थापन करते हैं—] शंका—इन्द्रिय तथा अर्थ का सन्निकर्ष ज्ञानकारण कैसे होगा ? है, क्योंकि— चक्षुरादि अप्राप्य के ज्ञानसाधन हैं, काच, अभ्रपटल, स्फटिकादि के व्यवधान में भी उपलब्धि देखी जाने से ? ॥ ४५ ॥ लोक में, सरकता हुआ तृणादि पदार्थ काच या अभ्रपटल में निरुद्धगतिक तथा अव्यवधान होने पर वही पदार्थ काचान्तर्गत पदार्थ से सम्बद्ध होता देखा गया है, और संयोग कुड्यादि के व्यवधान से निरुद्ध हो जाता है । यदि चक्षूरश्मि तथा अर्थ का सन्निकर्ष ज्ञानकारण होता तो व्यवहित के साथ सन्निकर्ष होता नहीं, अतः उसका ज्ञान नहीं होता । जब कि लोक में काच, अभ्रपटल, स्फटिकादि से व्यवधान होने पर भी व्यवहित CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri