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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० वर्णसमुदायविकारानुपपत्तिवच्च वर्णविकारानुपपत्तिः। 'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२) 'ब्रुवो वचिः' (२. ४. ५३) इति यथा वर्णसमुदायस्य धातुलक्षणस्य क्वचिद्विषये वर्णान्तरसमुदायो न परिणामो न कार्यम्, शब्दान्तरस्य स्थाने शब्दान्तरं प्रयुज्यते। तथा वर्णस्य वर्णान्तरमिति ॥ ४० ॥ २. इतश्च न सन्ति विकाराः— प्रकृतिविवृद्धौ विकारविवृद्धेः ॥ ४१ ॥ प्रकृत्यनुविधानं विकारेषु दृष्टम्, यकारे ह्रस्वदीर्घानुविधानं नास्ति, येन विकारत्वमनुमीयत इति ॥ ४१ ॥ न्यूनसमाधिकोपलब्धेर्विकाराणामहेतुः ? ॥ ४२ ॥ द्रव्यविकारा न्यूनाः समा अधिकाश्च गृह्यन्ते। तद्द्वयं विकारो न्यूनः स्यादिति ? ॥ ४२ ॥ द्विविधस्यापि हेतोरभावादसाधनं दृष्टान्तः ॥ ४३ ॥ अत्र नोदाहरणसाधर्म्याद्धेतुरस्ति; न वैधर्म्यात्। अनुपसंहृतश्च हेतुना दृष्टान्तो न साधक इति। वर्णसमुदायविकारानुपपत्ति की तरह यह वर्णविकारानुपपत्ति भी मान लेनी चाहिये। जैसे—'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२), 'ब्रुवो वचिः' (पा० सू० २. ४. ५३) यह धातुलक्षण वर्णसमुदाय का किसी विषय में होने वाला वर्णसमुदाय (वचि) न परिणाम है, न विकार; बस, दूसरे शब्द के स्थान में दूसरा शब्द प्रयुक्त हो जाता है— इतना ही सिद्धान्त है। इस नय से दूसरे वर्ण के स्थान में दूसरा वर्ण प्रयुक्त होता है— यही सिद्धान्त है ॥ ४० ॥ २. वर्ण इसलिये भी विकार नहीं है— प्रकृति की विवृद्धि होने से विकार की विवृद्धि होने के कारण ॥ ४१ ॥ विकारों में प्रकृत्यनुविधान देखा जाता है; परन्तु यहाँ यकार में दीर्घादि की अनु- वृत्ति नहीं देखी जाती, जिससे यकार में विकारत्व का अनुमान न हो सके ॥ ४१ ॥ न्यून, सम तथा अधिक उपलब्धि से यहाँ विकारों का हेतुत्व नहीं बनता ? ॥४२॥ लोक में जैसे द्रव्यविकार में न्यूनता समता या अधिकता देखी जाती हैं वैसे इन वर्णों में विकार न्यून हो सकता है। अतः विकार का साधक कोई हेतु नहीं हैं ॥ ४२ ॥ दोनों प्रकार के हेतुओं के अभाव से दृष्टान्त असाधक है ॥ ४३ ॥ यहाँ न तो उदाहरणसादृश्य से हेतु है और न उदाहरणवैसादृश्य से। अतः हेतु से अनुपसंहृत दृष्टान्त साधक नहीं होता। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४६. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६१

४६. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६१ प्रतिदृष्टान्ते चानियमः प्रसज्येत, यथा-अनडुहः स्थानेऽश्वो वोढुं -नियुक्तो न तद्विकारो भवति, एवमिवर्णस्य स्थाने यकारः प्रयुक्तो न विकार इति । न चात्र नियमहेतुरस्ति दृष्टान्तः साधको न प्रतिदृष्टान्त इति ॥ ४३ ॥ द्रव्यविकारोदाहरणं च— न; अतुल्यप्रकृतीनां विकारविकल्पात् ॥ ४४ ॥ अतुल्यानां द्रव्याणां प्रकृतिभावोऽवकल्पते, विकाराश्च प्रकृतीरनुविधीयन्ते । न त्विवर्णमनुविधीयते यकारः । तस्मादनुदाहरणं द्रव्यविकार इति ॥ ४४ ॥ द्रव्यविकारवैषम्यवद् वर्णविकारविकल्पः ? ॥ ४५ ॥ यथा द्रव्यभावेन तुल्यायाः प्रकृतेर्विकारवैषम्यम्, एवं वर्णभावेन तुल्यायाः प्रकृतेर्विकारविकल्प इति ? ॥ ४५ ॥ न; विकारधर्मानुपपत्तेः ॥ ४६ ॥ अयं विकारधर्मो द्रव्यसामान्ये-यदात्मकं द्रव्यं मृद्वा सुवर्णं वा, तस्यात्म- नोऽन्वये पूर्वो व्यूहो निवर्त्तते व्यूहान्तरं चोपजायते, तं विकारमाचक्ष्महे । न वर्णसामान्ये कश्चिच्छब्दात्माऽन्वयी-य इत्वं जहाति यत्वं चापद्यते । तत्र यथा प्रतिदृष्टान्त में अनियम-प्रसक्ति भी होने लगेगी, जैसे गाड़ी में बैल के स्थान पर घोड़ा जोत दिया जाये तो वह उसका विकार थोड़े हो जायेगा ! इसी तरह इवर्ण के स्थान में यकार का प्रयोग हो तो वह विकार कैसे हुआ ! अतः यहाँ न तो नियमसाधन का दृष्टान्त ही साधक है, न प्रतिदृष्टान्त ॥ ४३ ॥ यहाँ द्रव्यविकार का उदाहरण भी— नहीं; असमान द्रव्यों के विकारविकल्प से ॥ ४४ ॥ अपने से असमान जातीय द्रव्यों में प्रकृतिभाव क्लृप्त है, परन्तु वहाँ विकार प्रकृति का अनुविधान ( अनुवृत्ति ) करते हैं; यहाँ तो इवर्ण का यकार अनुविधान नहीं करता, अतः यहाँ द्रव्यविकार उदाहरण नहीं बन सकता ॥ ४४ ॥ द्रव्यविकार के वैषम्य की तरह वर्णविकारविकल्प मान लिया जाये ? ॥ ४५ ॥ जैसे द्रव्यत्वेन समान प्रकृति में विकार-विषमता देखी जाती है; इसी तरह यहाँ वर्णभाव से समान प्रकृति का विकारविकल्प क्यों न मान लिया जाये ? ॥ ४५ ॥ विकारधर्मानुपपत्ति के कारण नहीं मान सकते ॥ ४६ ॥ द्रव्यसामान्य में विकारधर्म यह है कि जैसा द्रव्य हो—मिट्टी हो या सुवर्ण हो, तदात्मक में अन्वय होने पर पूर्व पिण्डाद्याकृति निवृत्त हो जाती है, तथा कुण्डलाद्याकृति उत्पन्न हो जाती है—इसे विकार कहते हैं । वर्णसामान्य में कोई शब्दात्मा सुवर्ण व्यक्ति की तरह अन्वयी नहीं, जो इत्व को छोड़ दे और यत्व को ग्रहण कर ले ! वहाँ जैसे द्रव्यत्वेन समान होने पर भी विकारवैषम्य होने पर घोड़ा जैसे बैल नहीं हो पाता, न्या० द० २१

१६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० सति द्रव्यभावे विकारवैषम्ये नाऽनडुहोऽश्वो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेः; एव- मिवर्णस्य न यकारो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेरिति !॥ ४६ ॥ ३. इतश्च न सन्ति वर्णविकाराः— विकारप्राप्तानामपुनरापत्तेः ॥ ४७ ॥ अनुपपन्ना पुनरापत्तिः । कथम् ? पुनरापत्तेरननुमानादिति । इकारो यकार- त्वमापन्नः पुनरिकारो भवति, न पुनरिकारस्य स्थाने यकारस्य प्रयोगोऽप्रयोग- श्चेत्यत्रानुमानं नास्ति ॥ ४७ ॥ सुवर्णादीनां पुनरापत्तेरहेतुः ? ॥ ४८ ॥ अननुमानादिति न । इदं ह्यनुमानम्— सुवर्णं कुण्डलत्वं हित्वा रुचकत्वमापद्यते, रुचकत्वं हित्वा पुनः कुण्डलत्व- मापद्यते, एवमिकारोऽपि यकारत्वमापन्नः पुनरिकारो भवतीति ? ॥ ४८ ॥ व्यभिचारादननुमानम्, यथा—पयो दधिभावमापन्नं न पुनः पयो भवति, किमेवं वर्णानां न पुनरापत्तिः ? अथ सुवर्णवत् पुनरापत्तिरिति ? सुवर्णोदाहरणोपपत्तिश्च— न; तद्विकाराणां सुवर्णभावाव्यतिरेकात् ॥ ४९ ॥ क्योंकि वहां विकारधर्म की उत्पत्ति नहीं है; इसी तरह इवर्ण भी यकार का विकार नहीं है, क्योंकि यहाँ विकारधर्म की उपपत्ति नहीं है ॥ ४६ ॥ ३. इसलिये भी वर्ण विकार नहीं हैं, क्योंकि— विकारापन्नों की पुनरापत्ति नहीं हुआ करती ॥ ४७ ॥ यहाँ पुनःप्राप्ति अनुपपन्न है; कैसे ? पुनरापत्ति से विकार का अनुमान नहीं होता । यहाँ तो इकार यकार बनकर फिर इकार बन जाता है । यकार के स्थान में इकार का प्रयोग है, या अप्रयोग, अतः इस विषय में विकार का अनुमान नहीं होता ॥ ४७ ॥ सुवर्णादिकों के पुनरापादन से उक्त हेतु नहीं बनता ? ॥ ४८ ॥ अनुमान नहीं होता—यह आपका कथन उचित नहीं; क्योंकि यह अनुमान है— ‘सुवर्ण कुण्डलत्व को छोड़कर रुचकत्व-आकृति प्राप्त कर लेता है, रुचकत्व को छोड़कर पुनः कुण्डलत्वाकृति धारण कर लेता है । इसी तरह इकार भी यकार बन कर पुनः इकार बन जाता है’ ? ॥ ४८ ॥ हेतु के व्यभिचरित होने से अनुमान नहीं है; जैसे दूध के दही बन जाने पर पुनः वह दूध नहीं बन सकता । क्या इस दूध की तरह वर्णों का पुनरापादन नहीं होता, या सुवर्ण की तरह पुनरापादन हो जाता है ? सुवर्ण की तरह आपादन तो— नहीं होता; क्योंकि उस सुवर्ण के विकार उससे अतिरिक्त नहीं हैं ॥ ४९ ॥

५२. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६३

५२. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६३ अवस्थितं सुवर्णं हीयमानेन धर्मेण उपजायमानेन च धर्मि भवति, नैवं कश्चिच्छब्दात्मा हीयमानेनेत्वेन उपजायमानेन यत्वेन धर्मी गृह्यते, तस्मात् सुवर्णोदाहरणं नोपपद्यत इति ॥ ४९ ॥ वर्णत्वाव्यतिरेकाद्वर्णविकाराणामप्रतिषेधः१ ? ॥ ५० ॥ वर्णविकारा अपि वर्णत्वं न व्यभिचरन्ति, यथा-सुवर्णविकारः सुवर्णत्व- मिति ? ॥ ५० ॥ सामान्यवतो धर्मयोगो न सामान्यस्य१ ॥ ५१ ॥ कुण्डलरुचकौ सुवर्णस्य धर्मौ न सुवर्णत्वस्य, एवमिकारयकारौ कस्य वर्णा- त्मनो धर्मौ ? वर्णत्वं सामान्यम्, न तस्येमौ धर्मौ भवितुमर्हतः । न च निवर्त- मानो धर्म उपजायमानस्य प्रकृतिः, तत्र निवर्तमान इकारो न यकारस्योपजाय- मानस्य प्रकृतिरिति ॥ ५१ ॥ ४. इतश्च वर्णविकारानुपपत्तिः— नित्यत्वेऽविकारादनित्यत्वे चानवस्थानात् ॥ ५२ ॥ 'नित्या वर्णाः' इत्येतस्मिन् पक्षे इकारयकारौ वर्णौ—इत्युभयोर्नित्यत्वाद् वर्तमान सुवर्ण हीयमान, तथा उत्पद्यमान धर्म से धर्मी बन सकता है; परन्तु कोई शब्दात्मा हीयमान इकार से उत्पद्यमान यकार द्वारा धर्मी नहीं बनता । अतः यहाँ सुवर्णोदाहरण नहीं घटता ॥ ४९ ॥ वर्णत्व के सामान्य होने से, वर्णविकारों का प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ ५० ॥ वर्णविकार भी वर्णत्व को व्यभिचरित नहीं कर पाते, जैसे-सुवर्णविकार सुवर्णत्व को; (अतः वर्णविकार से वर्णत्व स्थिर होने से वर्ण विकार है ?) ॥ ५० ॥ सामान्यवान् का विकारधर्म (कार्ययोग) सामान्य का नहीं बना करता ॥ ५१ ॥ कुण्डल या रुचक—सुवर्ण के धर्म हैं, सुवर्णत्व के नहीं, इस तरह इकार यकार किस वर्णात्मा के धर्म होंगे ? वर्णत्व सामान्य है, उसके इकार-यकार धर्म नहीं बन सकते । जो विनष्ट होता है वह (हीयमान) धर्म उपजायमान धर्म की प्रकृति कैसे बन सकता है ! अतः निवर्तमान इकार उपजायमान यकार की प्रकृति नहीं है ॥ ५१ ॥ ४. इसलिये भी वर्णविकार का अनुपपादन समझना चाहिये— ( क्योंकि ) नित्य होनेपर उनमें विकार न बनेगा, अनित्य मानने पर उनका अनवस्थान होगा ॥ ५२ ॥ 'वर्ण नित्य हैं' इस पक्ष में इकार-यकार दोनों ही वर्णों के नित्य होने से उनमें १. १. सूत्रद्वयं यद्यपि न्यायसूचीनिबन्धे नोपलभ्यते इति तात्पर्यटीकाऽसम्मतिः स्पष्टं प्रतिभाति, तथापि वार्त्तिककृता सूत्रद्वयस्यापि व्याख्यानादस्माभिरिदं स्वीकृतम् ।-स०

१६४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० विकारानुपपत्तिः । नित्यत्वेऽविनाशित्वात् कः कस्य विकार इति ! अथानित्या वर्णा इति पक्षः ? एवमप्यनवस्थानं वर्णानाम् । किमिदमनवस्थानं वर्णानाम् ? उत्पद्य निरोधः । उत्पद्य निरुद्धे इकारे यकार उत्पद्यते, यकारे चोत्पद्य निरुद्धे इकार उत्पद्यत इति कः कस्य विकारः ! तदेतदवगृह्य सन्धाने सन्धाय चावग्रहे वेदितव्यमिति ॥ ५२ ॥ नित्यपक्षे तु तावत् समाधिः— नित्यानामतीन्द्रियत्वात्तद्धर्मविकल्पाच्च वर्णविकाराणामप्रतिषेधः ? ॥ ५३ ॥ नित्या वर्णा न विक्रियन्त इति विप्रतिषेधः । यथा नित्यत्वे सति किञ्चि- दतीन्द्रियम्, किञ्चिदिन्द्रियग्राह्यम्, इन्द्रियग्राह्याश्च वर्णाः; एवं नित्यत्वे सति किञ्चिन्न विक्रियते, वर्णास्तु विक्रियन्त इति ? विरोधाद्धेतुस्तद्धर्मविकल्पः; नित्यं नोपजायते नापैति । अनुपजनापायधर्मकं नित्यम् । अनित्यं पुनरुपजनापाययुक्तम्, न चान्तरेणोपजनापायौ विकारः सम्भवतीति । तद्यदि वर्णा विक्रियन्ते ? नित्यत्वमेषां निवर्त्तते । अथ नित्याः ? विकारधर्मत्वमेषां निवर्त्तते । सोऽयं विरुद्धो हेत्वाभासो धर्मविकल्प इति ॥ ५३ ॥ विकार नहीं बनेगा; क्योंकि नित्य मानने पर उनके अविनाशी होने से कौन किसका विकार होगा ! यदि 'वर्ण अनित्य हैं' यह पक्ष मानते हो तो भी वर्णों का अनवस्थान ही रहेगा । 'अनवस्थान' से तात्पर्य है 'उत्पन्न होकर उनकां निरोध' । इकार के उत्पन्न होकर निरुद्ध होनेपर यकार उत्पन्न होता है, और यकार के उत्पन्न होकर निरुद्ध होने पर इकार उत्पन्न होता है, तब बताइये—इनमें कौन किसका विकार बन सकता है ! यह 'उत्पन्न होकर निरोध' अवग्रह ( असंहिता ) करके सन्धि के विषय में या सन्धि करके अवग्रह के विषय में समझना चाहिये ॥ ५२ ॥ शंका—नित्यपक्ष में तो समाधान हो सकता है— नित्य वर्णों के अतीन्द्रिय होने से तथा तद्धर्मविकल्प से वर्णविकार का प्रतिषेध नहीं बन सकता ? ॥ ५३ ॥ 'वर्ण नित्य हैं' यह मानने पर उनमें विकार नहीं होगा—यह आप नहीं कह सकते; क्योंकि नित्य होने पर कुछ पदार्थ अतीन्द्रिय तथा कुछ इन्द्रियग्राह्य होते हैं; वर्ण इन्द्रियग्राह्य हैं । इस प्रकार, नित्य होने पर कोई पदार्थ विकृत नहीं होता, वर्ण विकृत हो जाते हैं ? उत्तर—यह 'तद्धर्मविकल्प' विरुद्ध होने से यहाँ हेतु नहीं बन सकता । नित्य न उत्पन्न होता है, न विनष्ट । नित्य अनुत्पादाविनाशधर्मक होता है, और अनित्य उत्पाद- विनाशधर्मक । उत्पत्ति, विनाश के विना विकार बनता नहीं । इस नय से, वर्ण यदि विकृत होते हैं तो उनमें नित्यत्व कहाँ रहा ! यदि नित्य हैं तो इनमें विकारधर्म कैसे रहेगा ! अतः आपका यह 'धर्मविकल्प' हेतु हेत्वाभास है ॥ ५३ ॥

५५. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६५

५५. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६५ अनित्यपक्षे समाधि :— अनवस्थायित्वे च वर्णोपलब्धिवत् तद्विकारोपपत्तिः ? ॥ ५४ ॥ यथाऽनवस्थायिनां वर्णानां श्रवणं भवत्येवमेषां विकारो भवतीति ? असम्बन्धादसमर्था अर्थप्रतिपादिका १ वर्णोपलब्धिर्न विकारेण सम्बन्धाद- समर्था, या गृह्यमाणा वर्णविकारमर्थमनुमापयेदिति । तत्र यादृगिदम् यथा गन्धगुणा पृथिव्येवं शब्दसुखादिगुणापीति, तादृगेतद्भवतीति । न च वर्णो- पलब्धिर्वर्णानिवृत्तौ वर्णान्तरप्रयोगस्य निवर्तिका । योऽयमिर्वर्णानिवृत्तौ यकारस्य प्रयोगः, यद्ययं वर्णोपलब्ध्या निवर्त्तते तदा तत्रोपलभ्यमान इवर्णो यत्वमापद्यते इति गृह्येत । तस्माद् वर्णोपलब्धिरहेतुर्वर्णविकारस्येति ॥ ५४ ॥ विकारधर्मित्वे नित्यत्वाभावात् कालान्तरे विकारोपपत्तेश्चोप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥ 'तद्धर्मविकल्पात्' इति न युक्तः प्रतिषेधः । न खलु विकारधर्मकं किञ्चिन्नित्- त्यमुपलभ्यत इति वर्णोपलब्धिवदिति न युक्तः प्रतिषेधः । अवग्रहे हि दधि शङ्का—अनित्य मानने पर तो उनमें विकारधर्म बन जायेगा— वर्णों में अनवस्थायित्व ( स्वल्पकालस्थायित्व ) होने पर भी उनकी उपलब्धि की तरह उनमें विकार भी बन जायेगा ? ॥ ५४ ॥ जैसे स्वल्पकालस्थायी वर्णों का श्रवण उपपन्न होता है, उसी तरह उनकी अस्था- यिता में उनका विकार भी सम्भव है ? उत्तर—जब प्रकृतिशब्द ( इकार ) के साथ विकृतिशब्द ( यकार ) से असम्बद्ध रहने पर वर्णोपलब्धि अर्थप्रतिपादन में असमर्थ है तो विकार से सम्बन्ध न होने से उसका ज्ञान कराने में असमर्थ ही रहेगी । उसमें ऐसी शक्ति कहाँ से आ जायेगी कि वह गृहीत होती हुई वर्णविकार का अनुमान करा सके ! वर्णोपलब्धि वर्णवृत्ति में वर्णान्तरप्रयोग की निवर्तिका नहीं है । गंध गुणवाली पृथ्वी जैसे शब्द सुख आदि गुणवती होती है, वैसा ही यहाँ समझना होगा । यह जो इकारनिवृत्ति होने पर यकार का प्रयोग है, यदि यह यकार वर्णोपलब्धि से निवृत्त हो जाता तो 'वहां सुनाई देता हुआ इकार यकारत्व को प्राप्त होता है' ऐसा परीक्षकों द्वारा समझा जाता । ऐसा नहीं होता, अतः मान लेना चाहिये कि वर्णोपलब्धि (उपलभ्यमान इकार) वर्णविकार (यकार) का हेतु नहीं है ॥५४॥ विकारी मानने पर, उसमें नित्यत्व न रहने से तथा कालान्तर में विकारोपपत्ति होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५५ ॥ 'तद्धर्मविकल्प' हेतु से प्रतिषेध उचित नहीं; क्योंकि कोई विकारी नित्य नहीं होता; अतः 'वर्णोपलब्धि की तरह'—ऐसा कह कर प्रतिषेध करना उचित नहीं । असंहिता में 'दधि + अत्र' ऐसा प्रयोग कर, काफी देर तक ठहरने के बाद पुनः संहिता में 'दध्यत्र' १. 'अर्थप्रतिपादने' इति पाठस्तात्पर्यसम्मतः ।

१६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० अत्रेति प्रयुज्य चिरं स्थित्वा ततः संहितायां प्रयुङ्क्ते-दध्यत्रेति। चिरनिवृत्ते चायमिवर्णे यकारः प्रयुज्यमानः कस्य विकार इति प्रतीयते ! कारणाभावात् कार्याभाव इति अनुयोगः प्रसज्यत इति ॥ ५५ ॥ ५. इतश्च वर्णविकारानुपपत्तिः- प्रकृत्यनियमात् १ ॥ ५६ ॥ इकारस्थाने यकारः श्रूयते, यकारस्थाने खल्विकारो विधीयते-विध्यति इति । तद्यदि स्यात् प्रकृतिविकारभावो वर्णानाम्, तस्य प्रकृतिनियमः स्यात् । दृष्टो विकारधर्मित्वे प्रकृतिनियम इति ॥ ५६ ॥ अनियमे नियमान्नानियमः ? ॥ ५७ ॥ योऽयं प्रकृतेरनियम उक्तः स नियतो यथाविषयं व्यवस्थितो नियतत्वान्नियम इति भवति, एवं सत्यनियमो नास्ति । तत्र यदुक्तम्-‘प्रकृत्यनियमात्’ इति, एतदयुक्तमिति ? ॥ ५७ ॥ नियमानियमविरोधादनियमे नियमाच्चाप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥ नियम इत्यत्रार्थमभ्यनुज्ञा, अनियम इति तस्य प्रतिषेधः । अनुज्ञातनिषिद्ध- का प्रयोग करता है। इवर्ण के चिरनिवृत्त होने पर प्रयुज्यमान यकार किसका विकार प्रतीत होगा ! कारणाभाव से कार्याभाव है-ऐसा अनुयोग आपके हेतु हेत्वाभास ही है ॥ ५५ ॥ ५ इस कारण भी वर्णविकार का उपपादन नहीं होगा- (वर्णविकारों का) प्रकृतिनियम न होने से ॥ ५६ ॥ इकार के स्थान में जो यकार श्रुत होता है, जैसे-‘विध्यति’, यहाँ यकार के स्थान में इकार का विधान उपलब्ध है। यदि वर्णों का प्रकृतिविकृतिभाव होता तो प्रकृतिनियम बन सकता था; क्योंकि लोक में विकारी पदार्थों का प्रकृतिनियम देखा जाता है ॥ ५६ ॥ छलवादी की शंका- यह अनियम में नियम होने से अनियम नहीं, (नियम ही है) ॥ ५७ ॥ आप ने यह जो वर्णों के विषय में प्रकृति का अनियम सिद्ध किया वह अपने विषय के लिये व्यवस्थित होने के कारण ‘नियम’ ही सिद्ध होता है। ऐसा होने पर अनियम कहाँ रहा ! अतः आप ने अभी जो ‘प्रकृत्यनियम’ हेतु दिया था, वह अनुपपन्न है ॥ ५७ ॥ उत्तर- नियम ‘अनियम’-दोनों का शाश्वतिक विरोध होने से, अनियम में नियम बताने से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ५८ ॥ ‘नियम’ इस शब्द से तदर्थ की स्वीकृति है, ‘अनियम’ इस शब्द से तदर्थ १. 'वर्णविकाराणाम्' इत्यधिकः पाठः क्वचित् ।

५९. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६७

५९. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६७ योश्च व्याघातादनर्थान्तरत्वं न भवति । अनियमश्च नियतत्त्वान्नियमो न भव- तीति नात्रार्थस्य तथाभावः प्रतिषिध्यते, किं तर्हि ? तथाभूतस्यार्थस्य नियम- शब्देनाभिधीयमानस्य नियतत्त्वान्नियमशब्द एवोपपद्यते । सोऽयं नियमादनियमे प्रतिषेधो न भवतीति ॥ ५८ ॥ ६. न चेयं वर्णविकारोपपत्तिः परिणामात्, कार्यकारणभावाद्वा; किं तर्हि ? गुणान्तरापत्त्युपमर्द्धह्रासवृद्धिलेशश्लेषेभ्यस्तु विकारोपपत्तेर्वर्णविकारः ॥ ५९ ॥ स्थान्यादेशभावादप्रयोगे प्रयोगो विकारशब्दार्थः, स भिद्यते । गुणान्तरा- पत्तिः-उदात्तस्यानुदात्त इत्येवमादिः । उपमर्दो नाम एकरूपनिवृत्तौ रूपान्तरोप- जनः । ह्रासः = दीर्घस्य ह्रस्वः । वृद्धिः-ह्रस्वस्य दीर्घः, तयोर्वा प्लुतः । लेशः = लाघवम्, स्त इत्यस्तेर्विकारः । श्लेषः = आगमः, प्रकृतेः प्रत्ययस्य वा । एत एव विशेषा विकारा इति एत एवादेशाः । एते चेद्विकाराः उपपद्यन्ते तर्हि वर्ण- विकारा इति ॥ ५९ ॥ का प्रतिषेध है । स्वीकृति तथा निषेध परस्पर विरुद्ध हैं, अतः ये पर्याय नहीं बन सकते । तथा 'अनियम' के नियमतः रहने से अनियम नियम नहीं है—ऐसा प्रतिषेध नहीं किया गया है; किन्तु 'यही नियम है'—ऐसा ही भाव समझना चाहिये । इस प्रकार, छल- वादी का नियम से अनियम में प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५८ ॥ ६. हमारा यह वर्णविकारोपपादन परिणाम या कार्यकारणसम्बन्ध से नहीं, अपितु— गुणान्तरापादन; उपमर्द, ह्रास, वृद्धि, लेश, श्लेष—इनसे विकारोपपादन होने से वर्ण विकार हैं ॥ ५९ ॥ 'विकार' से हमारा तात्पर्य है—स्थान्यादेशभाव होने से स्थानी अक्षर का प्रयोग न कर आदेश का प्रयोग करना । उसके भेद हैं— १. गुणान्तरापत्ति, जैसे—उदात्त स्वर का अनुदात्तविधान । २. उपमर्द से तात्पर्य है—एक रूप की निवृत्ति होने पर रूपान्तर का उत्पाद । ३. ह्रास, जैसे—दीर्घ का ह्रस्वविधान । ४. वृद्धि, जैसे—ह्रस्व का दीर्घ या ह्रस्व-दीर्घ का प्लुतविधान । ५. लेश का अर्थ है—लाघव = अल्पीभाव, जैसे 'अस्ति' का द्विवचन 'स्तः', यहाँ 'अ' का लोप करके लाघव किया गया । ६. श्लेष, अर्थात् प्रकृति या प्रत्यय का आगम । इतने ही विशेष विकार हैं, अतः इतने ही आदेश हैं । यदि वर्ण में ये उपर्युक्त आदेश विकार कहें गये हैं तो हम भी उसे वर्णविकार मान लेंगे । इस स्थिति में हमारा आप से कोई विरोध नहीं ॥ ५९ ॥ [ इस प्रकार, वर्णों की अनित्यता का प्रतिपादन कर, अब शब्दप्रामाण्योपयोगी 'पद' का निरूपण कर रहे हैं—]

शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् [ ६०-७१ ]

१६८ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २ अ० २. आ० शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् [ ६०-७१ ] पद-अर्थनिरूपणम् ते विभक्त्यन्ताः पदम् ॥ ६० ॥ यथादर्शनं विकृता वर्णा विभक्त्यन्ताः पदसंज्ञा भवन्ति । विभक्तीर्द्वयी- नामिकी, आख्यातिकी च । ब्राह्मणः, पचतीत्युदाहरणम् । उपसर्गनिपातास्तर्हि न पदसंज्ञा, लक्षणान्तरं वाच्यमिति ? शिष्यते च खलु नामिक्या विभक्तेरव्ययाल्लोपः, तयोः पदसंज्ञार्थमिति । पदेनार्थसम्प्रत्यय इति प्रयोजनम् ॥ ६० ॥ नामपदं चाधिकृत्य परीक्षा, गौरिति पदं खल्विदमुदाहरणम्, तदर्थे— व्यक्त्याकृतिजातिसन्निधावुपचारात् संशयः ॥ ६१ ॥ अविनाभाववृत्तिः = सन्निधिः । अविनाभावेन वर्तमानासु व्यक्त्याकृतिजातिषु गौरिति प्रयुज्यते, तत्र न ज्ञायते—किमन्यतमः पदार्थः ? उत सर्व इति ॥ ६१ ॥ व्यक्तिवादः शब्दस्य प्रयोगसामर्थ्यात् पदार्थावधारणम्, तस्मात्— वे वर्ण यदि विभक्त्यन्त हो तो 'पद' कहलाते हैं ॥ ६० ॥ स्वदर्शनोक्त ( २. २. ५९ ) प्रमाणानुसार विकृत वर्ण विभक्त्यन्त होने पर 'पद' कहलाते हैं । विभक्ति दो प्रकार की होती है—१. नामिकी ( प्रातिपदिक- संबन्धिनी ), २. आख्यातिकी ( धातुसम्बन्धिनी ) । नामिकी विभक्ति का उदाहरण है—'ब्राह्मणः' । आख्यातिकी का उदाहरण है—'पचति' । तब तो उपसर्ग, निपात शब्दों की पदसंज्ञा नहीं हो पायेगी, अतः 'पद' का लक्षणा- न्तर कीजिये ? इसी लक्षण से ये भी 'पद' कहला सकते हैं; क्योंकि इनमें नामिकी विभक्ति का शास्त्र में अव्ययप्रयुक्त लोपविधान है । यह पदसंज्ञा इसीलिए की जाती है कि पद से अर्थसम्प्रत्यय हो जाये ॥ ६० ॥ [ प्रकृत्यर्थ भी नाम (प्रातिपदिक) से ही व्यवहृत होते हैं, अतः नाम के प्रधान होने से उसकी परीक्षा से प्रत्ययों की परीक्षा भी हो जायेगी—यों ] नामपदों को लेकर परीक्षा प्रारम्भ की जा रही हैं । 'गौ' यह पद उदाहरण है; उसके अर्थ में— व्यक्ति, आकृति तथा जाति-तीनों की सन्निधि में उपचार होने से संशय होता है ॥ ६१ ॥ अविनाभाव से रहना 'सन्निधि' कहलाता है । अविनाभाव से रहनेवालों में व्यक्ति, आकृति, जाति—इन तीनों में 'गौ' यह प्रयोग होता है । यहाँ ज्ञात नहीं होता कि 'गो' पद का अर्थ व्यक्ति है, आकृति है, या जाति है, या तीनों मिलकर हैं ? ॥ ६१ ॥ शङ्का—शब्द के प्रयोगसामर्थ्य से पदार्थ का निश्चय होता है, इसलिए—

६२. सू०] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १६९

६२. सू०] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १६९ याशब्दसमूहत्यागपरिग्रहसङ्ख्यावृद्ध्यपचयवर्णसमासानुबन्धाना व्यक्तावुपचाराद् व्यक्तिः ? ॥ ६२ ॥ व्यक्तिः पदार्थः, कस्मात् ? याशब्दप्रभृतीनां व्यक्तावुपचारात् । उपचारः = प्रयोगः । या गौस्तिष्ठति, या गौर्निषण्णेति नेदं वाक्यं जातेरभिधायकम्; अभेदात् । भेदात्तु द्रव्याभिधायकम् । गवां समूह इति भेदाद् द्रव्याभिधानम्, न जातेः; अभेदात् । चैत्राय गां ददातीति द्रव्यस्य त्यागः, न जातेः; अमूर्त्तत्वात्, प्रति- क्रमानुक्रमानुपपत्तेश्च । परिग्रहः—स्वत्वेनाभिसम्बन्धः, कौण्डिन्यस्य गौर्ब्राह्मण- स्य गौरिति, द्रव्याभिधाने द्रव्यभेदात् सम्बन्धभेद इति उपपन्नम्, अभिन्ना तु जातिरिति । सङ्ख्या—दश गावो विंशतिर्गाव इति भिन्नं द्रव्यं सङ्ख्यायते, न जातिः, अभेदादिति । वृद्धिः—कारणवतो द्रव्यस्यावयवोपचयः, अवर्द्धत गौरिति । निरवयवा तु जातिरिति । एतेनापचयो व्याख्यातः । वर्णः—शुक्ला गौः, कपिला गौरिति द्रव्यस्य गुणयोगः, न सामान्यस्य । समासः—गोहितम्, 'या' शब्द, समूह, त्याग, परिग्रह, सङ्ख्या, वृद्धि, अपचय, वर्ण, समास तथा अनु- बन्ध—इनका व्यक्ति में ही प्रयोग होने से व्यक्ति को 'गो' पदार्थ मानलें ? ॥ ६२ ॥ व्यक्ति ही पदार्थ है; क्योंकि 'या' (यत्) शब्द आदि का व्यक्ति में ही प्रयोग होता है । सूत्रस्थ 'उपचार' का अर्थ है—प्रयोग । 'जो गौ बैठी है,' 'जो गौ खड़ी है' यह वाक्य अभेद सम्बन्ध से जाति का अभि- धायक नहीं हो सकता, अपितु भेद-वाक्य द्रव्याभिधायक होता है, जैसे—'गौओं का समूह' । यह भेद से अनेक व्यक्तिरूप द्रव्य समूह का अभिधायक हैं, जाति का नहीं; क्योंकि जाति का अभेद है । 'चैद्य को गौ देता हैं' यहां द्रव्य का त्याग है, न कि जाति का; क्योंकि जाति तो अमूर्त होती है, उसका त्याग कैसे बनेगा ! अथ च, प्रतिक्रम (विश्लेष) अनुक्रम (संश्लेष) अर्थात् विभाग-संयोग भी जाति में नहीं रहते. अतः उक्त वाक्य में द्रव्य का ही त्याग मानना उचित है । परिग्रह कहते हैं—स्वत्व द्वारा अभि- सम्बन्ध (स्वामिभाव) को । जैसे—'कौण्डिन्य की गौ' 'ब्राह्मण की गौ' । द्रव्याभिधान में ही द्रव्यभेद से यह सम्बन्धभेद बन सकता है; क्योंकि जाति तो अभिन्न होती है, वह सम्बन्धभेदक कैसे होगी ! सङ्ख्या—'दस गौ' 'बीस गौ'—यह संख्याभिधान भी द्रव्या- भिधान में बन सकता है, क्योंकि भिन्न द्रव्य ही गिना जा सकता है; जाति तो अभिन्न होने से गिनी नहीं जा सकती । वृद्धि—कारणवान् द्रव्य का अवयवोपचय हो सकता है, जैसे—गौ बढ़ गयी । जाति निरवयव होने से कैसे बढ़ेगी ! इसी तरह अपचय (ह्रास) का भी व्याख्यान समझ लेना चाहिए । वर्ण—'शुक्ला गौ' 'कपिला गौ' यह वर्णाभिधान भी वाक्य को द्रव्यपरक मानने पर ही बनता है; क्योंकि शुक्लत्वादि गुण

१७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० २. आ० गोसुखमिति द्रव्यस्य सुखादियोगः, न जातेरिति । अनुबन्धः-सरूपप्रजननसन्तानः, गौर्गां जनयतीति तदुत्पत्तिधर्मत्वाद् द्रव्ये युक्तं न जातौ, विपर्ययादिति । द्रव्यं व्यक्तिरिति हि नार्थान्तरम् ? ॥ ६२ ॥ अस्य प्रतिषेधः- न; तदनवस्थानात् ॥ ६३ ॥ न व्यक्तिः पदार्थः । कस्मात् ? अनवस्थानात् । 'या' शब्दप्रभृतिभिर्यो विशेष्यते स गोशब्दार्थः । 'या गौस्तिष्ठति', 'या गौर्निषण्णा' इति, न द्रव्यमात्रमविशिष्टं जात्या विनाऽभिधीयते । किं तर्हि ? जातिविशिष्टम् । तस्मान्न व्यक्तिः पदार्थः । एवं समूहादिषु द्रष्टव्यम् ॥ ६३ ॥ यदि न व्यक्तिः पदार्थः, कथं तर्हि व्यक्तावुपचार इति ? निमित्तादतद्भावे- ऽपि तदुपचारः । दृश्यते खलु- सहचरणस्थानतादर्थ्यवृत्तमानधारणसामीप्ययोगसाधनाधिपत्येभ्यो ब्राह्मणमञ्च- कटराजसक्तुचन्दनगङ्गाशाटकान्नपुरुषेष्वतद्भावेऽपि तदुपचारः ॥ ६४ ॥ अतद्भावेऽपि तदुपचार इति-अतच्छब्दस्य तेन शब्देनाभिधानमिति । जाति का कैसे बनेगा ! समास भी व्यक्त्यभिधान में उपपन्न होता है । जैसे-'गौ का हित' 'गौ का सुख' । ये हित, सुख आदि में जाति में नहीं रहते । अनुबन्ध से तात्पर्य है-सरूपप्रजननसमूह । जैसे-'गौ गौ (बछड़ी) पैदा करती है, यहाँ द्रव्य में ही उत्पा- दन उचित ठहरता है; जाति में तो इसके विपरीत (अनुत्पाद) देखा जाता है । द्रव्य से हमारा तात्पर्य व्यक्ति से है। तो व्यक्ति को गोपदार्थ मान लें ? ॥ ६२ ॥ इसका खण्डन- व्यक्ति पदार्थ नहीं है; अनवस्था होने से ॥ ६३ ॥ व्यक्ति पदार्थ नहीं है; क्यों ? अनवस्थान होने से । 'या' शब्द आदि से जो यद्धर्म- विशिष्ट विशेषित किया जाता है, वह तद्धर्मविशिष्ट गो-शब्दार्थ है । 'जो गौ बैठी है', 'जो गौ खड़ी है'-इस वाक्य में बिना किसी विशेषण के, द्रव्य स्वरूपतः जातिरहित नहीं कहा जाता; अपितु जातिविशिष्ट द्रव्य कहा जाता है । इसलिए 'व्यक्ति' स्वरूपतः पदार्थ नहीं है । इसी नय से पूर्वसूत्रोक्त समूहादिक के भी व्यक्तिपरक व्याख्यान का खण्डन समझ लेना चाहिये ॥ ६३ ॥ यदि व्यक्ति पदार्थ नहीं है तो उसका उपचार (लक्षणा) प्रयोग कैसे देखा जाता है ? - प्रयोजनवशात् अतद्भाव में भी तत्प्रयोग देखा जाता है । जैसे- सहचरण, स्थान, तादर्थ्य, वृत्त, मान, धारण, सामीप्य, योग, साधन, आधिपत्य- इन कारणों से ब्राह्मण, मञ्च, कट, राज, सत्तू, चन्दन, गङ्गा, शाटक, अन्न, पुरुष- इनका अतद्भाव में भी तदुपचार होता है ॥ ६४ ॥ 'अतद्भाव में तदुपचार' से तात्पर्य है-'उस शब्द के न होने पर भी उस शब्द CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६४. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७१

६४. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७१ सहचरणात्–'यष्टिकां भोजय' इति यष्टिकासहचरितो ब्राह्मणोऽभिधीयत इति । स्थानात्–मञ्चाः क्रोशन्तीति मञ्चस्थाः पुरुषा अभिधीयन्ते । तादर्थ्यात्– कटार्थेषु वीरणेषु व्यूह्यमानेषु कटं करोतीति भवति । वृत्ताद्–यमो राजा, कुबेरो राजेति तद्वद् वर्त्तते इति । मानाद्–आढकेन मिताः सक्तवः आढकसक्तव इति । धारणात्–तुलायां धृतं चन्दनं तुलाचन्दनमिति । सामीप्याद्–गङ्गायां गावश्च- रन्तीति देशोऽभिधीयते सन्निकृष्टः । योगात्–कृष्णेन रागेण युक्तः शाटकः कृष्ण इत्यभिधीयते । साधनात्–'अन्नं प्राणाः' इति । आधिपत्यात्–'अयं पुरुषः कुलम्', 'अयं गोत्रम्' इति । तन्नायं सहचरणाद्योगाद् वा जातिशब्दो व्यक्तौ प्रयुज्यत इति ॥ ६४ ॥ आकृतिवादः यदि गौरित्यस्य पदस्य न व्यक्तिरर्थः, अस्तु तर्हि— आकृतिः, तदपेक्षत्वात् सत्त्वव्यवस्थानासिद्धेः ? ॥ ६५ ॥ आकृतिः पदार्थः । कस्मात् ? तदपेक्षत्वात् सत्त्वव्यवस्थानासिद्धेः । सत्त्वा- वयवानां तदवयवानां च नियतो व्यूहः = आकृतिः, तस्यां गृह्यमाणायां सत्त्वव्य- का प्रयोग' । जैसे—'यष्टिका को खिलाओ' इस वाक्य में 'ब्राह्मण' शब्द के न रहने पर भी यष्टिका के सहचार से 'यष्टिकाधारी ब्राह्मण को खिलाओ'—यों ब्राह्मण में यष्टि का उपचार लोक में देखा जाता है । इसी तरह, स्थान हेतु से—'मञ्च चिल्ला रहे हैं' इस वाक्य में मञ्चस्थ पुरुष का कथन है । तादर्थ्य हेतु से—चटाई के लिये तृणविशेष को वयन करने वाले पुरुष के लिए भी 'चटाई बना रहा है'—यह प्रयोग होता है । वृत्त हेतु से—यह राजा यम है' ( क्रूर बर्ताव करने से ), या 'यह राजा कुबेर है' ( दान करने से )—यह प्रयोग होता है । मान हेतु से भी—आढक परिमाण से तोले हुए सत्तू को लोक में 'आढक सत्तू' भी कह देते हैं । धारण हेतु से—तुला में रखा हुआ चन्दन 'तुलाचन्दन' कहलाने लगता है । सामीप्य हेतु से—लोक में, गङ्गा के समीपवर्ती देश को लेकर 'गङ्गा में गायें चर रही हैं—ऐसा बोल देते हैं । योग हेतु से—काले रंग में रंगी हुई साड़ी 'काली साड़ी' कहलाती है । साधन हेतु से—अन्न प्राण के साधन होने के कारण 'अन्न प्राण हैं' ऐसा बोल देते हैं । आधिपत्य हेतु से—किसी विशिष्ट प्रभाव वाले पुरुष को लेकर 'यही कुल हैं' 'यही गोत्र है'—ऐसा लोक में प्रयोग देखा जाता है । यहाँ सहचार या अन्य सम्बन्धों से यह जातिशब्द व्यक्ति में प्रयुक्त होता है ॥ ६४ ॥ यदि 'गौ' इस शब्द का व्यक्ति अर्थ नहीं मानते हो तो— सत्त्वव्यवस्था की सिद्धि को आकृत्यपेक्षता होने से आकृति अर्थ मान लें ? ॥६५॥ आकृति पदार्थ है; क्योंकि सत्त्वव्यवस्थासिद्धि आकृत्यपेक्षित है । प्राणि आदि द्रव्य के अवयवों या उन के अवयवों का नियत रूपों में जो सन्निवेश होता है वह 'आकृति'

१७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० वस्थानं सिध्यति-अयं गौरयमश्व इति, नागृह्यमाणायाम् । यस्य ग्रहणात् सत्त्व- व्यवस्थानं सिद्धयति तं शब्दोऽभिधातुमर्हति, सोऽस्यार्थ इति । नैतदुपपद्यते; यस्य जात्या योगस्तत्र जातिविशिष्टमभिधीयते-गौरिति । न चावयव्यूहस्य जांत्या योगः, कस्य तर्हि ? नियतावयव्यूहस्य द्रव्यस्य । तस्मान्नाकृतिः पदार्थः ॥ ६५ ॥ जातिवादः अस्तु तर्हि जातिः पदार्थः- व्यक्त्याकृतियुक्तेऽप्यप्रसङ्गात् प्रोक्षणादीनां मृद्गवके जातिः ? ॥ ६६ ॥ जातिः पदार्थः । कस्मात् ? व्यक्त्याकृतियुक्तेऽपि मृद्गवके प्रोक्षणादीनाम- प्रसङ्गादिति । गां प्रोक्षय, गामानय, गां देहीति नैतानि मृद्गवके प्रयुज्यन्ते । कस्मात् ? जातेरभावात् । अस्ति हि तत्र व्यक्तिः, अस्त्याकृतिः, यदभावात् तत्रासम्प्रत्ययः स पदार्थ इति ? ॥ ६६ ॥ न, आकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वाज्जात्यभिव्यक्ते ॥ ६७ ॥ जातेरभिव्यक्तिराकृतिव्यक्ती अपेक्षते, नागृह्यमाणायामाकृतौ व्यक्तौ च जातिमात्रं शुद्धं गृह्येत, तस्मान्न जातिः पदार्थ इति ? ॥ ६७ ॥ कहलाता है । उस आकृति के गृहीत होने पर 'यह गौ हैं', 'यह अश्व हैं'-ऐसी सत्त्व- व्यवस्था उपपन्न हो सकती है; आकृति के अगृहीत होते हुए उक्त व्यवस्था उपपन्न नहीं हो सकती । जिसके ग्रहण से उक्त सत्त्वव्यवस्थान सिद्ध होता हो, उसीको शब्द कहे- यही उचित है । वही उसका अर्थ है। अतः आकृति को पदार्थ मान लें ? आपका यह मतस्थापन उचित नहीं; क्योकि जिसका जाति से सम्बन्ध है वही यहां जातिविशिष्ट होकर अभिहित किया जाता है; जैसे-'गौ' । अवयव्यूहात्मक आकृति का जाति से योग नहीं होता; अपितु नियतावयव्यूह द्रव्य का योग बनता है । अतः आकृति पदार्थ नहीं है-यह सिद्ध हो गया ॥ ६५ ॥ तो जाति को ही पदार्थ मान लें- गौ की मिट्टी की मूर्ति में व्यक्ति तथा आकृति होते हुए भी प्रोक्षण ( बलि ) आदि की प्रसक्ति न होने से जाति ही पदार्थ है ? ॥ ६६ ॥ जाति पदार्थ हैं; क्योंकि व्यक्त्याकृतियुक्त होने पर भी मृत्तिका-मूर्ति में प्रोक्षण आनय- नादि की प्रसक्ति नहीं होती । 'गौ का प्रोक्षण करो', 'गौ लाओ', 'गौ दो'-ये व्यवहार मिट्टी की मूर्ति में नहीं बनते, क्योंकि वहाँ जाति नहीं है; यद्यपि वहाँ व्यक्ति भी है, आकृति भी है । जिसके अभाव से वहाँ उपर्युक्त ज्ञान नहीं हो पाता, वही पदार्थ हैं ? ॥ ६६ ॥ नहीं; आकृति तथा व्यक्ति की अपेक्षा लेकर जाति के सिद्ध होने से ॥ ६७ ॥ जाति की अभिव्यक्ति भी व्यक्ति तथा आकृति की अपेक्षा रखती है । आकृति तथा व्यक्ति के गृहीत हुए बिना जाति एकाकी गृहीत नहीं हो पाती; अतः जाति पदार्थ नहीं है ॥ ६७ ॥-

सूत्र में 'तु' शब्द तीनों की विशिष्टता के बोध के लिये है । क्या विशेष बोध होता

६८. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७३ सिद्धान्तवादः न वै पदार्थेन न भवितुं शक्यम्, कः खल्विदानीं पदार्थ इति ? व्यक्त्याकृतिजातयस्तु पदार्थः ॥ ६८ ॥ तुशब्दो विशेषणार्थः । किं विशिष्यते ? प्रधानाङ्गभावस्यानियमेन पदार्थ- त्वमिति । यदा हि भेदविवक्षा विशेषगतिश्च, तदा व्यक्तिः प्रधानम्, अङ्गं तु जात्याकृती । यदा तु भेदोऽविवक्षितः सामान्यगतिश्च, तदा जातिः प्रधानम्, अङ्गं तु व्यक्त्याकृती । तदेतद् बहुलं प्रयोगेषु । आकृतेस्तु प्रधानभाव उत्प्रेक्षितव्यः १ ॥ ६८ ॥ कथं पुनज्ञायिते-नाना व्यक्त्याकृतिजातय इति ? लक्षणभेदात् । तत्र तावत्- व्यक्तिर्गुणविशेषाश्रयो मूर्तिः ॥ ६९ ॥ व्यज्यत इति व्यक्तिरिन्द्रियग्राह्येति, न सर्वं द्रव्यं व्यक्तिः । यो गुण- विशेषाणां स्पर्शान्तानां गुरुत्वघनत्वसंस्काराणामव्यापिनः परिमाणस्याश्रयो यथासम्भवं तद् द्रव्यं मूर्तिः, मूच्छितावयवत्वादिति ॥ ६९ ॥ आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या ॥ ७० ॥ तीनों के न मानने से तो पदार्थ ही न बनेगा; अब किसको पदार्थ कहें ?— व्यक्ति, आकृति, जाति मिलकर पदार्थ हैं ॥ ६८ ॥ सूत्र में 'तु' शब्द तीनों की विशिष्टता के बोध के लिये है । क्या विशेष बोध होता है ? इन तीनों में प्रधान-गुणभाव के अनियम से पदार्थत्व रहता है । जब पदार्थ में भेदविवक्षा तथा विशेष ज्ञान कराना हो तो वहां व्यक्ति प्रधान है; जाति, आकृति गौण रहेंगी । जब पदार्थ में भेद अविवक्षित हो, सामान्य ज्ञान कराना हो तब जाति प्रधान होगी; और व्यक्ति, आकृति गौण रहेंगी। लोक में प्रायः जाति एवं व्यक्ति में प्रयोग देखा जाता है । आकृति-प्राधान्य के उदाहरण ( मृद्गवकादि ) की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिये ॥ ६८ ॥ यह कैसे ज्ञात होता है व्यक्ति, आकृति, जाति भिन्न-भिन्न हैं ? लक्षणभेद से ज्ञात हो जाता है । उन लक्षणों में— गुणविशेषाश्रित द्रव्य 'व्यक्ति' कहलाता है ॥ ६९ ॥ जो व्यक्त होता हो, अर्थात् इन्द्रियग्राह्य हो वही 'व्यक्ति' कहलाता है, न कि समग्र द्रव्य । जो स्पर्शान्त गुणविशेषों तथा गुरुत्व, घनत्व, द्रवत्व संस्कारों एवं अव्यापि परिमाण का यथासम्भव आश्रय हो, वह द्रव्य मूर्ति कहलाता है; क्योंकि उसके अवयव परस्पर संयुक्त हैं ॥ ६९ ॥ जिससे जाति, तथा उसके लिङ्ग प्रख्यात हो वह 'आकृति' है ॥ ७० ॥ १. अस्मिन् सूत्रार्थे वार्त्तिककारस्यारुचिर्वार्त्तिक एव द्रष्टव्या ।

१७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० ७१. सू० ] यया जातिर्जातिलिङ्गानि च प्रख्यायन्ते तामाकृतिं विद्यात् । सा च नान्या सत्त्वावयवानां तदवयवनां च नियताद् व्यूहादिति । नियतावयव्यूहाः खलु सत्त्वावयवा जातिलिङ्गम्, शिरसा पादेन गामनुमिन्वन्ति । नियते च सत्त्वा- वयवानां व्यूहे सति गोत्वं प्रख्यायत इति । अनाकृतिव्यङ्ग्यायां जातौ मृत्, सुवर्णम्, रजतम्-इत्येवमादिष्वाकृतिर्निवर्तते, जहाति पदार्थत्वमिति ॥ ७० ॥ समानप्रसवात्मिका जातिः ॥ ७१ ॥ या समानां बुद्धिं प्रसूते, भिन्नेष्वधिकरणेषु यया बहूनीतरेतरतो न व्यावर्तन्ते । योऽर्थोऽनेकत्र प्रत्ययानुवृत्तिनिमित्तं तत्सामान्यम् । यच्च केषाञ्चिद- भेदं कुतश्चिद् भेदं करोतीति तत् सामान्यविशेषो जातिरिति ॥ ७१ ॥ इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ❀ समाप्तश्चायं द्वितीयोऽध्यायः ❀ जिससे जाति, तथा जाति के चिह्न ज्ञात हों उसे 'आकृति' समझना चाहिये । वह आकृति सत्त्वावयव ( शिरःपादादि ) तथा तदवयवों ( मुखखुरादि ) के नियत व्यूह से ही जानी जाती है । सत्त्व के अवयव नियतावयव्यूह होने से जाति के ज्ञापक हैं । शिर और पैर से गौ का अनुमान करते हैं, प्राण्यङ्गों की बनावट के नियत होने पर गोत्व जाति का ज्ञान होता है । अनाकृतिव्यङ्ग्य गिट्टी, सोना, चाँदी आदि जातिद्रव्यों में आकृति निवृत्त हो जाती है, वह पदार्थत्व को छोड़ देती है ॥ ७० ॥ जाति विभिन्न आश्रयों में समान बुद्धि पैदा करनेवाली होती है ॥ ७१ ॥ जो भिन्न अधिकरणों में समान बुद्धि पैदा करे, वह 'जाति' कहलाती है । जहाँ बहुत से एक दूसरे से व्यावृत्त न होते हों । जो अर्थ अनेक स्थानों में ज्ञानानुवर्तन ( प्रतीति की अनुवृत्ति कराने का) निमित्त हो वह 'जाति' कहलाता है । तथा जो किन्हीं पदार्थों की का प्रतीति करके उन्हीं का कहीं से भेद ( व्यावृत्ति ) करे वह 'जातिविशेष' कहलाता है ॥ ७१ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में द्वितीय अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ द्वितीय अध्याय भी समाप्त ❀

इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ १-३ ]

अथ तृतीयोऽध्यायः [ प्रथममाह्निकम् ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ १-३ ] परीक्षितानि प्रमाणानि, प्रमेयमिदानीं परीक्ष्यते । तच्चात्मादीत्यात्मा विविच्यते—किं देहेन्द्रियमनोबुद्धिवेदनासङ्घातमात्रमात्मा ? आहोस्वित् तद्व्यति- रिक्त इति ? । कुतस्ते संशयः ? व्यपदेशस्योभयथा सिद्धेः । क्रियाकरणयोः कर्त्रा सम्बन्धस्याभिधानं व्यपदेशः । स द्विविधः—अवयवेन समुदायस्य— मूलैर्वृक्षस्तिष्ठति, स्तम्भैः प्रासादो ध्रियते इति । अन्येनान्यस्य व्यपदेशः— परशुना वृश्चति, प्रदीपेन पश्यति । अस्ति चायं व्यपदेशः—चक्षुषा पश्यति, मनसा विजानाति, बुद्ध्या विचारयति, शरीरेण सुखदुःखमनुभवतीति । तत्र नावधार्यते—किमवयवेन समुदायस्य देहादिसङ्घातस्य ? अथान्येनान्यस्य तद्व्य- तिरिक्तस्य वेति ? अन्येनायमन्यस्य व्यपदेशः । कस्मात् ? दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ १ ॥ प्रमाणों की परीक्षा हो चुकी, अब प्रमेयों की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है । उन प्रमेयों में आत्मा प्रधान है, अतः सर्वप्रथम आत्मा के वारे में ही विवेचन किया जा रहा है । क्या देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, वेदना—इनका समूहमात्र 'आत्मा' है ? या इनसे भिन्न कोई आत्मा है ? यह संशय क्यों हुआ ? लोक में उक्त दोनों ही प्रकारों में व्यपदेश ( व्यवहार ) देखा जाता है । क्रिया तथा करण से कर्त्ता के सम्बन्धकथन को 'व्यपदेश' कहते हैं । वह दो प्रकार का है—१. अवयव से समुदाय का व्यपदेश, जैसे— 'जड़ के कारण वृक्ष खड़ा है' या 'स्तम्भों के कारण महल खड़ा है' आदि; तथा २ दूसरे से दूसरे का व्यपदेश, जैसे—'परशु द्वारा काटता है' 'दीपक द्वारा देखता है' आदि । इसमें समुदाय एवं समुदायि का सम्बन्ध नहीं है । कर्त्ता एवं करण पृथक् हैं । प्रकृत में यह व्यपदेश होता है—'चक्षु से देखता है', 'मन से समझता है', 'बुद्धि से विवेचन करता है', 'शरीर से सुख दुःख का अनुभव करता है'—आदि । यहाँ यह निश्चय नहीं हो पाता कि अवयव से देहादिसङ्घात का व्यपदेश है, या अन्य से अन्य का व्यपदेश ? यह अन्य से अन्य का व्यपदेश है; क्योंकि— दर्शन, स्पर्शन द्वारा एक ही पदार्थ का ग्रहण होता है ॥ १ ॥

१७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० दर्शनेन कश्चिदर्थो गृहीतः, स्पर्शनेनापि सोऽर्थो गृह्यते—'यमहमद्राक्षं चक्षुषा तं स्पर्शनेनापि स्पृशामीति, यं चास्पाक्षं स्पर्शनेन तं चक्षुषा पश्यामि' इति । एकविषयौ चेमौ प्रत्ययावेककर्तृकौ प्रतिसन्धियेते, न च सङ्घातकर्तृकौ, नेन्द्रियेणै- ककर्तृकौ । तद्योऽसौ चक्षुषा त्वगिन्द्रियेण चैकार्थस्य ग्रहीता भिन्ननिमित्ताव- नन्यकर्तृकौ प्रत्ययौ समानविषयौ प्रतिसन्दधाति, सोऽर्थान्तरभूत आत्मा । कथं पुनर्नेन्द्रियेणैककर्तृकौ ? इन्द्रियं खलु स्वस्वविषयग्रहणमनन्यकर्तृकं प्रतिसन्धातुमर्हति, नेन्द्रियान्तरस्य विषयान्तरग्रहणमिति । कथं न सङ्घात- कर्तृकौ ? एकः खल्वयं भिन्ननिमित्तौ स्वात्मकर्तृकौ प्रत्ययौ प्रतिसंहितौ वेदयते, न सङ्घातः । कस्मात् ? अनिवृत्तं हि सङ्घाते प्रत्येकं विषयान्तरग्रहणस्याप्रति- सन्धानमिन्द्रियान्तरेणेवेति ॥ १ ॥ न, विषयव्यवस्थानात् ? ॥ २ ॥ न देहादिसङ्घातादन्यश्चेतनः । कस्मात् ? विषयव्यवस्थानात् । व्यवस्थित- विषयाणीन्द्रियाणि—चक्षुष्यसति रूपं न गृह्यते, सति च गृह्यते । यच्च यस्मिन्न- दर्शन ( चक्षुरिन्द्रिय ) द्वारा जो अर्थ गृहीत हुआ, वही स्पर्शन ( त्वगिन्द्रिय ) से भी गृहीत होता है, जैसे—'जिसको मैंने पहले आंखों देखा था आज उसे मैं छू भी रहा हूँ' या 'जिसको मैं पहले कभी छू पाया था उसे आज आँखों देख रहा हूँ'—ये दोनों ज्ञान एकविषय तथा एककर्तृक प्रतिगृहीत होते हैं, न कि सङ्घातकर्तृक या इन्द्रियविशेष द्वारा एककर्तृक हो सकते हैं । यह जो एक है और चक्षु एवं त्वगिन्द्रिय से एकार्थ का ग्रहण करता है वह प्रमाता 'ये दोनों ज्ञान भिन्नेन्द्रियनिमित्तक अनन्यकर्तृक ( आत्मकर्तृक ) तथा समानविषय वाले हैं'—ऐसा प्रतिसन्धान करता है । वह अन्य अर्थ आत्मा है । इन्द्रियविशेष द्वारा एककर्तृक क्यों नहीं ? इन्द्रियाँ अनन्यकर्तृक स्वस्वविषयक ज्ञान की उत्पादक हो सकती हैं, न कि इन्द्रियान्तर के विषयान्तर के ज्ञान की । सङ्घातकर्तृक क्यों नहीं ? यह एक ही व्यक्ति भिन्न इन्द्रियों के निमित्त वाले स्वात्मकर्तृक दो ज्ञानों का अनुसन्धान कर सकता है, यह सङ्घात नहीं हैं; क्योंकि एक सङ्घात दूसरे विषय का ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता, किंतु अपने-अपने विषय का ग्रहण करने में समर्थ है । अतः इससे भी परस्पर भिन्न इन्द्रिय की तरह से अननुसन्धान ही रहेगा ? ॥ १ ॥ शंका— अन्य चेतन की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इन्द्रियों के विषयनियम से ही काम चल जायेगा ? ॥ २ ॥ देहादिसङ्घात से अन्य चेतन मानने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इन्द्रियों के विषयनियम से व्यवस्था बन जायेगी । इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं—चक्षु के न रहने पर रूप का ग्रहण नहीं होता, उसके रहने पर होता है । जो जिसके न होने पर

३. सू० ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७७

३. सू० ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७७ सति न भवति सति भवति, तस्य तदिति विज्ञायते । तस्माद् रूपग्रहणं चक्षुषः, चक्षू रूपं पश्यति । एवं घ्राणादिष्वपीति । तानीन्द्रियाणीमानि स्वस्वविषय- ग्रहणाच्चेतनानि; इन्द्रियाणां भावाभावयोर्विषयग्रहणस्य तथाभावात् । एवं सति किमन्येन चेतनेन ? सन्दिग्धत्वादहेतुः । योऽयमिन्द्रियाणां भावाभावयोर्विषयग्रहणस्य तथाभावः, स किमयं चेतनत्वात् ? आहोस्वित् चेतनोपकरणानां ग्रहणनिमित्तत्वात् ? इति सन्दिह्यते । चेतनोपकरणत्वेऽपीन्द्रियाणां ग्रहणनिमित्तत्वाद् भवितुमर्हति ॥ २ ॥ यच्चोक्तम्—विषयव्यवस्थानादिति ? तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥ यदि खल्वेकमिन्द्रियमव्यवस्थितविषयं सर्वज्ञं सर्वविषयग्राहि चेतनं स्यात्, कस्ततोऽन्यं चेतनमनुमातुं शक्नुयात् ? यस्मात्तु व्यवस्थितविषयाणीन्द्रियाणि, तस्मात् तेभ्योऽन्यश्चेतनः सर्वज्ञः सर्वविषयग्राही विषयव्यवस्थितिमतीतोऽनु- मीयते । तत्रेदमभिज्ञानमप्रत्याख्येयं चेतनवृत्तमुदाह्रियते—रूपदर्शी खल्वयं नहीं होता और जिसके होने पर होता है, वह उसका विषय होता है । इसलिये रूपज्ञान चक्षु का विषय है; क्योंकि चक्षु रूप को देखता है । इसी तरह घ्राणादि के विषय में भी समझ लेना चाहिये । ये सभी इन्द्रियाँ अपने विषय का ज्ञान करनेवाली हैं, अतः 'चेतन' हैं; क्योंकि इन्द्रियों के भावाभाव से उनके विषयों के ग्रहण का भावाभाव होता है । अतः दूसरा चेतन मानने की क्या आवश्यकता ? उत्तर—सन्दिग्ध होने से वह हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि यह जो इन्द्रियों के . भावाभाव से विषयज्ञान का तथात्व है, वह क्या चेतन होने से है, या चेतन कर्ता के सहकारि कारण होने से ज्ञान का निमित्त है—यह सन्देह होता है । चेतन का उपकरण होने पर भी, इन्द्रियों के ग्रहणनिमित्त ( ज्ञानसाधन ) होने से उक्त व्यवस्था हो सकती है ॥ २ ॥ यह जो कहा कि विषयव्यवस्था से ? यह हेतु भी असिद्ध है; क्योंकि— तद्व्यवस्थान से आत्मा की सत्ता सिद्ध होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ३ ॥ यदि एक ही इन्द्रिय अव्यवस्थित विषय होती हुई सर्वज्ञरूप में सब विषयों का ग्रहण करनेवाली चेतन होती तो उससे भिन्न चेतन का अनुमान कोई क्यों करे ! चूंकि इसके विपरीत, इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं, अतः उनसे एक अन्य सर्वज्ञ, सर्वविषयग्राही, विषयव्यवस्था की परिधि के बाहर चेतन की सत्ता का अनुमान किया जाता है । चेतन की सत्ता को प्रमाणित करने के लिये यह दृढ़ प्रत्यभिज्ञान ( असाधारण चिह्न ) उदाहृत किया जा सकता है—'जिसने पहले रूप को देखा था, वही अब पूर्वगृहीत रस या न्या० द० : १२

१७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० रसं गन्धं वा पूर्वगृहीतमनुमिनोति, गन्धप्रतिसंवेदी च रूपरसावनुमिनोति । एवं विषयशेषेष्वपि वाच्यम्। रूपं दृष्ट्वा गन्धं जिघ्रति, घ्रात्वा च गन्धं रूपं पश्यति । तदेवमनियतपर्यायं सर्वविषयग्रहणमेकचेतनाधिकरणमनन्यकर्तृकं प्रतिसन्धत्ते, प्रत्यक्षानुमानागमसंशयान् प्रत्ययांश्च नानाविषयान् स्वात्मकर्तृकान् प्रतिसन्द- धाति, प्रतिसन्धाय वेदयते । सर्वविषयं च शास्त्रं प्रतिपद्यते । अर्थमविषयभूतं श्रोत्रस्य क्रमभाविनो वर्णान् श्रुत्वा पदवाक्यभावेन प्रतिसन्धाय शब्दार्थव्यवस्थां च बुध्यमानोऽनेकविषयमर्थजातमग्रहणीयमेकैकेनेन्द्रियेण गृह्णाति । सेयं सर्वज्ञस्य ज्ञेयाव्यवस्थाऽनुपदं न शक्या परिक्रमितुम् । आकृतिमात्रं¹ तूदाहृतम् । तत्र यदु- क्तम्—'इन्द्रियचैतन्ये सति किमन्येन चेतनेन', तदयुक्तं भवति ॥ ३ ॥ शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ ४-६ ] १. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा, न देहादिसङ्घातमात्रम्; शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥ शरीरग्रहणेन शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनासङ्घातः प्राणिभूतो गृह्यते, प्राणिभूतं गन्ध का ज्ञान कर रहा है, गन्धप्रतिसंवेदी रूप-रस का अनुमान कर रहा है'। इसी तरह अन्य विषयों के बारे में कहना चाहिये—यह रूप को देखकर गन्ध सूंघता है, गन्ध सूंघकर रूप को देखता है । इस प्रकार प्रमाता अनियतक्रम सर्वविषय-ज्ञान को एक चेतन के आश्रय से तथा एककर्तृक रूप में प्रतिसन्धान करता है; प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द तथा संशयों को एवं नानाविषयक ज्ञानों को एककर्तृक रुप में प्रतिसन्धान करता है, वैसा करके जान लेता है, सर्वविषयक शास्त्र को जान लेता है ! प्रमाता श्रोत्र के अगोचर अर्थ को, क्रमभावी वर्णों को, सुनकर पदवाक्यभाव में प्रतिसन्धान करके शब्दार्थव्यवस्था को समझता हुआ एक ही इन्द्रिय से ग्रहण न करने योग्य अनेकविषयक अर्थों को एक-एक इन्द्रिय से ग्रहण करता है । सर्वज्ञ की यह ज्ञेयव्यवस्था किसी भी तरह अतिक्रान्त नहीं की जा सकती । यों हमने सामान्यतः यह एक उदाहरण दे दिया है । अतः आप (पूर्वपक्षी—चार्वाकमतानुयायी) का यह कहना—'इन्द्रियचैतन्य के रहते अन्य चेतन मानने की आवश्यकता नहीं'—सर्वथा आयुक्त है ॥ ३ ॥ १. इस कारण भी देहादिसङ्घात नहीं, अपितु देहादिव्यतिरिक्त ही आत्मा हैं; शरीर-दाह में पातक न होने से ॥ ४ ॥ सूत्र में 'शरीर' से शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदनासमूहरूप प्राणी से तात्पर्य है । शास्त्र में प्राणमय शरीर को जलाने में प्राणिहिंसा कृत पाप 'पातक' कहा गया है (केवल शरीर १. 'सामान्यमात्रमित्यर्थः' । तदेतच्चेतनवृत्तं देहादिभ्यो व्यावर्तमानं तदतिरिक्तं चेतनं साधयतीति नेच्छाद्याधारत्वं देहादीनाम्' इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः ।

५. सू० ] शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७९

५. सू० ] शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७९ शरीरं दहतः प्राणिहिंसाकृतपापं पातकमित्युच्यते, तस्याभावः, तत्फलेन कर्तुरसम्बन्धात्, अकर्तुश्च सम्बन्धात् । शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनाप्रबन्धेन खल्वन्यः सङ्घात उत्पद्यते, अन्यो निरुध्यते । उत्पादनिरोधसन्ततिभूतः प्रबन्धो नान्यत्वं बाधते; देहादिसङ्घातस्यान्यत्वाधिष्ठानत्वात् । अन्यत्वाधिष्ठानो ह्यसौ प्रख्या- यत इति । एवं च सति यो देहादिसङ्घातः प्राणिभूतो हिंसां करोति, नासौ हिंसाफलेन सम्बध्यते; यश्च सम्बध्यते न तेन हिंसा कृता । तदेवं सत्त्वभेदे कृत- हानमकृताभ्यागमः प्रसज्यते । सति च सत्त्वोत्पादे, सत्त्वनिरोधे चाकर्मनिमित्तः सत्त्वसर्गः प्राप्नोति, तत्र मुक्त्यर्थो ब्रह्मचर्यवासो न स्यात् । तद्यदि देहादिसङ्घात- मात्रं सत्त्वं स्यात्, शरीरदाहे पातकं न भवेत् ! अनिष्टं चैतत् । तस्माद् 'देहादि- सङ्घातव्यतिरिक्त आत्मा नित्यः' इति ॥ ४ ॥ तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि; तन्नित्यत्वात् ? ॥ ५ ॥ यस्यापि नित्येनात्मना सात्मकं शरीरं दह्यते, तस्यापि शरीरदाहे पातकं न भवेद्दग्धुः । कस्मात् ? नित्यत्वादात्मनः । न जातु कश्चिन्नित्यं हिंसितुमर्हति, अथ हिंस्यते ? नित्यत्वमस्य न भवति । सेयमेकस्मिन् पक्षे हिंसा निष्फला, अन्य- स्मिंस्त्वनुपन्नेति ? ॥ ५ ॥ को जलाने से पातक नहीं लगता ) उसका अभाव होगा; क्योंकि उस फल से कर्ता का सम्बन्ध नहीं अकर्ता का सम्बन्ध रहता है । शरीर-इन्द्रिय-बुद्धि-वेदना-प्रवाह से अन्य सङ्घातात्मक शरीर दूसरा उत्पन्न होता है, वह फलभोक्ता है । अन्य सङ्घात निरुद्ध ( मृत ) होता है, उत्पादनिरोधरूप प्रवाह देह के अन्यत्व का बाध, देहादिसङ्घात में ही अन्यत्व का अधिष्ठान ( भेदाधारत्व ) होने से, नहीं कर सकता । यह देहेन्द्रियादि- सङ्घात अन्यत्व का अधिष्ठान प्रसिद्ध है'—इस मत में जो प्राणिभूत देहादिसंघात हिंसा करता है, वह हिंसा के पातक से सम्बद्ध नहीं होगा, तथा जिसने हिंसा नहीं की उसे वह पातक लगेगा—इस तरह आपके पक्ष में कृतहान ( कर्ता के नाश से कृत फल का असम्बन्ध) तथा अकृताभ्यागम दोष (अकर्ता को शरीरान्तर में अकृत फल की प्राप्ति) होने लगेगी । और अकर्मनिमित्तक ही सत्त्वोत्पत्ति होने लगेगी, तब मोक्ष के लिये ब्रह्म- चर्यादि की क्या जरूरत रह जायेगी ! अतः यह सिद्ध हुआ यदि देहादिसंघातमात्र को प्राणी मानोगे तो शरीरदाह में पातक न होगा, जब कि यह शास्त्रविरुद्ध है । तस्मात् 'देहादिसंघातव्यतिरिक्त आत्मा है, तथा वह नित्य है'—यही मत उचित है ॥ ४ ॥ शंका— सात्मक शरीर के प्रदाह में पातक नहीं होगा; क्योंकि आत्मा नित्य है ? ॥ ५ ॥ जिसने नित्य आत्मा से संयुक्त शरीर जलाया है, उसके जलने पर भी जलाने वाले को पाप नहीं लगना चाहिये; क्योंकि आत्मा तो नित्य है, नित्य को कभी कोई जला सकता है ! यदि यह जल जाता है तो इसमें नित्यत्व कैसा ? इस प्रकार यह हिंसा (दोनों पक्षों में से ) एक पक्ष में निष्फल है और दूसरे में तो बनेगी ही नहीं ? ॥ ५ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri