भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० आदर्शोदकयोः प्रसादस्वाभाव्याद् रूपोपलब्धिवत्तदुपलब्धिः ॥ ५० ॥ आदर्शोदकयोः प्रसादो रूपविशेषः स्वो धर्मः, नियमदर्शनात्; प्रसादस्य वा स्वो धर्मो रूपोपलम्भनम् । यथाऽऽदर्शप्रतिहतस्य परावृत्तस्य नयनरश्मेः स्वेन मुखेन सन्निकर्षे सति स्वमुखोपलम्भनं प्रतिबिम्बग्रहणाख्यमादर्शरूपानुग्रहात् तन्निमित्तं भवति, आदर्शरूपोपघाते तदभावाद्, कुड्यादिषु च प्रतिबिम्बग्रहणं न भवति; एवं काचाभ्रपटलादिभिरविघातश्चक्षूरश्मेः, कुड्यादिभिश्च प्रति- घातः; द्रव्यस्वभावनियमादिति ॥ ५० ॥ दृष्टानुमितानां नियोगप्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ ५१ ॥ प्रमाणस्य तत्त्वविषयत्वात् । न खलु भोः ! परीक्षमाणेन दृष्टानुमिता अर्थाः शक्या नियोक्तुम्-एवं भवतेति, नापि प्रतिषेद्धुम्-एवं न भवतेति । न हीद- मुपपद्यते-रूपवद्गन्धोऽपि चाक्षुषो भवत्विति, गन्धवद्वा रूपं चाक्षुषं मा भूदिति, अग्निप्रतिपत्तिवद् धूमेनोदकप्रतिपत्तिरपि भवत्विति, उदकाप्रतिपत्तिवद्वा धूमे- नाग्निप्रतिपत्तिरपि मा भूदिति । किं कारणम् ? यथा खल्वर्था भवन्ति य एषां स्वो भावः स्वो धर्म इति, तथाभूताः प्रमाणेन प्रतिपद्यते इति । तथाभूत- आदर्श तथा उदक के स्वच्छतारूप धर्म से रूपोपलब्धि की तरह उक्त उपलब्धि बन जायेगी ॥ ५० ॥ आदर्श (शीशा) तथा उदक का स्वच्छतानामक रूपविशेष नियमतः देखा जाने से नियत स्वधर्म है, अथवा स्वच्छता का स्वधर्म रूपोपलब्धि कराना है । जैसे—आदर्श का व्यवधान पाकर लौटती हुई नयनरश्मि का स्वमुख से सन्निकर्ष होने पर 'प्रतिविम्ब-ज्ञान' नामक स्वमुखोपलब्धि आदर्श की स्वच्छता के सहारे से तन्निमित्तक हो जाती है, आदर्शस्थ रूपोपघात होने पर वह नहीं हो पाती । इसी तरह काच या अभ्रपटलादि का अविघात, चक्षूरश्मि का कुडचादि से प्रतिघात—ये दोनों भी द्रव्यस्वभावनियम से बनते हैं ॥ ५० ॥ प्रत्यक्ष तथा अनुमान से सिद्ध विषयों के बारे में नियोग (आज्ञा) या निषेध नहीं बनते ॥ ५१ ॥ प्रमाण यथार्थवस्तुविषयक होता है । अरे भाई ! परीक्षकों द्वारा प्रत्यक्षकृत तथा अनुमित विषयों के बारे में अपनी इच्छा से नियम बनाकर 'आप ऐसा करें' यह आज्ञा या 'आप ऐसा न करें' यह निषेध नहीं बना करता । यह कभी भी नहीं हो सकता कि रूप की तरह गन्ध भी चक्षु से गृहीत होने लगे, या गन्ध की तरह रूप भी चक्षु से गृहीत न हो । और ऐसा भी नहीं होता कि धूम से अग्नि के प्रतिपादन की तरह जल का प्रति- पादन होने लगे, या जल की तरह अग्नि का भी प्रतिपादन न हो । कारण क्या है ? जैसे विषय होते हैं और जैसी उनकी सत्ता तथा धर्म होते हैं वैसे ही वे (तद्धर्मयुक्त)