न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] १. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ५
दिदमिव व्यज्ञास्यत विज्ञानाभावान्नास्ति' इत्येवं प्रमाणेन सति गृह्यमाणे तदिव यन्न गृह्यते, तन्नास्ति; 'यद्यभविष्यदिदमिव व्यज्ञास्यत, विज्ञानाभावान्नास्ति' इति । तदेवं सतः प्रकाशकं प्रमाणमसदपि प्रकाशयतीति । सच्च खलु षोडशधा व्यूढमुपदेक्ष्यते । तासां खल्वासां सद्गिधानाम्— प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डा - हेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥ निर्देशे यथावचनं विग्रहः । चार्थे द्वन्द्वसमासः । प्रमाणादीनां तत्त्वमिति शैषिकी षष्ठी । तत्त्वस्य ज्ञानम्, निःश्रेयसस्याधिगमः—इति कर्मणि षष्ठ्यौ । त एतावन्तो विद्यमानार्थाः, येषामविपरीतज्ञानार्थमिहोपदेशः । सोऽयम- नवयवेन तन्त्रार्थ उद्दिष्टो वेदितव्यः । जैसे—प्रदीप से । जैसे द्रष्टा पुरुष दीपक हाथ में लेकर दीखने योग्य ( सत् ) वस्तु को ग्रहण कर लेने की क्षमता रखते हुए भी उसी दृश्य वस्तु की तरह उस ( असत् ) को नहीं ग्रहण कर पाता है तो समझ लेता है कि वह नहीं है; क्योंकि वह ( असत् वस्तु ) होती तो अवश्य उसके द्वारा सत् की तरह जानी जाती; जानी नहीं गयी, इसलिये (योग्यानुपलब्धि प्रमाण से समझता है कि) वह नहीं है। इस तरह प्रमाण द्वारा सत् के जान लिये जानेपर उसकी तरह जो नहीं जाना जाता है तो समझ लिया जाता है कि वह नहीं है, यदि होता तो उसी तरह जाना जाता; जाना न जाने के कारण वह नहीं है। इस प्रकार 'सत्' का ज्ञान करानेवाला ( प्रकाशक ) प्रमाण 'असत्' का भी ज्ञान करा देता है । इस 'सत्' का संक्षेप में १६ प्रकार से उपदेश किया जायगा । सत् के इन प्रकारों में से १. प्रमाण, २. प्रमेय, ३. संशय, ४. प्रयोजन, ५: दृष्टान्त, ६. सिद्धान्त, ७. अवयव, ८. तर्क, ९. निर्णय, १०. वाद, ११. जल्प, १२. वितण्डा, १३. हेत्वाभास, १४. छल, १५. जाति, १६. निग्रहस्थान ( होते हैं इन ) के तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस ( मोक्ष ) प्राप्त होता है ॥ १ ॥ इस सूत्र में ( प्रमाण से ले कर निग्रहस्थान तक ) पदों का विग्रह लक्षणसूत्रोक्त लिंग-वचन के अनुसार रखना चाहिये । यहाँ 'चार्थे द्वन्द्वः' ( २-२-२९ ) इस पाणिनि सूत्र से द्वन्द्वसमास होता है, जिसमें कि सभी पदार्थ प्रधान होते हैं । 'प्रमाण············· स्थानानां तत्त्व—' यहां शेषषष्ठी समझें ( 'शेषषष्ठी' उसे कहते हैं जहाँ किसी भी कारक की विवक्षा न हो ) । 'तत्त्वस्य ज्ञानम्' तथा 'निःश्रेयसस्य अधिगमः' यहाँ उभ- यत्र कर्म में षष्ठी समझना चाहिये । ये इतने विद्यमान ( सत् ) अर्थ हैं, जिनके अविपरीत ज्ञान के लिये इस सूत्र में उपदेश किया गया है । इस प्रकार यह शास्त्र में किये जाने वाले समग्र उपदेश का उद्देश ( नाम मात्र से संकेत ) कर दिया गया है—ऐसा समझना चाहिये ।
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