भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४९. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् २०५ प्राप्तौ हि द्रव्यान्तरगुणस्य उष्णस्य स्पर्शस्य ग्रहणम्, तेन च शीतस्पर्शाभिभव इति । स्फटिकान्तरितेऽपि प्रकाशनीये प्रदीपपरश्मीनामप्रतिघातः, अप्रतिघातात् प्राप्तस्य ग्रहणमिति । भर्जनकपालादिस्थं च द्रव्यमाग्नेयेन तेजसा दह्यते, तत्रा- विघातात् प्राप्तिः, प्राप्तौ तु दाहः । नाप्राप्यकारि तेज इति । अविघातादिति च केवलं पदमुपादीयते । कोऽयमविघातो नाम ? अव्यूह्य- मानावयवेन व्यवधायकेन द्रव्येण सर्वतो द्रव्यस्याविष्टम्भः, क्रियाहेतोरप्रतिबन्धः, प्राप्तेरप्रतिषेध इति । दृष्टं हि कलशनिषिक्तानामपां बहिः शीतस्पर्शस्य ग्रहणम् । न चेन्द्रियेणासन्निकृष्टस्य द्रव्यस्य स्पर्शोपलब्धिः । दृष्टौ च प्रस्पन्दपरिस्रवौ । काचाभ्रपटलादिभिर्नयनरश्मेरप्रतिघाताद्विभिद्यार्थेन सहसन्निकर्षादुपपन्नं ग्रहण- मिति ॥ ४८ ॥ नेतरेतरधर्मप्रसङ्गात् ? ॥ ४९ ॥ काचाभ्रटपलादिवद्वा कुड्यादिभिरप्रतिघातः, कुड्यादिवद्वा काचाभ्रपटला- दिभिः प्रतिघात इति प्रसज्यते, नियमे कारणं वाच्यमिति ? ॥ ४९ ॥ घटस्थ जल उष्ण हो जाता है । संयोग होने पर, अन्य तेज के गुण उष्ण स्पर्श का ग्रहण हो जाता है, तथा जल का अपना गुण शीतस्पर्श अभिभूत हो जाता है । इसी तरह स्फटिक से व्यवहित प्रकाश्य अर्थ के सन्निकर्ष में प्रदीपपरश्मियों का निरोध नहीं होता, अविघात होने से संयुक्त अर्थ का ग्रहण हो जाता है । इसी प्रकार भ्राष्ट्र के खप्पर में पड़ा चणकादि पदार्थ आग्नेय तेज से भुन जाता है, वहां उस तेज का संयोग अविघात से ही होता है । संयोग से वहाँ दाह उत्पन्न होता है ! अतः तेज अप्राप्यकारी नहीं है । 'अविघात' यह पद केवल ( विशेषणशून्य ) लिया जाता है । यह अविघात क्या है ? वियुक्त न हो सकने योग्य अवयवों वाले व्यवधायक द्रव्य से द्रव्य का सर्वतः अविष्टम्भ ( गति का अप्रतिबन्ध ) = प्राप्ति ( संयोगव्यापार ) का अप्रतिबन्ध, अर्थात् संयोग का अप्रतिबन्ध । लोक में हम देखते हैं कि घट में भरे जल का शीतस्पर्श बाहर गृहीत होता है, जब कि इन्द्रियां असन्निकृष्ट द्रव्य के स्पर्श का ग्रहण नहीं कर पातीं । उसी तरह प्रस्पन्द ( अन्तःस्थितद्रव्य का बहिःसरण ), प्रस्रवण भी देखे जाते हैं । अतः काच, अभ्रपटलादि से चक्षूरश्मि का अप्रतिघात होने से वह काचावयव विभक्त होकर अर्थ के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने से सन्निकृष्ट का ग्रहण हो जाता है ॥ ४८ ॥ शंका— इतरेतरधर्मप्रसङ्ग से प्रतिघात नहीं बनेगा ? ॥ ४९ ॥ काच, अभ्रपटलादि की तरह कुड्यादि से अप्रतिघात, या कुड्यादि की तरह काच अभ्रपटलादि से प्रतिघात—यों उभयथा प्रसक्ति होने लगेगी । अतः आप अपने नियम में कोई हेतु बतायें ? ॥ ४९ ॥