न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० शरीरेन्द्रियबुद्धीनां निकायविशिष्टः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति दुःखम् । तत्पुनः प्रतिकूलवेदनीयम्-बाधना, पीडा, ताप इति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो दुःखान्ता धर्मा अविच्छेदेनैव प्रवर्तमानाः-संसार इति । यदा तु तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति, तदा मिथ्याज्ञानापाये दोषा अपयन्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति, प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमपैति, दुःखापाये च आत्यन्तिकोऽपवर्गो निःश्रेयसमिति । तत्त्वज्ञानं तु खलु मिथ्याज्ञानविपर्ययेण व्याख्यातम्। आत्मनि तावत्- अस्तीति, अनात्मनि-अनात्मेति । एवं दुःखे, अनित्ये, अत्राणे, सभये, जुगुप्सिते, हातव्ये च यथाविषयं वेदितव्यम् । प्रवृत्तौ-'अस्ति कर्म अस्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु-'दोषनिमित्तोऽयं संसारः' इति । प्रेत्यभावे खलु-'अस्ति जन्तुर्जीवः, सत्त्वः आत्मा वा यः प्रेत्य भवेदिति, निमित्तवज्जन्म, निमित्तवान् जन्मोपरम इत्यानादिः प्रेत्यभावोऽपवर्गान्त इति, नैमित्तिकः सन् प्रेत्यभावः प्रवृत्तिनिमित्त इति, सात्मकः सन् देहेन्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां प्रवर्त्तते' इति । अपवर्गे-'शान्तः खल्वयं सर्वविप्रयोगः; सर्वोपरमोऽपवर्गः, बहु च कृच्छ्रं घोरं दुःख होता है । वह दुःख प्रतिकूलवेदनीय ( अहित रूप से अनुभवनीय ) होता है । उसे बाधना ( व्यथा ) पीड़ा, ताप भी कहते हैं । ये मिथ्याज्ञान से लेकर दुःखपर्यन्त धर्म अवि- च्छिन्न रूपसे जब प्रवृत्त होते हैं तो इसे ही 'संसार' कहते हैं । और जब तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान नष्ट हो जाता है, तब मिथ्याज्ञान के न रहने से दोष नष्ट हो जायेंगे दोषनाश से प्रवृत्ति नहीं होगी, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होगा, जन्म न होने से दुःख नहीं होगा तथा दुःख के न होनेपर आत्यन्तिक ( ऐकान्तिक ) अपवर्ग 'निःश्रेयस' ( मोक्ष ) हो जाता है । तत्त्वज्ञान का व्याख्यान मिथ्याज्ञान के व्याख्यान से उलटा किया गया है । जैसे- आत्मा के विषय में 'है' ऐसा, अनात्म पदार्थों में 'अनात्मा' ऐसा । इसी तरह दुःख, अनित्य, .अत्राण, सभय, जुगुप्सित तथा हातव्य के बारे में भी विषय के अनुसार समझना चाहिये । प्रवृत्ति के विषय में-'कर्म हैं', 'कर्मों का फल हैं' ऐसा; दोषों के बारे में 'यह संसार दोषों से उत्पन्न हैं' ऐसा; पुनर्जन्म के बारे में-'है ऐसा जीव या जन्तु सत्त्व या आत्मा, जो मरकर पुनः जन्म ग्रहण करे' ऐसा, 'जन्म की उपरति भी निमित्त कारण- वाली है, अतः यह मरना-जीना प्रवाहरूप से अनादि होते हुए मोक्षपर्यन्त है' ऐसा, 'यह मरना-जीना नैमित्तिक होता हुआ प्रवृत्तिनिमित्तक है' ऐसा; 'सात्मक होता हुआ देह, इन्द्रिय, बुद्धि वेदना की सन्तति ( निरन्तर प्रवाह ) से उच्छेद और प्रतिसन्धान द्वारा प्रवृत्त होता है' ऐसा; अपवर्ग के विषय में-'यह सभी से नाता टूटना बहुत ही शान्त है, सब तरह से छुटकारा पा जाना अपवर्ग है, इससे बहुत ही कठिन और भयानक पाप CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri