भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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ब्रजवल्लभ द्विवेदी २४-८-७६ ॐ तस्मै श्रीगुरवे नमः ॐ वात्स्यायनभाष्यसंवलितम् न्यायदर्शनम् [ हिन्दीभाषान्तरसहितम् ] प्रथमोऽध्यायः [ प्रथममाह्निकम् ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् [ १-२ ] प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत्प्रमाणम् । प्रमाणमन्तरेण नार्थप्रतिपत्तिः, नार्थप्रतिपत्तिमन्तरेण प्रवृत्तिसामर्थ्यम् । प्रमाणेन खल्वयं ज्ञाताऽर्थमुपलभ्य तमर्थमभीप्सति, जिहासति वा । तस्येप्सा- जिहासाप्रयुक्तस्य समीहा प्रवृत्तिरित्युच्यते । सामर्थ्यं पुनरस्याः फलेनाऽभि- सम्बन्धः । समीहमानस्तमर्थमभीप्सन् जिहासन् वा तमर्थमाप्नोति जहाति वा । अर्थस्तु—सुखं सुखहेतुश्च, दुःखं दुःखहेतुश्च । सोऽयं प्रमाणार्थोऽपरिसंख्येयः, प्राणभृद्भेदस्यापरिसंख्येयत्वात् । प्रमाण से उपादेय, हेय स्वरूप द्विविध अर्थों ( इच्छाओं ) की प्रतीति होनेपर ही कायिक ( बाह्य, आभ्यन्तर ) प्रयत्नों का सामर्थ्य देखा जाने से प्रमाण सप्रयोजन कहा जाता है । प्रमाण के बिना अर्थ-प्रतीति नहीं होती, अर्थ-प्रतीति के बिना प्रयत्न-सामर्थ्य नहीं हो सकता । निश्चय ही विज्ञजन प्रमाण से उस अर्थ को यथार्थ जानकर या तो ईप्सित ( ग्राह्य ) को चाहते हैं या जिहासित ( त्याज्य ) को छोड़ देते हैं । इस ईप्सा और जिहासा को लेकर जो प्रयत्न किया जाता है, वही 'प्रवृत्ति' कहलाता है । इस प्रवृत्ति का फल से अभिसम्बन्ध ( फलसाधकत्व ) 'सामर्थ्य' कहलाता है । प्रयत्न करता हुआ पुरुष यदि उस अर्थ को चाहता है तो प्राप्त कर लेता है, और छोड़ना चाहता है तो छोड़ देता है । यह प्रवृत्तिविषय अर्थ चार प्रकार का होता है—१. सुख, २. सुखहेतु, ३. दुःख, ४. दुःखहेतु । इस प्रमाण से गम्य अर्थ का वस्तुतः हम संख्या से विभाजन नहीं कर सकते; क्योंकि प्राणियों की संख्या असीम है । [ प्रत्येक प्राणी अपनी स्थिति रखता है, CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri