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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

[Header] १. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ५

दिदमिव व्यज्ञास्यत विज्ञानाभावान्नास्ति' इत्येवं प्रमाणेन सति गृह्यमाणे तदिव यन्न गृह्यते, तन्नास्ति; 'यद्यभविष्यदिदमिव व्यज्ञास्यत, विज्ञानाभावान्नास्ति' इति । तदेवं सतः प्रकाशकं प्रमाणमसदपि प्रकाशयतीति । सच्च खलु षोडशधा व्यूढमुपदेक्ष्यते । तासां खल्वासां सद्गिधानाम्— प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डा - हेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥ निर्देशे यथावचनं विग्रहः । चार्थे द्वन्द्वसमासः । प्रमाणादीनां तत्त्वमिति शैषिकी षष्ठी । तत्त्वस्य ज्ञानम्, निःश्रेयसस्याधिगमः—इति कर्मणि षष्ठ्यौ । त एतावन्तो विद्यमानार्थाः, येषामविपरीतज्ञानार्थमिहोपदेशः । सोऽयम- नवयवेन तन्त्रार्थ उद्दिष्टो वेदितव्यः । जैसे—प्रदीप से । जैसे द्रष्टा पुरुष दीपक हाथ में लेकर दीखने योग्य ( सत् ) वस्तु को ग्रहण कर लेने की क्षमता रखते हुए भी उसी दृश्य वस्तु की तरह उस ( असत् ) को नहीं ग्रहण कर पाता है तो समझ लेता है कि वह नहीं है; क्योंकि वह ( असत् वस्तु ) होती तो अवश्य उसके द्वारा सत् की तरह जानी जाती; जानी नहीं गयी, इसलिये (योग्यानुपलब्धि प्रमाण से समझता है कि) वह नहीं है। इस तरह प्रमाण द्वारा सत् के जान लिये जानेपर उसकी तरह जो नहीं जाना जाता है तो समझ लिया जाता है कि वह नहीं है, यदि होता तो उसी तरह जाना जाता; जाना न जाने के कारण वह नहीं है। इस प्रकार 'सत्' का ज्ञान करानेवाला ( प्रकाशक ) प्रमाण 'असत्' का भी ज्ञान करा देता है । इस 'सत्' का संक्षेप में १६ प्रकार से उपदेश किया जायगा । सत् के इन प्रकारों में से १. प्रमाण, २. प्रमेय, ३. संशय, ४. प्रयोजन, ५: दृष्टान्त, ६. सिद्धान्त, ७. अवयव, ८. तर्क, ९. निर्णय, १०. वाद, ११. जल्प, १२. वितण्डा, १३. हेत्वाभास, १४. छल, १५. जाति, १६. निग्रहस्थान ( होते हैं इन ) के तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस ( मोक्ष ) प्राप्त होता है ॥ १ ॥ इस सूत्र में ( प्रमाण से ले कर निग्रहस्थान तक ) पदों का विग्रह लक्षणसूत्रोक्त लिंग-वचन के अनुसार रखना चाहिये । यहाँ 'चार्थे द्वन्द्वः' ( २-२-२९ ) इस पाणिनि सूत्र से द्वन्द्वसमास होता है, जिसमें कि सभी पदार्थ प्रधान होते हैं । 'प्रमाण············· स्थानानां तत्त्व—' यहां शेषषष्ठी समझें ( 'शेषषष्ठी' उसे कहते हैं जहाँ किसी भी कारक की विवक्षा न हो ) । 'तत्त्वस्य ज्ञानम्' तथा 'निःश्रेयसस्य अधिगमः' यहाँ उभ- यत्र कर्म में षष्ठी समझना चाहिये । ये इतने विद्यमान ( सत् ) अर्थ हैं, जिनके अविपरीत ज्ञान के लिये इस सूत्र में उपदेश किया गया है । इस प्रकार यह शास्त्र में किये जाने वाले समग्र उपदेश का उद्देश ( नाम मात्र से संकेत ) कर दिया गया है—ऐसा समझना चाहिये ।

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६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० आत्मादेः खलु प्रमेयस्य तत्त्वज्ञानान्निश्रेयसाधिगमः । तच्चैतदुत्तरसूत्रेणा- नूद्यत इति । हेयं तस्य निर्वर्तकम्, हानमात्यन्तिकम्, तस्योपायः, अधि- गन्तव्यः—इत्येतानि चत्वार्यर्थपदानि सम्यग्बुद्ध्वा निःश्रेयसमधिगच्छति । तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकम्, संशयादयो यथासम्भवं प्रमाणेषु प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्त इति ? सत्यमेतत्; इमास्तु चतस्रो विद्याः पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदिश्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्यायविद्या । तस्याः पृथक्प्रस्थानाः संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग्वचनमन्त- रेणाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात्, यथा—उपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः पृथक् प्रस्थाप्यते । तत्र नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते, किं तर्हि ? संशयितेऽर्थे । यथोक्तम्—'विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः' (१. १. ४१) इति । विमर्शः = संशयः, पक्षप्रतिपक्षौ = न्यायप्रवृत्तिः । अर्थाव- धारणम् = निर्णयः, तत्त्वज्ञानमिति । स चायं किंस्विदिति वस्तुविमर्शमात्रमनव- धारणं ज्ञानं संशयः प्रमेयेऽन्तर्भवन्नेवमर्थं पृथगुच्यते । आत्मा-आदि प्रमेयों के तत्त्व-ज्ञान से मोक्षप्राप्ति होती है। यह बात अनुपद (१.१.२ सूत्र) में स्पष्ट कर दी जायेगी १. हेय (दुःख और उसके उत्पादक अविद्या, तृष्णा आदि ), २. आत्यन्तिक हान (जिससे दुःख सदा के लिये क्षीण हो जाये अर्थात् तत्त्वज्ञान ), ३. उसके जानने का उपाय (शास्त्र), तथा ४. अधिगन्तव्य (मोक्ष)—इन चार अर्थपदों (पुरुषार्थ-स्थानों) को ठीक से जानकर अधिकारी पुरुष मोक्ष पा जाता है। शङ्का—सूत्र में संशयादि का अलग से पढ़ना निरर्थक है; क्योंकि संशयादि के प्रमाण या प्रमेयों में अन्तर्भूत होते हुये अलग से उनकी गणना नहीं होती ? बात तो ठीक है; परन्तु ये चारों विद्यायें (त्रयी, वार्ता, दण्डनीति, आन्वीक्षिकी) पृथक् विषयबोधक व्यापार वाली है, जिनमें यह चौथी आन्वीक्षिकी (न्यायविद्या) है। जिसके कि संशयादि पदार्थ पृथग्विषय माने गये हैं। इन संशयादिकों का यदि अलग से पाठ न करेंगे तो यह आन्वीक्षिकी भी अध्यात्मविद्यामात्र रह जायेगी; जैसे कि उपनिषद् । इस लिये यहाँ सूत्रकार द्वारा संशयादि पदार्थों से एक अलग ही बोध कराया गया है; क्योंकि इस तर्कशास्त्र का विषय न तो अनुपलब्ध अर्थ ही है, न निर्णीत अर्थ ही, अपितु संशयित अर्थ है। जैसा कि सूत्रकार ने कहा है—'विमर्श कर के पक्ष प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का अवधारण 'निर्णय' कहलाता है' (१.१.४१) । विमर्श = संशय । पक्ष प्रति- पक्ष = न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति । अर्थावधारण = निर्णय, तत्त्वज्ञान । 'यह क्या होगा?'— ऐसा वस्तु में सन्देहमात्र अनिर्णीत ज्ञान ही 'संशय' कहलाता है। इस संशय का वस्तुतः प्रमेय में अन्तर्भाव हो सकता है, परन्तु न्यायशास्त्र की सुलभ प्रवृत्ति के लिये सूत्रकार ने पृथक् पाठ किया है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ७ अथ प्रयोजनम् । येन प्रयुक्तः प्रवर्तते, तत् प्रयोजनम् । यमर्थमभीप्सन् जिहासन् वा कर्मारभते, तेनानेन सर्वे प्राणिनः सर्वाणि कर्माणि सर्वाश्च विद्या व्याप्ताः, तदाश्रयश्च न्यायः प्रवर्तते । कः पुनरयं न्यायः ? प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः । प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानं साऽन्वीक्षा । प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा, तया प्रवर्तत इत्यान्वी- क्षिकी = न्यायविद्या, न्यायशास्त्रम् । यत् पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धं न्याया- भासः स इति । तत्र वादजल्पौ सप्रयोजनौ । वितण्डा तु परीक्ष्यते—वितण्डया प्रवर्तमानो वैतण्डिकः । स प्रयोजनमनु- युक्तो यदि प्रतिपद्यते ? सोऽस्य पक्षः, सोऽस्य सिद्धान्तः इति वैतण्डिकत्वं जहाति । अथ न प्रतिपद्यते ? नायं लौकिको न परीक्षक इत्यापद्यते । अथापि परपक्षप्रति- षेधज्ञापनं प्रयोजनं ब्रवीति ? एतदपि तादृगेव; 'योज्ञापयति, यो जानाति, येन ज्ञाप्यते, यच्च ज्ञाप्यते'-एतच्च प्रतिपद्यते यदि ? तदा वैतण्डिकत्वं जहाति । अथ न प्रतिपद्यते ? 'परपक्षप्रतिषेधज्ञापनं प्रयोजनम्' इत्येतदस्य वाक्यमनर्थकं 'प्रयोजन—जिससे प्रेरित होकर पुरुष अर्थ में प्रवृत्त होता है, उसे 'प्रयोजन' कहते हैं । जिस अर्थ को चाहता हुआ या छोड़ने की इच्छा करता हुआ क्रिया प्रारम्भ करता है, उसी ( प्रयोजन ) से सब प्राणी, सब कर्म तथा सभी विद्यायें सम्बद्ध हैं । और उसी के अधीन न्याय भी प्रवृत्त होता है । यह न्याय क्या है ? अनुमानादि प्रमाणों से अर्थ का परीक्षण ( परिशोधन ) 'न्याय' ( निश्चय ) कहलाता है । प्रत्यक्ष तथा आगम से अविरुद्ध अनुमान को 'अन्वीक्षा' कहते हैं । प्रत्यक्ष तथा आगम के बाद का ईक्षण ( अनुमान ) 'अन्वीक्षा' कहलाता है । उसका आश्रय लेकर जो प्रवृत्त हो उसे ही 'आन्वीक्षिकी' 'न्यायविद्या', या 'न्यायशास्त्र' कहते हैं । और जो अनुमान प्रत्यक्ष तथा आगम के विरुद्ध हो वह 'न्यायाभास' कहलाता है । उस न्यायविद्या में वाद तथा जल्प 'प्रयोजन' के साथ रहते हैं । ( वाद का प्रयोजन है तत्त्वज्ञान और जल्प का प्रयोजन है विजय । ) वितण्डा पर भी विचार कर लें । शास्त्रार्थ में वितण्डा से प्रवर्तमान पुरुष को 'वैतण्डिक' कहते हैं । यदि वह प्रयोजन पूछे जाने पर 'यह उसका पक्ष है', या 'यह उसका सिद्धान्त है' ऐसा स्वीकार करता है तो अपने वैतण्डिकत्व को ही छोड़ बैठता है । यदि कुछ भी नहीं स्वीकार करता है तो साधारणजन उसे न तो लौकिक समझेंगे, न परीक्षक ही । यदि वह 'परपक्ष का खण्डन' ही अपना प्रयोजन बतावे ? तो इससे भी उसका वैतण्डिकत्व कहाँ रह पायेगा ! क्योंकि यदि वह 'जिसके द्वारा बोध कराया जाता है', 'जो जानता है', 'जो बोध कराया जाता है' या 'जिसको बोध कराया जाता है'— इन चार बातों को स्वीकार कर लेता है तो उसका वैतण्डिकत्व कैसा ? यदि नहीं स्वी- CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० भवति । वाक्यसमूहश्च स्थापनाहीनो वितण्डा, तस्य यद्यभिधेयं प्रतिपद्यते ? सोऽस्य पक्षः स्थापनीयो भवति । अथ न प्रतिपद्यते ? प्रलापमात्रमनर्थकं भवति, वितण्डात्वं निवर्त्तत इति । अथ दृष्टान्तः प्रत्यक्षविषयोऽर्थः—यत्र लौकिकपरीक्षकाणां दर्शनं न व्याह- न्यते, स च प्रमेयम् । तस्य पृथग्वचनं च—तदाश्रयावनुमानागमौ । तस्मिन् सति स्यातामनुमानागमौ, असति च न स्याताम् । तदाश्रया च न्यायप्रवृत्तिः । दृष्टान्तविरोधेन च परपक्षप्रतिषेधो वचनीयो भवति, दृष्टान्तसमाधिना च स्वपक्षः साधनीयो भवति । नास्तिकश्च दृष्टान्तमभ्युपगच्छन्नास्तिकत्वं जहाति, अनभ्युपगच्छन् किंसाधनः परमुपालभेतेति ! निरुक्तेन च दृष्टान्तेन शक्यमभि- धातुम्—'साध्यसाधर्म्यात् तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्' (१. १. ३६), तद्वि- पर्ययाद्वा विपरीतम्' (१. १. ३७) इति । 'अस्त्ययम्' इत्यनुज्ञायमानोऽर्थः सिद्धान्तः, स च प्रमेयम् । तस्य पृथग्वचनम्—सत्सु सिद्धान्तभेदेषु वादजल्पवितण्डाः प्रवर्त्तन्ते, नातोऽन्येथेति । कार करता है तो उसका 'परपक्षखण्डन मेरा प्रयोजन है'—यह वाक्य निष्प्रयोजन हो जायेगा । (स्वपक्ष) स्थापनाहीन वाक्यसमूह 'वितण्डा' कहलाता है । यदि वैतण्डिक वाक्य का अभिधेय स्वीकार कर लेता है तो वही उसका पक्ष-स्थापन कहलायेगा, यदि नहीं स्वीकार करता है तो शास्त्रार्थ में उसका सब कुछ कहा-सुना प्रलापमात्र तथा निरर्थक होगा, वितण्डात्व कहाँ रहेगा ! अब दृष्टान्त का निरूपण करते हैं—प्रत्यक्ष (प्रमाणमात्र) से जहाँ साध्य अर्थ को लौकिक स्वीकार करते हैं वह 'दृष्टान्त' कहलाता है, अर्थात् जहाँ लौकिक परीक्षकों की बात न कट पाये । वह भी प्रमेय के ही अन्तर्भूत है । उसको सूत्र में अलग इसलिये पढ दिया गया कि अनुमान और आगम प्रमाण उसके अधीन हैं—उसके होने पर वे होंगे, उसके न होने पर नहीं होंगे । न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति भी तदाश्रित ही है । विरुद्ध दृष्टान्त से परपक्ष का खण्डन किया जाता है, तथा अनुकूल दृष्टान्त से स्वपक्ष-समर्थन । नास्तिक पुरुष यदि शास्त्रार्थ में दृष्टान्त का सहारा लेगा तो वह अपना 'नास्तिकत्व' ही खो बैठेगा, यदि सहारा न लेगा तो वह किस साधन से परपक्ष का खण्डन कर पायेगा ! दृष्टान्त का निर्वचन करने के लिये हम कह सकते हैं—'साध्य की समानधर्मता से युक्त तद्धर्मभावी दृष्टान्त कहलाता है' ( १. १. ३६ ), तथा 'उसके विपर्यय से विपरीत' ( १. १. ३७ ) । प्रमाणजन्य प्रतीति के बाद 'यह प्रमाण का विषय है' या 'ऐसा ही है'—इस तरह स्वीक्रियमाण अर्थ सिद्धान्त कहलाता है । यह भी प्रमेय है । सिद्धान्तों के भिन्न होने पर ही वाद, जल्प, वितण्डा ( इन प्रमेयों ) की प्रवृत्ति होती है, अन्यथा नहीं । इसलिये सिद्धान्त को एक पृथक् प्रमेय माना है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ९ साधनीयार्थस्य यावति शब्दसमूहे सिद्धिः परिसमाप्यते, तस्य पञ्चावयवाः प्रतिज्ञादयः समूहमपेक्ष्यावयवा उच्यन्ते । तेषु प्रमाणसमवायः आगमः प्रतिज्ञा, हेतुरनुमानम्, उदाहरणं प्रत्यक्षम्, उपनयनमुपमानम्, सर्वेषामेकार्थसमवाये सामर्थ्यप्रदर्शनं निगमनमिति । सोऽयं परमो न्याय इति । एतेन वादजल्पवितण्डाः प्रवर्तन्ते, नातोऽन्यथेति । तदाश्रया च तत्त्वव्यवस्था । ते चैतेऽवयवाः शब्द- विशेषाः सन्तः प्रमेयेऽन्तर्भूताः, एवमर्थं पृथगुच्यन्त इति । तर्को न प्रमाणसंगृहीतः, न प्रमाणान्तरम्, प्रमाणानामनुग्राहकस्तत्त्वज्ञानाय कल्पते । तस्योदाहरणम्—किमिदं जन्म कृतकेन हेतुना निर्वर्त्यते ? आहोस्विद- कृतकेन ? अथाकस्मिकमिति ? एवमविज्ञातेऽर्थे कारणोपपत्त्या ऊहः प्रवर्तते— 'यदि कृतकेन हेतुना निर्वर्त्यते ? हेतूच्छेदादुपपन्नोऽयं जन्मोच्छेदः । अथाकृत- केन हेतुना ? ततो हेतूच्छेदाशक्यत्वादद्यनुपपन्नो जन्मोच्छेदः । अथाकस्मि- कम् ? अतोऽकस्मान्निर्वर्त्यमानं न पुनर्निर्वर्त्स्यतीति निवृत्तिकारणं नोपपद्यते, तेन जन्मानुच्छेदः' इति । एतस्मिंस्तर्कविषये कर्मनिमित्तं जन्मेति प्रमाणानि प्रवर्तमानानि तर्केणाऽनुगृह्यन्ते । तत्त्वज्ञानविषयस्य विभागात् तत्त्वज्ञानाय कल्पते पाँचों अवयवों द्वारा ज्ञापनीय अर्थ का जितने शब्दसमूह से विशेष प्रत्यय हो जाये, उस शब्दसमूह के प्रतिज्ञादि पाँचों अवयव समूह की अपेक्षा से अवयव कहलाते हैं । इन अवयवों में ही सब प्रमाण एकत्र हो जाते हैं । जैसे—'प्रतिज्ञा' शब्दप्रमाण है, 'हेतु' अनु- मान प्रमाण है, 'उदाहरण' प्रत्यक्ष प्रमाण है, 'उपनयन' उपमान प्रमाण है, सभी प्रमाणों का एकार्थ-प्रतिपादन में सामर्थ्य-प्रदर्शन 'निगमन' कहलाता है । इन्ही पाँचों अवयवों के सहारे—वाद, जल्प, वितण्डा की प्रवृत्ति होती है । तत्त्वज्ञान-व्यवस्था भी तदधीन है । इन पाँचों अवयवों के वस्तुतः शब्दविशेष ही होने के कारण प्रमेय के अन्तर्भूत होते हुए भी, इसीलिए इनका अलग से निर्वचन किया गया है । तर्क न प्रमाणों में अन्तर्भूत हो सकता है, न यह उन से कोई अलग प्रमाण है, अपितु उन प्रमाणों का सहकारिमात्र है, जैसे दीपक चक्षु का सहकारी होता है । उदाहरण— 'यह जन्म क्या विनाशी कारण से निष्पन्न होता है, या अविनाशी कारण से अथवा आकस्मिक कारण से ?'—इस प्रकार के संशयित अर्थ में सम्भावित कारण और कार्यों के विचार में तर्क उठता है—'यदि विनाशी कारण से जन्म निष्पन्न होता तो कारण के विनाश से जन्म का उच्छेद भी हो ही जायेगा, यदि अविनाशी कारण से निष्पन्न होगा तो कारण का नाश कभी न हो पाने के कारण जन्मोच्छेद ही असम्भव हो जायेगा, यदि आकस्मिक कारण माना जाये तो अकस्मात् जन्मोच्छेद हो पुनः जन्म निष्पन्न न होगा— इस तरह निवृत्तिकारण न बनने से जन्म का उच्छेद होगा ही नहीं । इस प्रकार की तर्कणा के अवसर पर 'जन्म कर्मनिमित्तक है'—ऐसा प्रमाणों से सिद्ध होता है । इस CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० तर्क इति । सोऽयमित्थम्भूतस्तर्कः प्रमाणसहितो वादे साधनाय, उपालम्भाय चार्थस्य भवतीत्येवमर्थं पृथगुच्यते प्रमेयान्तर्भूतोऽपीति । निर्णयस्तत्त्वज्ञानं प्रमाणानां फलम् । तदवसानो वादः । तस्य पालनार्थं जल्प- वितण्डे । तावेतौ तर्कनिर्णयौ लोकयात्रां वहत इति । सोऽयं निर्णयः प्रमेयान्त- र्भूत एवमर्थं पृथगुद्दिष्ट इति । वादः खलु नानाप्रवक्तृकः प्रत्यधिकरणसाधनोऽन्यतराधिकरणनिर्णयावसानो वाक्यसमूहः पृथगुद्दिष्ट उपलक्षणार्थम्; उपलक्षितेन व्यवहारस्तत्त्वज्ञानाय भवतीति । तद्विशेषौ जल्पवितण्डे तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थमित्युक्तम् ( ४. २. ५० ) । निग्रहस्थानेभ्यः पृथगुद्दिष्टा हेत्वाभासा वादे चोदनीया भविष्यन्तीति । जल्पवितण्डयोस्तु निग्रहस्थानानीति । सिद्धि में तर्क प्रमाणों का सहकारी बनकर तत्त्वज्ञान में सहायक होता है। इसीलिये इस तर्क को वाद में अर्थ की स्थापना तथा प्रतिषेध के लिए आचार्य ने पृथक् निर्दिष्ट किया है। वास्तव में इसका प्रमेय में ही अन्तर्भाव हो जायेगा । प्रमाणों के फल (प्रयोजन) तत्त्वज्ञान को निर्णय कहते हैं। किसी भी विषय का निष्कर्ष (निर्णय) निकले—इसी को लेकर 'वाद' किया जाता है। उस (निर्णय) की रक्षा (बाधकहेतुनिवारण तथा साधकहेतुधारण) के लिये ही जल्प तथा वितण्डा का प्रयोग किया जाता है। ये दोनों (तर्क और निर्णय) लोकव्यवहार को सफल बनाते हैं। इसलिये आचार्य ने निर्णय का पृथक् उल्लेख किया है। वस्तुतः यह प्रमेय के ही अन्त- र्भूत है। जो अनेक वक्ताओं (कम से कम दो) के रहने पर हो, प्रत्येक अधिकृत अर्थ उसका विषय हो, जिसके अन्त में किसी एक विषय के निर्णय पर पहुँचा जाये, ऐसे तर्क तथा पञ्चावयवसहित वाक्यसमूह को वाद कहते हैं। आचार्य ने इसे उपलक्षण (ज्ञान) के लिये अलग उद्दिष्ट किया है; क्योंकि ज्ञात वस्तु से ही व्यवहार तत्त्वज्ञान के लिये होता है। अपने आप में कुछ विशेषता रखनेवाले १ जल्प और वितण्डा तत्त्वनिश्चय-पालन के लिये हैं—ऐसा आगे कहेंगे (४. २. ५०) । निग्रहस्थानों से पृथक् करके उद्दिष्ट हेत्वाभासों का वाद में उपयोग होता है—ऐसा आगे (पंचम अध्याय में) कहेंगे। जल्प और वितण्डा निग्रहस्थान हैं। तात्पर्य यह है कि हेत्वाभासोद्भावन और वाद का तत्त्वनिर्णय में ही प्रयोजन है, वादविजय में नहीं; १. जल्प में छल, जाति, निग्रहस्थान के प्रयोग से अङ्गाधिक्य है, वितण्डा में स्वपक्षस्था- पन ही नहीं है—इस तरह ये दोनों क्रमशः अंगाधिक्य और अंगहानि वाले हैं। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ११ छलजातिनिग्रहस्थानानां पृथगुपदेश उपलक्षणार्थमिति । उपलक्षितानां स्ववाक्ये परिवर्जनम्, छलजातिनिग्रहस्थानानां परवाक्ये पर्यनुयोगः । जातेश्च परेण प्रयुज्यमानायाः सुलभः समाधिः, स्वयं च सुकरः प्रयोग इति । सेयमान्वीक्षिकी प्रमाणादिभिः पदार्थैर्विभज्यमाना— प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्त्तिता ॥ तदिदं तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसाधिगमार्थं १ यथाविद्यं वेदितव्यम् । इह त्वध्यात्म- विद्यायामात्मादितत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानम्, निःश्रेयसाधिगमोऽपवर्गप्राप्तिरिति ॥१॥ तत् खलु निःश्रेयसं किं तत्त्वज्ञानानन्तरमेव भवति ? नेत्युच्यते; किं तर्हि ? तत्त्वज्ञानात्— क्योंकि एक वाद में सभी निग्रहस्थानों का उद्भावन सम्भव नहीं है, परन्तु हेत्वाभास ऐसे निग्रहस्थान हैं जिनका वाद से सर्वथा उद्भावन हो सकता है । इसलिए इनका पृथक् उपदेश किया है । छल, जाति, निग्रहस्थान—इनका उपदेश उपलक्षण के लिये है । उपलक्षित छल, जाति, निग्रहस्थानों का अपने वाक्य में त्याग और दूसरों के वाक्य में प्रयोग किया जा सकता है । दूसरे द्वारा प्रयुक्त जाति का समाधान विद्वानों के लिये सुलभ है, अपने वाक्य में उसका प्रयोग करना भी उनके लिये सरल है । इस प्रकार ये संशयादि पदार्थ प्रमाण या प्रमेय में अन्तर्भूत होते हुए भी न्यायविद्या का प्रस्थान-भेद बताने के लिये पृथक् पढ़े गये हैं । यह आन्वीक्षिकी विद्या प्रमाणादि पदार्थों से विभक्त होती हुई, सभी अन्य विद्याओं के लिये दीपोपम है, सभी लौकिक-वैदिक कार्यों की उपकारिका (भृत्यादिवत् सहायिका) है, सभी धर्मों की आश्रय है । इस विद्या का यह संक्षिप्त रूप अर्थशास्त्र के विद्योद्देश में बताया गया है । यह 'तत्त्वज्ञान' और 'निःश्रेयसप्राप्ति' उस-उस विद्या के अनुसार ही समझना चाहिये । इस आन्वीक्षिकी विद्या (न्यायशास्त्र) में, जो कि अध्यात्म विद्या भी कहलाती है, आत्मा-आदि प्रमेयों का तत्त्वज्ञान ही 'तत्त्वज्ञान' कहलाता है और निःश्रेयसप्राप्ति 'मोक्षप्राप्ति' कहलाती है ॥ १ ॥ तो क्या यह निःश्रेयस (मोक्ष) तत्त्वज्ञान के बाद ही हो जाता है ? नहीं ! अपितु तत्त्वज्ञानसे— १. 'निःश्रेयसाधिगमश्च'—इति पाठ० ।

१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः ॥ २ ॥ तत्रात्माद्यपवर्गपर्यन्तं प्रमेये मिथ्याज्ञानमनेकप्रकारकं वर्त्तते । आत्मनि तावत्-नास्तीति । अनात्मनि-आत्मेति । दुःखे-सुखमिति । अनित्ये-नित्यमिति । अत्राणे-त्राणमिति । सभये-निर्भयमिति । जुगुप्सिते-अभिमतमिति । हातव्ये- अप्रतिहातव्यमिति । प्रवृत्तौ-'नास्ति कर्म, नास्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु- 'नायं दोषनिमित्तः संसारः' इति । प्रेत्यभावे-'नास्ति जन्तुर्जीवो वा, सत्त्व आत्मा वा यः प्रेयात्, प्रेत्य च भवेदिति, अनिमित्तं जन्म, अनिमित्तो जन्मोपरम इत्यादि- मान् प्रेत्यभावः, अनन्तश्चेति, नैमित्तिकः सन्नकर्मनिमित्तः प्रेत्यभाव इति, देहे- न्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां निरात्मकः प्रेत्यभावः' इति । अपवर्गे-'भीष्मः खल्वयं सर्वकार्योपरमः, सर्वविप्रयोगेऽपवर्गे बहु भद्रकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेदमचैतन्यममुपवर्गं रोचयेत्' इति । मिथ्या ज्ञान नष्ट होता है, मिथ्याज्ञान-नाश से दोष नष्ट होते हैं, दोषापाय से प्रवृत्ति नहीं होती, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होता, जन्म न होने से दुःख नहीं होता तथा दुःख के न होने से अपवर्ग (स्वतः सिद्ध) हो जाता है ॥ २ ॥ यहाँ आत्मा से अपवर्ग पर्यन्त प्रमेयों में अनेक तरह का मिथ्याज्ञान रहता है, जैसे— आत्मा 'नहीं हैं', ऐसा मिथ्याज्ञान; अनात्म-पदार्थों में 'आत्मा हैं' ऐसा; दुःख में 'सुख' ऐसा; अनित्य ( देहादि ) में 'नित्य' ऐसा; अत्राण ( कलत्र पुत्र गेहादि ) में 'त्राण' ऐसा; सभय ( धन-पुत्र आदि ) में 'निर्भय' ऐसा; जुगुप्सित ( अस्थि, मांस, शोणित, मल, मूत्रादि से युक्त स्वशरीर-परशरीर ) में 'प्रशस्त' ऐसा; हातव्य (जन्म आदि संसार ) में 'अप्रहातव्य' ऐसा; प्रवृत्ति (पुण्य-पापादि अदृष्ट कर्म) में 'कर्म नहीं हैं', 'कर्म स्वर्ग-नर- कादि-फलप्रद नहीं हैं' ऐसा; दोष ( राग, द्वेष, मोह ) में 'यह संसार दोष के कारण नहीं हैं' ऐसा; प्रेत्यभाव (मरकर पुनः जन्म लेना) में 'ऐसा कोई जन्तु (पैदा करनेवाला) या जीव ( पैदा होनेवाला ) नहीं है, तो आत्मा नहीं है जो मरे या मरकर पुनः जन्म ले' ऐसा; 'जन्म में कोई निमित्त ( धर्माधर्मादि ) नहीं है, मोक्ष भी अनिमित्त (तत्त्वज्ञान के बिना ही ) होता है', इसलिये 'यह मरना-जीना आदिमान् और अनन्त हैं', 'यह मरना-जीना स्वभावादिनिमित्तक तो है, पर कर्मनिमित्तक नहीं हैं', यह मरना-जीना, देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना ( हर्ष-शोकविषाद ) के उच्छेद, प्रतिसन्धान से रहित ( क्षणिक- विज्ञान-स्वरूप या शून्यरूप ) हैं' ऐसा; मोक्ष के विषय में 'समस्त कार्यों से उपरति निश्चय ही भयानक होगी, सबसे अलग इस अपवर्ग में सभी मनोरञ्जक तथा सुखकर बातें लुप्त हो जायेंगी तो कौन बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेद रूप मोक्ष को चाहेगा'—ऐसा ( मिथ्या ज्ञान होता है ) । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् १३ एतस्मान्मिथ्याज्ञानादनुकूलेषु रागः, प्रतिकूलेषु द्वेषः । रागद्वेषाधिकाराच्चाऽसूयेर्ष्यामायालोभादयो दोषा भवन्ति । दोषैः प्रयुक्तः शरीरेण प्रवर्त्तमानो हिंसास्तेयप्रतिषिद्धमैथुनान्य्याचरति, वाचाऽनृतपरुषसूचनाऽ- सम्बद्धानि, मनसा परद्रोहं परद्रव्याभीप्सां नास्तिक्यं चेति । सेयं पापात्मिका प्रवृत्तिरधर्माय । अथ शुभा—शरीरेण दानं परित्राणं परिचरणं च, वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्यायं चेति, मनसा दयामस्पृहां श्रद्धां चेति । सेयं धर्माय । अत्र प्रवृत्तिसाधनौ धर्माधर्मौ प्रवृत्तिशब्देनोक्तौ । यथा—अन्नसाधनाः प्राणाः ‘अन्नं वै प्राणिनः प्राणाः’ इति । सेयं प्रवृत्तिः कुत्सितस्याभिपूजितस्य च जन्मनः कारणम् । जन्म पुनः— इस मिथ्याज्ञान से अनुकूल विषय में राग तथा प्रतिकूल विषय में द्वेष होता है । राग द्वेष का विषय बन जाने से असूया ( गुणों में दोषाविष्करण ), ईर्ष्या ( शत्रु की प्रिय वस्तु की हानि की इच्छा ), माया ( दम्भ ), लोभ ( अन्याय से परद्रव्य पाने की इच्छा ) आदि दोष उत्पन्न होते हैं । दोषों के वशीभूत होकर शरीर से चेष्टा करता हुआ हिंसा, स्तेय, प्रतिषिद्ध मैथुन ( परदारागमन ) आदि का आचरण करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ अनृत ( मिथ्या वचन ) परुष ( कठोर = दुःखद वचन ) सूचना ( चुगली करना ) असम्बद्ध ( ऊटपटांग प्रलाप ) आदि का; तथा मनसे चेष्टा करता हुआ परद्रोह ( जिघांसा या अपकार ), परद्रव्य की इच्छा करना, नास्तिक्य ( परलोक नहीं हैं—ऐसी बुद्धि ) का आचरण करता है । यह पापात्मिका प्रवृत्ति अधर्म ( अशुभ ) के लिये होती है । अब शुभ प्रवृत्ति का वर्णन करते हैं—शरीर से चेष्टा करता हुआ वह मन्त्रादिपूर्वक या सामान्यतः दान करता है, परित्राण ( निरीह प्राणियों की रक्षा ), परिचरण ( तीर्था- टन या गुरुसेवा ) करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ सत्य ( यथार्थ ), हित ( उप- कारक ), प्रिय ( प्रीतिकर ) वचन बोलता है । मन से चेष्टा करता हुआ दया ( निःस्वार्थ दुःखप्रहाणेच्छा ), स्वाध्याय ( वेद या पुराण आदि का अध्ययन ) करता है । अस्पृहा ( लोभत्याग ), श्रद्धा ( शास्त्र में दृढ विश्वास ) रखता है । यह शुभ प्रवृत्ति धर्म ( शुभा- दृष्ट ) के लिये होती है । इस सूत्र में प्रवृत्ति के साधन धर्म और अधर्म को ‘प्रवृत्ति’ पद से कह दिया गया है । जैसे—‘अन्नं वै प्राणाः’ इस श्रुति में प्राणों के साधन अन्न को ‘प्राण’ कह दिया गया । यह प्रवृत्ति कुत्सित या प्रशस्त जन्म का कारण होती है। शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि—तीनों के निकाय ( सजातीय कुलों ) से विशिष्ट प्रादुर्भाव को ‘जन्म’ कहते हैं । जन्म होने पर CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० शरीरेन्द्रियबुद्धीनां निकायविशिष्टः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति दुःखम् । तत्पुनः प्रतिकूलवेदनीयम्-बाधना, पीडा, ताप इति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो दुःखान्ता धर्मा अविच्छेदेनैव प्रवर्तमानाः-संसार इति । यदा तु तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति, तदा मिथ्याज्ञानापाये दोषा अपयन्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति, प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमपैति, दुःखापाये च आत्यन्तिकोऽपवर्गो निःश्रेयसमिति । तत्त्वज्ञानं तु खलु मिथ्याज्ञानविपर्ययेण व्याख्यातम्। आत्मनि तावत्- अस्तीति, अनात्मनि-अनात्मेति । एवं दुःखे, अनित्ये, अत्राणे, सभये, जुगुप्सिते, हातव्ये च यथाविषयं वेदितव्यम् । प्रवृत्तौ-'अस्ति कर्म अस्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु-'दोषनिमित्तोऽयं संसारः' इति । प्रेत्यभावे खलु-'अस्ति जन्तुर्जीवः, सत्त्वः आत्मा वा यः प्रेत्य भवेदिति, निमित्तवज्जन्म, निमित्तवान् जन्मोपरम इत्यानादिः प्रेत्यभावोऽपवर्गान्त इति, नैमित्तिकः सन् प्रेत्यभावः प्रवृत्तिनिमित्त इति, सात्मकः सन् देहेन्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां प्रवर्त्तते' इति । अपवर्गे-'शान्तः खल्वयं सर्वविप्रयोगः; सर्वोपरमोऽपवर्गः, बहु च कृच्छ्रं घोरं दुःख होता है । वह दुःख प्रतिकूलवेदनीय ( अहित रूप से अनुभवनीय ) होता है । उसे बाधना ( व्यथा ) पीड़ा, ताप भी कहते हैं । ये मिथ्याज्ञान से लेकर दुःखपर्यन्त धर्म अवि- च्छिन्न रूपसे जब प्रवृत्त होते हैं तो इसे ही 'संसार' कहते हैं । और जब तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान नष्ट हो जाता है, तब मिथ्याज्ञान के न रहने से दोष नष्ट हो जायेंगे दोषनाश से प्रवृत्ति नहीं होगी, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होगा, जन्म न होने से दुःख नहीं होगा तथा दुःख के न होनेपर आत्यन्तिक ( ऐकान्तिक ) अपवर्ग 'निःश्रेयस' ( मोक्ष ) हो जाता है । तत्त्वज्ञान का व्याख्यान मिथ्याज्ञान के व्याख्यान से उलटा किया गया है । जैसे- आत्मा के विषय में 'है' ऐसा, अनात्म पदार्थों में 'अनात्मा' ऐसा । इसी तरह दुःख, अनित्य, .अत्राण, सभय, जुगुप्सित तथा हातव्य के बारे में भी विषय के अनुसार समझना चाहिये । प्रवृत्ति के विषय में-'कर्म हैं', 'कर्मों का फल हैं' ऐसा; दोषों के बारे में 'यह संसार दोषों से उत्पन्न हैं' ऐसा; पुनर्जन्म के बारे में-'है ऐसा जीव या जन्तु सत्त्व या आत्मा, जो मरकर पुनः जन्म ग्रहण करे' ऐसा, 'जन्म की उपरति भी निमित्त कारण- वाली है, अतः यह मरना-जीना प्रवाहरूप से अनादि होते हुए मोक्षपर्यन्त है' ऐसा, 'यह मरना-जीना नैमित्तिक होता हुआ प्रवृत्तिनिमित्तक है' ऐसा; 'सात्मक होता हुआ देह, इन्द्रिय, बुद्धि वेदना की सन्तति ( निरन्तर प्रवाह ) से उच्छेद और प्रतिसन्धान द्वारा प्रवृत्त होता है' ऐसा; अपवर्ग के विषय में-'यह सभी से नाता टूटना बहुत ही शान्त है, सब तरह से छुटकारा पा जाना अपवर्ग है, इससे बहुत ही कठिन और भयानक पाप CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

पापकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वदुःखोच्छेदं सर्वदुःखसंविदमपवर्गं न रोचयेदिति । तद्यथा-मधुविषसम्पृक्तान्नमनादेयमिति, एवं सुखं दुःखानुषक्त- मनादेयम्' इति ॥ २ ॥ २. प्रमाणप्रकरणम् [ ३-८ ] त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशः, लक्षणम्, परीक्षा चेति । तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः । तत्रोद्दिष्टस्य तत्त्वव्यवच्छेदको धर्मो लक्षणम् । लक्षितस्य 'यथालक्षणमुपपद्यते न वा' इति प्रमाणैरवधारणं परीक्षा । तत्रोद्दिष्टस्य प्रविभक्तस्य लक्षणमुच्यते, यथा-प्रमाणानां प्रमेयस्य च । उद्दिष्टस्य लक्षितस्य च विभागवचनम्, यथा छलस्य-'वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या च्छलम्, तत्त्रिविधम्'-( १. २. ५१-५२ ) इति । अथोद्दिष्टस्य विभागवचनम्— प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥ ३ ॥ अक्षस्याऽक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः = प्रत्यक्षम् । वृत्तिस्तु-सन्निकर्षः, ज्ञानं वा। यदा सन्निकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः, यदा ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् । विनष्ट हो गये, कौन बुद्धिमान् ऐसे सब दुःखों तथा उनकी अनुभूति से छुटकारा दिलाने- वाले अपवर्ग को न चाहेगा ! जैसे जहर मिला हुआ मीठा भोजन नहीं खाया जाता, वैसे ही दुखानुपक्त सुख भी नहीं चाहा जाता' ॥ २ ॥ उद्देश, लक्षण, परीक्षा—यों तीन प्रकार से इस शास्त्र की प्रवृत्ति होती है। उनमें केवल नाम लेकर पदार्थ का गिनाना 'उद्देश' कहलाता है। उद्दिष्ट ( नाममात्र से गिनाये गये ) का स्वरूपभेदक धर्म 'लक्षण' कहलाता है। लक्षित (स्वरूपभेदक धर्मवान्) का 'यह लक्षणानुसारी है या नहीं'—इसका प्रमाणों से निश्चय करना 'परीक्षा' कहलाती है। यह विभाग पुनः दो प्रकार का है—१. जो उद्दिष्ट तथा प्रविभक्त हैं उनका लक्षण कहा जाता है, जैसे—प्रमाण और प्रमेयों का । २. तथा जो उद्दिष्ट तथा लक्षित हैं उनका विभाग कहा जाता है, जैसे—छल का विभागवचन ( १. २. ५१-५२ )। अब यह उद्दिष्ट का विभागवचन है— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द-ये चार प्रमाण ( हैं ) ॥ ३ ॥ इन्द्रिय की प्रत्येक विषय को लेकर वृत्ति ही 'प्रत्यक्ष' कहलाती है। संनिकर्ष या प्रमिति ही यहाँ 'वृत्ति' पद का वाच्य है। जब संनिकर्ष होगा तभी ज्ञान होगा, वही प्रमिति है, और तब हान (त्याग), उपादान (ग्रहण) या उपेक्षा बुद्धि रूप फल निष्पन्न होगा ।

१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० अनुमानम्-मितेन लिङ्गेन लिङ्गिनोऽर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम् । उपमानम्-सारूप्यज्ञानम्१, 'यथा गौरेवं गवयः' इति । सारूप्यं२ तु सामान्ययोगः । शब्दः-शब्द्यतेऽनेनार्थ इत्यभिधीयते = ज्ञायते । 'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानि' इति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोद्धव्यम् । 'प्रमीयतेऽनेन' इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः । तद्विशेषसमाख्याया अपि तथैव व्याख्यानम् । किं पुनः प्रमाणानि प्रमेयमभिसम्पप्लवन्ते ? अथ प्रमेयं व्यवतिष्ठन्त इति ? उभयथा दर्शनम्-'अस्त्यात्मा' इत्याप्तोपदेशात् प्रतीयते, तत्रानुमानम्-'इच्छा- द्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' ( १ १. १० ) इति, प्रत्यक्षम्-युञ्जा- नस्य योगसमाधिजमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मा प्रत्यक्ष इति । अग्निरप्तो- पदेशात् प्रतीयते-'अत्राऽग्निः' इति, प्रत्यासीदता धूमदर्शनेनानुमीयते, प्रत्यासन्नेन अनुमान-व्याप्ति या पक्षधर्मता से प्रमित लिङ्ग ( हेतु ) द्वारा लिङ्गी ( ज्ञाप्य ) अर्थ के पश्चात् ( प्रत्यक्षानन्तर हुए ) मान को 'अनुमान' कहते हैं। उपमान-सादृश्यज्ञान को 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी यह गौ है ऐसा ही गवय होता हैं' । सारूप्य से तात्पर्य है सामान्य सादृश्य सम्बन्ध । शब्द-जिस विभक्त्यन्तसमूह से वाक्यार्थबोध होता हो वह 'शब्द' प्रमाण है। प्रमाण उपलब्धि के साधन हैं-यह 'प्रमाण' इस समाख्या ( नाम ) के निर्वचन ( 'प्रमीयतेऽनेन' इस तृतीया समास ) से समझना चाहिए । 'प्रमीयतेऽनेन' (जिसके द्वारा प्रमिति की जाये)-इस व्युत्पत्ति से 'प्रमाण' शब्द करण अर्थ को बतलाता है। तत्तद्विशेष ( प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द ) की समाख्या का भी इसी तरह करणव्युत्पत्ति से व्याख्यान समझना चाहिए । क्या एक एक प्रमेय में कई प्रमाणों का व्यापार होता है ? या एक एक का ही ? १. कई प्रमाण भी देखे जाते हैं। जैसे 'आत्मा हैं' इसमें आप्तोपदेश (शाब्द) प्रमाण है, 'इच्छा द्वेष, सुख दुःख, प्रयत्न, ज्ञान-ये आत्मा के लिंग हैं' (१. १. १०) यह अनुमान प्रमाण भी है, तथा आत्मा में मनोयोगविशेष करनेवाले को योगसमाधिज प्रत्यक्ष भी होता है अतः हम यह मान सकते हैं कि आत्म-मन के सम्बन्धविशेष से आत्मा का प्रत्यक्ष भी होता है। इसी तरह अग्नि के बारे में आप्तादेश (वृद्धोपदेश) से 'यह अग्नि हैं' ऐसा ज्ञान होता है। पर्वत के समीप जानेवाले को धूमदर्शन से अनुमान द्वारा वह्नि- ज्ञान होता है। समीप गये हुए को प्रत्यक्ष भी होता है। २. एक प्रमाण भी देखा जाता १. 'सामीप्यज्ञानम्'-इति पाठ० । २. 'सामीप्यम्'-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४. सू० प्रमाणप्रकरणम् १७ च प्रत्यक्षत उपलभ्यते । व्यवस्था पुनः—'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति । लौकिकस्य स्वर्गे न लिङ्गदर्शनम्, न प्रत्यक्षम् । स्तनयित्नुशब्दे श्रूयमाणे शब्द- हेतोरनुमानम्; तत्र न प्रत्यक्षम्, नागमः । पाणौ प्रत्यक्षत उपलभ्यमाने नानुमानम्, नागम इति । सा चेयं प्रमितिः प्रत्यक्षपरा । जिज्ञासितमर्थमाप्तोपदेशात् प्रतिपद्यमानो लिङ्गदर्शनेनापि बुभुत्सते, लिङ्गदर्शनानुमितं च प्रत्यक्षतो दिदृक्षते, प्रत्यक्षत१ उपलब्धेऽर्थे जिज्ञासा निवर्त्तते । पूर्वोक्तमुदाहरणम्—'अग्निः' इति । प्रमातुः प्रमातव्येऽर्थे१ प्रमाणानां २सम्भवोऽभिसम्प्लवः, असम्भवो३ व्यवस्थेति ॥ ३ ॥ इति त्रिसूत्रीभाष्यम् ( क ) प्रत्यक्षलक्षणम् अथ विभक्तानां लक्षणमिति । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥ ४ ॥ है, जैसे—'स्वर्ग चाहनेवाला अग्निहोत्र करे' यह शब्द प्रमाण है, यहाँ लौकिकों को अनु- मान और प्रत्यक्ष से ज्ञान नहीं होता । मेघ की गर्जना सुनने पर ध्वनिहेतुक अनुमान ही होता है, न कि प्रत्यक्ष, या शाब्द । हस्तस्थ आमलक के लिए न अनुमान की जरूरत हैं, न शब्द की । प्रमिति में प्रत्यक्ष प्रधान होता है । जिज्ञासित अर्थ को आप्तोपदेश द्वारा समझकर, हेतुदर्शन से समझने की कोशिश करता हैं, उससे समझकर उसे प्रत्यक्ष देखना चाहता है, प्रत्यक्ष देखकर उपलब्ध अर्थ में ( उसकी ) जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है । इसे समझने के लिए पहला ही उदाहरण रखिए—'अग्नि' । प्रमाता के प्रमातव्य अर्थ में अनेक प्रमाणों का साङ्कर्य 'अभिसम्प्लव' कहलाता है, तथा उनके असाङ्कर्य को 'व्यवस्था' कहते हैं ॥ ३ ॥ त्रिसूत्री-भाष्यानुवाद समाप्त प्रमाणों का विभाग दिखा दिया, अब उन विभक्तों में से प्रत्येक का लक्षण कर रहे हैं— इन्द्रिय का अर्थ के साथ सम्बन्ध होने से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है, जो कि अशाब्द हो, व्यभिचारशून्य हो तथा विशेष्यविशेषणभावावगाही हो ॥ ४ ॥ १. क्वचिन्नास्ति । २. 'सङ्करः'—इति पाठ० । ३. 'असङ्करः'—इति पाठ० । न्या० द०CC-३. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० इन्द्रियस्यार्थेन सन्निकर्षादुत्पद्यते यज्ज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् । न तर्हीदानीमिदं भवति—'आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रिय- मर्थेन' इति ? नेदं कारणावधारणम्—एतावत्प्रत्यक्षं कारणमिति, किन्तु विशिष्ट- कारणवचनमिति । यत्प्रत्यक्षज्ञानस्य विशिष्टकारणं तदुच्यते; यत्तु समानमनु- मानादिज्ञानस्य, न तन्निवर्त्तत इति । मनसस्तर्हीन्द्रियेण संयोगो वक्तव्यः ? भिद्यमानस्य प्रत्यक्षज्ञानस्य ना- भिद्यत इति समानत्वान्नोक्त इति । यावदर्थं वै नामधेयशब्दास्तैरर्थसम्प्रत्ययः, अर्थसम्प्रत्ययाच्च व्यवहारः तत्रेदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पन्नमर्थज्ञानम् 'रूपम्' इति वा, 'रसः' इत्येवं वा भवति, रूपरसशब्दाश्च विषयनामधेयम्, तेन व्यपदिश्यते ज्ञानम्—'रूपमिति जानीते, रस इति जानीते'; नामधेय शब्देन व्यपदिश्यमानं सत् शाब्दं प्रसज्यते ? अत आह—अव्यपदेश्यमिति । यदिदमनुपयुक्त शब्दार्थसम्बन्धेऽर्थज्ञानम्, न तद् नामधेय शब्देन व्यपदिश्यते । गृहीतेऽपि च शब्दार्थसम्बन्धेऽस्यार्थस्यायं शब्द इन्द्रिय और अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न ज्ञान को प्रत्यक्ष मानते हैं । तब यह सिद्धान्त सम्भव नहीं है—'आत्मा मन से संयुक्त होता है, मन इन्द्रिय से, इन्द्रिय अर्थ से' ? ऐसा नहीं; क्योंकि हम सभी कारणों का निश्चय नहीं कर रहे कि इतने प्रत्यक्ष में कारण हैं, अपितु विशिष्ट कारण बता रहे हैं । जो प्रत्यक्ष का विशिष्ट कारण है, वह बता दिया गया है; तथा जो सामान्य कारण हैं, जिनका उपयोग अनुमान-आदि ज्ञान में भी होता है, उनका निषेध नहीं किया गया । विशिष्ट कारण ही जब ग्रहण का प्रयोजक है तो मन इन्द्रिय के संयोग को प्रत्यक्ष में कारण कहना चाहिए ? सूत्रकार ने विभक्त किए जा रहे प्रत्यक्ष-लक्षण में एक व्यावर्तक देकर काम चला दिया है, दूसरे कारण ( इन्द्रिय-मनःसंयोग ) के अनुमान में भी घटित होने से वह प्रत्यक्ष का सामान्य व्यावर्तक नही बन सकता । अतः लक्षण में उसे नहीं कहा गया । शङ्का—अर्थ हमेशा हर जगह नामधेय ( संज्ञा ) से सम्पृक्त रहते हैं, ऐसा कोई अर्थ नहीं है जो नामधेय से पृथक् रहता हो, तथा अर्थज्ञान से ही लोकव्यवहार चलता है । उस ( लोकव्यवहार ) में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'रूप' ऐसा या 'रस' ऐसा ज्ञान होता है, रूप, रस, शब्द आदि विषय के नाम हैं । इससे 'रूप—ऐसा जानता हैं', 'रस—ऐसा जानता है' इस प्रकार यह अभेदात्मक ज्ञान व्यवहृत होता है, परन्तु नामधेय शब्द से व्यवहृत ज्ञान शाब्दज्ञान ( विषयाभिन्न = सविकल्पक ) प्रमाण से सम्बद्ध होता है ? इसलिये प्रत्यक्षलक्षण में व्यावर्तक लगाते हैं—'अव्यपदेश्य' । अगृहीत शब्दार्थ- सम्बन्ध की दशा में जो अर्थज्ञान होता है वह उसका नामधेय शब्द से व्यपदिष्ट नहीं CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् १९ नामधेयमिति । यदा तु सोऽर्थो गृह्यते, तदा तत् पूर्वस्मादर्थज्ञानान्न विशिष्यते, तत् अर्थविज्ञानं तादृगेव भवति । तस्य त्वर्थज्ञानस्यान्यः समाख्याशब्दो नास्ति, येन प्रतीयमानं व्यवहाराय कल्पेत, न चाप्रतीयमानेन व्यवहारः । तस्माज्ज्ञेय- स्यार्थस्य संज्ञाशब्देनेतिकरणयुक्तेन निर्दिश्यते-'रूपम्' इति ज्ञानम्, 'रसः' इति ज्ञानमिति । तदेवमर्थज्ञानकाले १ स न समाख्याशब्दो व्याप्रियते, व्यवहारकाले तु व्याप्रियते । तस्मादशाब्दमर्थज्ञानमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमिति । ग्रीष्मे मरीचयो भौमेनोष्मणा संसृष्टाः स्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सन्निकृष्यन्ते, तत्रेन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् 'उदकम्' इति ज्ञानमुत्पद्यते, तच्च प्रत्यक्षं प्रसज्यते ? इत्यत आह-अव्यभिचारीति । यद् 'अतस्मिंस्तत्' इति, तद् व्यभिचारि; यत्तु 'तस्मिंस्तत्' इति, तदव्यभिचारि प्रत्यक्षमिति । दूराच्चक्षुषा ह्ययमर्थं पश्यन्नावधारयति-धूम इति वा, रेणुरिति वा; तदेतदिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमनवधारणज्ञानं प्रत्यक्षं प्रसज्यते ? इत्यत आह- होता है। शब्दार्थसम्बन्ध के गृहीत होने पर भी 'इस अर्थ का यह शब्द वाचक हैं' ऐसा व्यवहार होता है। जब यह अर्थ गृहीत होता है तो यह ज्ञान पूर्व ज्ञान (जिसमें अर्थ गृहीत नहीं हुआ था) से भिन्न (विशेष) नहीं, वह अर्थ-विज्ञान भी वैसा ही होता है। उस अर्थ-ज्ञान का कोई दूसरा शब्द बोधक नहीं है, जिससे वह प्रतीत होता हुआ व्यव- हार में आवे । अप्रतीत से व्यवहार होता नहीं । इसलिये ज्ञेय अर्थ का संज्ञाशब्द के साथ 'इति' (= ऐसा ) लगाकर निर्देश किया जाता है— 'रूप ऐसा ज्ञान', 'रस ऐसा ज्ञान' । इस प्रकार यही समझिए कि वह समाख्या (अर्थबोधक) शब्द अर्थज्ञानकाल में व्यापृत नहीं होता, परन्तु व्यवहारकाल में व्यापृत हो पाता है। अतः सिद्धान्ततः यह निष्कर्ष निकला कि शब्दरहित अर्थज्ञान ही इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न होता है। शङ्का—ग्रीष्म काल में पार्थिव उष्णता से मिलकर सूर्य की किरणें चाकचिक्य पैदा करती हुई दूरदेशस्थ पुरुष के नेत्रों के समीप आ जाती हैं, वहाँ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से जल की भ्रान्ति प्रतीति होती है, वहाँ भी प्रत्यक्ष का व्यवहार होने लगेगा ? अतः लक्षण में व्यावर्तक शब्द लगाया गया है— 'अव्यभिचारि' । जो 'तदभाववान्' में 'तद्' ऐसा ज्ञान 'व्यभिचारि' कहलाता है, तथा जो 'तद्वान्' में 'तत्' ऐसा ज्ञान 'अव्यभिचारि' कहलाता है, वही प्रत्यक्ष है । (मरीचिका में जलप्रतीति प्रत्यक्ष नहीं, अपितु भ्रमप्रतीतिमात्र है ।) शङ्का—पुरुष दूर से अपनी आँखों से देखता हुआ विचार करता है कि 'यह धूम है, या यह धूलि हैं'; क्या यह इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न संशय-ज्ञान भी प्रत्यक्ष कहलायेगा ? १. ०भानकाले-पा० ।

२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० व्यवसायात्मकमिति¹ । न चैतन्मन्तव्यम्—आत्ममनःसन्निकर्षजमेवानवधारण- ज्ञानमिति । चक्षुषा ह्ययमर्थं पश्यन्नावधारयति । यथा चेन्द्रियेणोपलब्धमर्थं मनसोपलभते, एवमिन्द्रियेणानवधारयन्मनसा नावधारयति । यच्चैतदिन्द्रिया- नवधारणपूर्वकं मनसाऽनवधारणं तद्विशेषापेक्षं विमर्शमात्रं संशयः, न पूर्वमिति । सर्वत्र प्रत्यक्षविषये ज्ञातुरिन्द्रियेण व्यवसायः, पश्चान्मनसाऽनुव्यवसायः; उप- हतेन्द्रियाणामनुव्यवसायाभावादिति । आत्मादिषु सुखादिषु च प्रत्यक्षलक्षणं वक्तव्यम् अनिन्द्रियार्थसन्निकर्षजं हि तदिति ? इन्द्रियस्य वै सतो मनस इन्द्रियेभ्यः पृथगुपदेशः, धर्मभेदात् । भौतिकानीन्द्रियाणि नियतविषयाणि, सगुणानां चैषामिन्द्रियभाव इति; मनस्त्वभौतिकं सर्वविषयं च, नास्य सगुणस्येन्द्रियभाव इति । सति चेन्द्रियार्थसन्निकर्षे सन्निधिरसन्निधि चास्य युगपज्ज्ञानानुपत्तिकारणं वक्ष्यामः ( १. १. १६ ) इति । मनसश्चेन्द्रियभावात्तन्न वाच्यं लक्षगान्तरमिति । अतः लक्षण में एक और व्यावर्तक शब्द लगाते हैं—'व्यवसायात्मक' । और यह नहीं मान लेना चाहिये कि संशयज्ञान आत्ममनःसन्निकर्षोत्पन्न ही होता है, आंखों से भी प्रमाता विषय को देखता हुआ वहाँ संशय कर सकता है । प्रमाता जैसे इन्द्रिय से उपलब्ध विषय (अर्थ) को मन से ग्रहण करता है, वैसे इन्द्रिय से अर्थ का अवधारण नहीं होता तो मन से भी अवधारण नहीं होगा । इसलिये यह इन्द्रियकृत-संशयपूर्वक मन का संशय एक विशिष्ट संशय है, जिसे हम विमर्शमात्र कह सकते हैं, आपका सोचा हुआ पहले वाला (साधारण) संशय नहीं । प्रत्यक्ष के बारे में सर्वत्र यही देखा जाता है कि पहले ज्ञाता को इन्द्रिय का व्यवसाय होता है, फिर मन से उसका अनुव्यवसाय (ज्ञानानन्तर निश्चयात्मक ज्ञान)। विकलेन्द्रिय पुरुषों में अनुव्यवसाय उपलब्ध न होने से हमें यही पद्धति माननी पड़ेगी। शङ्का—तब तो आत्मा और सुख आदि के बारे में एक और विशिष्ट प्रत्यक्ष लक्षण करना पड़ेगा; क्योंकि उनका ज्ञान इन्द्रियार्थसन्निकर्षज नहीं, अपितु मनःसन्निकर्षज है ? कहते हैं—मन के इन्द्रिय होते हुए भी उसका इन्द्रियों से पृथक् उपदेश धर्मभेद से किया गया है; क्योंकि अन्य भौतिक इन्द्रियाँ तो नियतविषय हैं, वे अपने-अपने गन्धादि गुण से बाह्य गन्धादि का बोध कराती हैं; पर मन ऐसा नहीं है, वह अभौतिक है, सर्व- विषय है । इसको सगुण मान कर इन्द्रियत्व नहीं कहा गया । इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष होने पर भी युगपत् ज्ञान नहीं होता—इसमें हम मन की सन्निधि या असन्निधि को कारण आगे चल कर (१.१.१६) बतायेंगे । मन को इन्द्रिय मानने से आत्मा तथा सुखादि ज्ञान के लिये लक्ष्णान्तर की आवश्यकता नहीं । अन्य तन्त्रों में मन को भी इन्द्रिय माना गया है, १. तथा च 'कल्पनापोढमभ्रान्तम्' इति बौद्धाचार्यैः सम्मतं लक्षणमेव सूत्रभाष्ययो- रपि सम्मतमिति तदक्षरतात्पर्यम् ।

५. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २१ तन्त्रान्तरसमाचाराच्चैतत् प्रत्येयमिति । 'परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम्' इति हि तन्त्रयुक्तिः ॥ ४ ॥ व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ ० (ख) अनुमानलक्षणम् अथ तत्पूर्वकं२ त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥ ५ ॥ 'तत्पूर्वकम्' इत्यनेन लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धदर्शनं लिङ्गदर्शनं चाभि- सम्बध्यते । लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बद्धयोर्दर्शनेन लिङ्गस्मृतिरभिसम्बध्यते । स्मृत्या लिङ्गदर्शनेन चाप्रत्यक्षोऽर्थोऽनुमीयते । पूर्ववदिति-यत्र कारणेन कार्यमनुमीयते, यथा-मेघोन्नत्या 'भविष्यति वृष्टिः' इति । शेषवत् तत्-यत्र कार्येण कारणमनुमीयते, पूर्वोदकविपरीतमूदकं नद्याः पूर्णत्वं शीघ्रत्वं च दृष्ट्वा स्रोतसोऽनुमीयते-'भूता वृष्टिः' इति । सामान्यतो- उसका इस तन्त्र ( न्यायदर्शन ) में खण्डन नहीं किया गया, अतः सूत्रकार को मन का इन्द्रियत्व अभिप्रेत है—ऐसा मान लेना चाहिये; क्योंकि तन्त्रकारों की एक यह भी युक्ति है कि दूसरे मत का यदि हम खण्डन नहीं करते तो वह हमें मान्य है ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष का व्याख्यान कर दिया गया ॥ प्रत्यक्ष का निरूपण करने के बाद अब अनुमान का निरूपण करते हैं— प्रत्यक्षपूर्वक अनुमितिकरण को 'अनुमान' कहते हैं। वह तीन प्रकार का होता है— १. पूर्ववत्, २. शेषवत् तथा ३. सामान्यतोदृष्ट ॥ ५ ॥ यहाँ 'तत्पूर्वक' इस पद से लिङ्ग (हेतु) लिङ्गी ( हेतुमान् ) का सम्बन्ध (व्याप्ति)- दर्शन तथा लिङ्गदर्शन—इन दोनों का भी परामर्श कर लेना चाहिये । सम्बद्ध हेतु लिङ्ग- स्मृति से सम्बद्ध होता है । स्मृति और लिङ्ग-परामर्श व्यापार से अप्रत्यक्ष अर्थ का अनु- मान होता है । पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ कारण से कार्य का अनुमान हो, जैसे—बादलों के घिर जाने से 'वर्षा होगी' यह अनुमान होता है । शेषवत् उसे कहते हैं जहाँ कार्य से कारण का अनुमान हो, जैसे नदी में पहले के जल से बढ़ा हुआ जल देखकर या नदी को बढ़ी हुई, वेग से बहती हुई देख कर 'वर्षा हुई है' ऐसा अनुमान होता है । सामान्यतोदृष्ट वह कहलाता है जिसे पहले कहीं देखा हो बाद में कहीं देखे तो उसमें गति का अनुमान १. तन्त्रयुक्तिरियं बौद्धनैयायिकचक्रवर्त्तिदिङ्नागकृते 'प्रमाणसमुच्चये' दृश्यते । २. एतत्पदस्य विस्तृतं व्याख्यानं वार्त्तिकेऽनुसन्धेयम् ।

२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दृष्टम्—व्रज्यापूर्वकमन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र दर्शनमिति, तथा चाऽऽदित्यस्य; तस्मादस्त्यप्रत्यक्षाप्यादित्यस्य व्रज्येति । अथ वा—पूर्ववदिति, यत्र यथापूर्वं प्रत्यक्षभूतयोरन्यतरदर्शनेनान्यतर- स्याप्रत्यक्षस्यानुमानम्, यथा—धूमेनाऽग्निरिति । शेषवन्नाम—परिशेषः, स च प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः, यथा—'सदनित्यम्' एवमा- दिना द्रव्यगुणकर्मणामविशेषेण सामान्यविशेषसमवायेभ्यो विभक्तस्य शब्दस्य तस्मिन् द्रव्यगुणकर्मगुणसंशये—'न द्रव्यम्, एकद्रव्यत्वात्; न, कर्म, शब्दान्तर- हेतुत्वात्; यस्तु शिष्यते सोऽयम्' इति शब्दस्य गुणत्वप्रतिपत्तिः । सामान्यतोदृष्टं नाम—यत्राप्रत्यक्षे लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धे केनचिदर्थेन लिङ्गस्य सामान्याद- प्रत्यक्षो लिङ्गी गम्यते, यथा—इच्छादिभिरात्मा, 'इच्छादयो गुणाः, गुणाश्च द्रव्यसंस्थानाः, तद्यदेषां स्थानं स आत्मा' इति । विभागवचनादेव त्रिविधमिति सिद्धे त्रिविधवचनं महतो महाविषयस्य न्यायस्य लघीयसा सूत्रेणोपदेशात् परं वाक्यलाघवं मन्यमानस्यान्त्यस्मिन् होता है। जैसे—सूर्य को प्रातः पूर्व में देखा गया और सायंकाल पश्चिम में देखा गया तो अनुमान हुआ 'सूर्य में गति है।' 'अथ वा' से उक्त तीनों पदों का अन्य प्रकार से व्याख्यान का उपक्रम करते हैं— पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ पहले दोनों का प्रत्यक्ष हो चुका हो परन्तु अब लिङ्ग-लिङ्गी में किसी एक को देख कर दूसरे का अनुमान किया जाय, जैसे—धूम से वह्नि का । शेषवत् उसे कहते हैं जो परिशेष ( बाकी बचा ) रह जाये । वह है सम्भाव्यमानों में से कुछ का प्रतिषेध कर देने पर बाकी बचे हुओं में कहीं भी सम्भाव्यमान न होने से उक्त प्रतिषेध के बाद अवशिष्ट का ज्ञान । जैसे—'शब्द सत् है, अनित्य भी है' ऐसा निश्चय हो जाने के बाद सन्देह होता है कि हम शब्द को क्या मानें—द्रव्य, गुण या कर्म ? तब 'शब्द द्रव्य नहीं हैं एक द्रव्य में समवेत होने से', 'शब्द कर्म भी नहीं है, शब्दान्तर का हेतु होने से' इन हेतुओं द्वारा शब्द में द्रव्यत्व तथा कर्मत्व का प्रतिषेध हो गया, बाकी बच गया गुण, अतः वहाँ अनुमान होता है—'शब्द गुण हैं' । सामान्यतोदृष्ट वह होता हैं जहाँ लिङ्ग और लिङ्गी दोनों के ही सम्बन्ध अप्रत्यक्ष हों, परन्तु किसी अर्थविशेष से लिङ्ग के साधारण्य द्वारा लिङ्गी का ज्ञान हो जाये । जैसे—इच्छादि से आत्मा का 'इच्छादि गुण हैं, गुण द्रव्य में रहते हैं, अतः ये इच्छादि जिसमें रहें वही आत्मा हैं'— यह अनुमान । विभाग कर देने से अनुमान का त्रैविध्य ज्ञात हो ही जाता, फिर सूत्र में 'त्रिविधम्' यह पद क्यों दिया ? अतिगम्भीर इस महान् न्यायशास्त्र का छोटे-छोटे सूत्रों से उपदेश करके ही आचार्य ने लाघव कर दिखाया, फिर इन छोटे-छोटे वाक्यों में भी और लाघव CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २३ वाक्यलाघवेऽनादरः, 'तथा चाऽयम्¹' इत्यम्भूतेन वाक्यविकल्पेन प्रवृत्तः सिद्धान्ते, छले, शब्दादिषु च बहुलं समाचारः शास्त्र इति । सद्विषयं च प्रत्यक्षम्, सदसद्विषयं चानुमानम् । कस्मात् ? त्रैकाल्यग्रहणात्- त्रिकालयुक्ता अर्था अनुमानेन गृह्यन्ते-'भविष्यति' इत्यनुमीयते, 'भवति' इति च, 'अभूत्' इति च । असच्च खल्वतीत मनागतं चेति ॥ ५ ॥ (ग) उपमानलक्षणम् अथोपमानम् । प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम् ॥ ६ ॥ प्रज्ञातेन सामान्यात् प्रज्ञापनीयस्य प्रज्ञापनमुपमानमिति-'यथा गौरेवं गवयः' इति । किं पुनरत्रोपमानेन क्रियते, यदा खल्वयं गवा समानधर्मं प्रतिपद्यते तदा प्रत्यक्षतस्तमर्थं प्रतिपद्यत इति ? समाख्यासम्बन्धप्रतिपत्तिरुप- मानार्थ इत्याह । 'यथा गौरेवं गवयः' इत्युपमाने प्रयुक्ते गवा समानधर्ममर्थ- करना उन्हें अभीष्ट नहीं था, अतः ऐसे लाघव में उनका आदर नहीं है—यह दिखाने के लिये। आचार्य का ऐसा लाघव के प्रति अनादर इस शास्त्र में 'वैसा ही यह हैं' इत्यादि वाक्य-विकल्पों द्वारा सिद्धान्त, छल, शब्द आदि के वर्णन-प्रसंग में भी बहुत जगह देखा जाता है। प्रत्यक्ष केवल वर्तमानविषयक होता है, परन्तु अनुमान वर्तमानविषयक भी होता है, अतीत व अनागत विषयक भी; क्योंकि अनुमान द्वारा त्रैकालिक ज्ञान होता है। तीनों कालों से युक्त अर्थ अनुमान द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं, जैसे 'होगा' यह अनुमान भी हो सकता है, 'है' यह भी हो सकता है, 'था' यह भी। 'असत्' का अनुमान अतीत या अनागत विषयक ही होता है ॥ ५ ॥ इस प्रकार अनुमान का व्याख्यान कर दिया गया ॥ अब उपमान का निरूपण करते हैं— (जिससे) प्रसिद्ध (पूर्वप्रमित गवादि) के साधर्म्य (सादृश्य) ज्ञान से साध्य (गवयादि- पदवाच्य) की सिद्धि हो वह 'उपमान' प्रमाण कहलाता है ॥ ६ ॥ प्रज्ञात (प्रसिद्ध गो-आदि) के सादृश्यज्ञान से प्रज्ञापनीय (गवय-आदि) का ज्ञान जिस प्रमाण से कराया जाये—उसे 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी गौ ऐसा ही गवय होता हैं'। प्रमाता जब गो के सदृश गवय को देखता है तो उसे प्रत्यक्ष प्रमाण से ही वह ज्ञान हो जाता है, फिर उपमान प्रमाण यहाँ क्या नई चीज ला देगा ? वाक्यार्थश्रोता समान- धर्म (सादृश्य) को प्रत्यक्ष कर गवय को देखता ही है। किसी एक शब्द की उसके अर्थ में समाख्या का परिचय होना, यही उपमान का प्रयोजन है—ऐसा सूत्रकार का अभिप्राय १. 'चायमस्य'-इति पा० ।

२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० मिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुपलभमानः 'अस्य गवयशब्दः संज्ञा' इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यते इति । 'यथा मुद्गस्तथा मुद्गपर्णी', 'यथा माषस्तथा माषपर्णी' इत्युपमाने प्रयुक्ते उपमानात् संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यमानस्तामोषधीं भैषज्याया- ऽऽहरति । एवमन्योऽप्युपमानस्य लोके विषयो बुभुत्सितव्य इति ॥ ६ ॥ (घ) शब्दलक्षणम् अथ शब्दः । आप्तोपदेशः शब्दः१ ॥ ७ ॥ आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याऽऽप्तिः, तया प्रवर्त्तत इत्याप्तः । ऋष्यार्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम् । तथा च सर्वेषां व्यवहाराः प्रवर्त्तन्त इति । एवमेभिः प्रमाणैर्देवमनुष्यतिरश्चां व्यवहाराः प्रकल्पन्ते, नाऽतोऽन्यथेति ॥७॥ है । अर्थात् 'जैसी गौ वैसा गवय होता है' इस उपमान के प्रयुक्त होने पर समानधर्म (सदृश) अर्थ को इन्द्रियार्थसन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) से प्राप्त करता हुआ 'इसकी संज्ञा गवय- शब्द है' ऐसा संज्ञा-संज्ञिसम्बन्ध उपमान प्रमाण से जान लेता है । 'जैसा मूंग वैसी मुद्- गपर्णी' 'जैसा उड़द वैसी माषपर्णी' यह उपमान प्रयुक्त होने पर संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध को जानता हुआ उस औषध को दवा के लिये ले आता है । इसी तरह लोक में व्यवहृत अन्य उपमानों को भी समझना चाहिये ॥ ६ ॥ उपमान प्रमाण का व्याख्यान समाप्त ॥ अब शब्द का निरूपण करते हैं— आप्त के उपदेश को 'शब्द' प्रमाण कहते हैं ॥ ७ ॥ साक्षात्कृतधर्मा (जिसने सुदृढ़ प्रमाणों द्वारा अर्थ का निश्चय कर लिया हो), यथा- दृष्ट (सही) अर्थ को बतलाने का इच्छा से प्रवृत्त उपदेष्टा पुरुष 'आप्त' कहलाता है । साक्षात्कृत (अर्थ के प्रत्यक्षज्ञान) के पश्चात् प्रवृत्त पुरुष आप्त कहलाता है । 'आप्त' का यह लक्षण ऋषि (त्रिकालज्ञ), आर्य (निष्पाप साधारण जन) तथा म्लेच्छ (डाकू-लुटेरे)— तीनों में समान रूप से घट सकता है । (लुटेरे भी घोर जंगल में किसी धनिक को लूट कर उस पर दया कर उसे नगर का सही मार्ग बतला देते हैं ।) इसलिये इन सभी के ऐसे शब्दव्यवहार प्रवृत्ति में सहायक होते हैं । इस प्रकार इन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) प्रमाणों से ही सभी देवता, मनुष्य व पशु-पक्षियों के समग्र (लौकिक-अलौकिक) व्यवहार चलते हैं, उन व्यवहारों का इनसे भिन्न अन्य कोई साधन नहीं है ॥ ७ ॥ १. बौद्धाचार्यास्तु शब्दोपमानयोर्नातिरिक्तं प्रामाण्यमङ्गीकुर्वन्ति ।