न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० अर्थवति च प्रमाणे प्रमाता, प्रमेयम्, प्रमितिरित्यर्थवन्ति भवन्ति । कस्मात् ? अन्यतमापायेऽर्थस्यानुपपत्तेः । तत्र यस्येप्सानिहासाप्रयुक्तस्य प्रवृत्तिः स प्रमाता, स येनार्थं प्रमिणोति तत्प्रमाणम्, योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्, यदर्थविज्ञानं सा प्रमितिः । चतसृषु चैवंविधास्वर्थतत्त्वं परिसमाप्यते । किं पुनस्तत्त्वम् ? सतश्च सद्भावः, असतश्चासद्भावः । सत्सदिति गृह्य- माणं यथाभूतमविपरीतं तत्त्वं भवति । असच्चासदिति गृह्यमाणं यथाभूतम- विपरीतं तत्त्वं भवति । कथमुत्तरस्य प्रमाणेनोपलब्धिरिति ? सत्युपलभ्यमाने तदनुपलब्धेः प्रदीपवत् । यथा दर्शकेन दीपेन दृश्ये गृह्यमाणे तदिव यन्न गृह्यते, तन्नास्ति; 'यद्यभविष्य- . जो अर्थ एक के लिये सुख का साधन हो सकता है, वही दूसरे के लिये दुःख का साधन बन सकता है । जैसे—बकरी के लिये वृक्ष के कोमल पत्ते मृदु होने से सुख के साधन ( सुखोत्पादक ) हैं, परन्तु वे ही ऊँट के लिये दुःखोत्पादक हो जाते हैं । उसी तरह ऊँट के लिये काँटेदार-झाड़ियों के पत्ते सुखोत्पादक हैं, वही बकरी के लिये दुःखोत्पादक । इसी प्रकार एक साधारण गृहस्थ के लिये स्त्री-पुत्रादि सुखोत्पादक हैं, परन्तु वे ही एक संन्यासी के लिये दुःखरूप हैं । उसी तरह विवेक, वैराग्य आदि से युक्त एक गृहस्थ स्त्री-पुत्रादि को दुःख समझ लेता है और उद्बुद्धपापकर्मा संन्यासी मठ-मन्दिरादि के परिग्रह में पड़ जाता है । ] इस सप्रयोजन (अर्थवान्) प्रमाण में प्रमाता, प्रमेय और प्रमिति—ये तीनों मिलकर होते हैं; क्योंकि इनमें से किसी एक के न होनेपर, अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । जिस पुरुष की ईप्सा या जिहासा को लेकर प्रवृत्ति होती है, वह 'प्रमाता' कहलाता है । वह पुरुष जिस ईप्सा या जिहासा को जिससे याथात्म्येन समझता है, वह 'प्रमाण' कह- लाता है । जो अर्थ (ईप्सित या जिहासित ) समझा जाता है, वह 'प्रमेय' कहलाता है । उस ईप्सित या जिहासित का यथार्थ ज्ञान ही 'प्रमिति' कहलाता है । इन चार प्रकारों में ही अर्थ का समग्र तत्त्व परिसमाप्त हो जाता है । (अर्थात् इन चारों द्वारा ईप्सित को ग्रहण किया जाता है, जिहासित को छोड़ दिया जाता है या उपेक्षित की उपेक्षा कर दी जाती है ।) यह अर्थ-तत्त्व क्या है ? सत् का सद्भाव और असत् का असद्भाव । अर्थात् सत् वह तत्त्व है, जो 'सत्' ऐसा जाना जाते हुए अविरुद्ध ( अनुकूल या उदासीन ) भी हो और यथार्थ भी हो । इसी तरह 'असत्' वह तत्त्व है, जो 'असत्' ऐसा जाना जाते हुए अनुकूल, उदासीन तथा यथार्थ हो । अन्तिम पक्ष (.असतश्चासद्भावः) के प्रमाण की उपलब्धि कैसे हो सकती है, क्योंकि जो है ही नहीं, वह हजार प्रमाणों से भी कैसे जाना जा सकेगा ? सत् के मिल जानेपर (उपलभ्यमानता सिद्ध रहते हुए) भी उसके न मिलने से वह जाना जा सकेगा,