न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् १३ एतस्मान्मिथ्याज्ञानादनुकूलेषु रागः, प्रतिकूलेषु द्वेषः । रागद्वेषाधिकाराच्चाऽसूयेर्ष्यामायालोभादयो दोषा भवन्ति । दोषैः प्रयुक्तः शरीरेण प्रवर्त्तमानो हिंसास्तेयप्रतिषिद्धमैथुनान्य्याचरति, वाचाऽनृतपरुषसूचनाऽ- सम्बद्धानि, मनसा परद्रोहं परद्रव्याभीप्सां नास्तिक्यं चेति । सेयं पापात्मिका प्रवृत्तिरधर्माय । अथ शुभा—शरीरेण दानं परित्राणं परिचरणं च, वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्यायं चेति, मनसा दयामस्पृहां श्रद्धां चेति । सेयं धर्माय । अत्र प्रवृत्तिसाधनौ धर्माधर्मौ प्रवृत्तिशब्देनोक्तौ । यथा—अन्नसाधनाः प्राणाः ‘अन्नं वै प्राणिनः प्राणाः’ इति । सेयं प्रवृत्तिः कुत्सितस्याभिपूजितस्य च जन्मनः कारणम् । जन्म पुनः— इस मिथ्याज्ञान से अनुकूल विषय में राग तथा प्रतिकूल विषय में द्वेष होता है । राग द्वेष का विषय बन जाने से असूया ( गुणों में दोषाविष्करण ), ईर्ष्या ( शत्रु की प्रिय वस्तु की हानि की इच्छा ), माया ( दम्भ ), लोभ ( अन्याय से परद्रव्य पाने की इच्छा ) आदि दोष उत्पन्न होते हैं । दोषों के वशीभूत होकर शरीर से चेष्टा करता हुआ हिंसा, स्तेय, प्रतिषिद्ध मैथुन ( परदारागमन ) आदि का आचरण करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ अनृत ( मिथ्या वचन ) परुष ( कठोर = दुःखद वचन ) सूचना ( चुगली करना ) असम्बद्ध ( ऊटपटांग प्रलाप ) आदि का; तथा मनसे चेष्टा करता हुआ परद्रोह ( जिघांसा या अपकार ), परद्रव्य की इच्छा करना, नास्तिक्य ( परलोक नहीं हैं—ऐसी बुद्धि ) का आचरण करता है । यह पापात्मिका प्रवृत्ति अधर्म ( अशुभ ) के लिये होती है । अब शुभ प्रवृत्ति का वर्णन करते हैं—शरीर से चेष्टा करता हुआ वह मन्त्रादिपूर्वक या सामान्यतः दान करता है, परित्राण ( निरीह प्राणियों की रक्षा ), परिचरण ( तीर्था- टन या गुरुसेवा ) करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ सत्य ( यथार्थ ), हित ( उप- कारक ), प्रिय ( प्रीतिकर ) वचन बोलता है । मन से चेष्टा करता हुआ दया ( निःस्वार्थ दुःखप्रहाणेच्छा ), स्वाध्याय ( वेद या पुराण आदि का अध्ययन ) करता है । अस्पृहा ( लोभत्याग ), श्रद्धा ( शास्त्र में दृढ विश्वास ) रखता है । यह शुभ प्रवृत्ति धर्म ( शुभा- दृष्ट ) के लिये होती है । इस सूत्र में प्रवृत्ति के साधन धर्म और अधर्म को ‘प्रवृत्ति’ पद से कह दिया गया है । जैसे—‘अन्नं वै प्राणाः’ इस श्रुति में प्राणों के साधन अन्न को ‘प्राण’ कह दिया गया । यह प्रवृत्ति कुत्सित या प्रशस्त जन्म का कारण होती है। शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि—तीनों के निकाय ( सजातीय कुलों ) से विशिष्ट प्रादुर्भाव को ‘जन्म’ कहते हैं । जन्म होने पर CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri