न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें५३. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०७ विषयकं हि प्रमाणमिति । इमी खलु नियोगप्रतिषेधौ भवता देशितौ—काचाभ्र- पटलादिवद्वा कुड्यादिभिरप्रतिघातो भवतु, कुड्यादिवद्वा काचाभ्रपटलादिभिर- प्रतिघातो मा भूदिति ? न; दृष्टानुमिताः खल्विमे द्रव्यधर्माः, प्रतिघाताप्रति- घातयोर्ह्युपलब्ध्यनुपलब्धी व्यवस्थापिके। व्यवहितानुपलब्ध्याऽनुमीयते—कुड्या- दिभिः प्रतिघातः, व्यवहितोपलब्ध्याऽनुमीयते—काचाभ्रपटलादिभिरप्रतिघात इति ॥ ५१ ॥ इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ५२-६२ ] अथापि खल्वेकमिदमिन्द्रियम् ? बहूनीन्द्रियाणि वा ? कुतः संशयः ? स्थानान्यत्वे नानात्वादवयविनानास्थानत्वाच्च संशयः ॥ ५२ ॥ बहूनि द्रव्याणि नानास्थानानि दृश्यन्ते, नानास्थानश्च सन्नेकोऽवयवी चेति । तेनेन्द्रियेषु भिन्नस्थानेषु संशय इति ॥ ५२ ॥ एकमिन्द्रियम्; त्वग्व्यतिरेकात् ? ॥ ५३ ॥ त्वगेकमिन्द्रियमित्याह । कस्मात् ? अव्यतिरेकात् । न त्वचा किञ्चिद-
प्रमाण से प्रतिपन्न हो जाते हैं। प्रमाण भी तथा भूतविषयक (सत्यार्थप्रकाशक) होते हैं। आपने ये नियोग तथा प्रतिषेध प्रकृति में बतलाये—काच, अभ्रपटलादि की तरह कुड्यादि से अप्रतिघात हो (नियोग), या कुड्यादि की तरह काचाभ्रपटलादि से अप्रति- घात न हो (प्रतिषेध)—ये दोनों नहीं बनेंगे; क्योंकि ये द्रव्यधर्म या तो प्रत्यक्षगम्य हैं, या अनुमेय । उपलब्धि या अनुपलब्धि प्रतिघात तथा अप्रतिघात की व्यवस्थापिका हो सकती हैं। व्यवधान होने पर व्यवहित की अनुपलब्धि से अनुमान होता है कि कुड्यादि से प्रतिघात होता है, व्यवधान होने पर भी उपलब्धि से अनुमान होता है कि काचा- भ्रपटलादि से अप्रतिघात होता है ॥ ५१ ॥ एक इन्द्रिय है, या बहुत सी इन्द्रियां हैं ?—यह संशय क्यों हुआ ? स्थान के अन्य होने पर अनेकत्व देखा जाने से, तथा एक अनवयविद्रव्य के अनेक स्थानों में देखा जाने से ॥ ५२ ॥ बहुत से द्रव्य अनेक स्थानों में देखे जाते हैं, और कई वार एक ही अवयवी अनेक स्थानों में देखा जाता है। अतः उक्त उभयविध संशय भिन्न स्थान वाली इन्द्रियों के बारे में उत्पन्न हुआ ॥ ५२ ॥ शङ्का—इन्द्रिय एक है; क्योंकि अभेद सम्बन्ध से त्वक् (नामक एक ही इन्द्रिय है) ? ॥ ५३ ॥ पूर्वपक्षी कहता है कि 'त्वग्' ही एक इन्द्रिय हैं; क्योंकि वहाँ अभेद सम्बन्ध है। ऐसा कौन सा इन्द्रियाधिष्ठान है, जो त्वक् ने न प्राप्त किया हो, या त्वक् के न रहने पर कौन सा विषय