भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ११ छलजातिनिग्रहस्थानानां पृथगुपदेश उपलक्षणार्थमिति । उपलक्षितानां स्ववाक्ये परिवर्जनम्, छलजातिनिग्रहस्थानानां परवाक्ये पर्यनुयोगः । जातेश्च परेण प्रयुज्यमानायाः सुलभः समाधिः, स्वयं च सुकरः प्रयोग इति । सेयमान्वीक्षिकी प्रमाणादिभिः पदार्थैर्विभज्यमाना— प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्त्तिता ॥ तदिदं तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसाधिगमार्थं १ यथाविद्यं वेदितव्यम् । इह त्वध्यात्म- विद्यायामात्मादितत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानम्, निःश्रेयसाधिगमोऽपवर्गप्राप्तिरिति ॥१॥ तत् खलु निःश्रेयसं किं तत्त्वज्ञानानन्तरमेव भवति ? नेत्युच्यते; किं तर्हि ? तत्त्वज्ञानात्— क्योंकि एक वाद में सभी निग्रहस्थानों का उद्भावन सम्भव नहीं है, परन्तु हेत्वाभास ऐसे निग्रहस्थान हैं जिनका वाद से सर्वथा उद्भावन हो सकता है । इसलिए इनका पृथक् उपदेश किया है । छल, जाति, निग्रहस्थान—इनका उपदेश उपलक्षण के लिये है । उपलक्षित छल, जाति, निग्रहस्थानों का अपने वाक्य में त्याग और दूसरों के वाक्य में प्रयोग किया जा सकता है । दूसरे द्वारा प्रयुक्त जाति का समाधान विद्वानों के लिये सुलभ है, अपने वाक्य में उसका प्रयोग करना भी उनके लिये सरल है । इस प्रकार ये संशयादि पदार्थ प्रमाण या प्रमेय में अन्तर्भूत होते हुए भी न्यायविद्या का प्रस्थान-भेद बताने के लिये पृथक् पढ़े गये हैं । यह आन्वीक्षिकी विद्या प्रमाणादि पदार्थों से विभक्त होती हुई, सभी अन्य विद्याओं के लिये दीपोपम है, सभी लौकिक-वैदिक कार्यों की उपकारिका (भृत्यादिवत् सहायिका) है, सभी धर्मों की आश्रय है । इस विद्या का यह संक्षिप्त रूप अर्थशास्त्र के विद्योद्देश में बताया गया है । यह 'तत्त्वज्ञान' और 'निःश्रेयसप्राप्ति' उस-उस विद्या के अनुसार ही समझना चाहिये । इस आन्वीक्षिकी विद्या (न्यायशास्त्र) में, जो कि अध्यात्म विद्या भी कहलाती है, आत्मा-आदि प्रमेयों का तत्त्वज्ञान ही 'तत्त्वज्ञान' कहलाता है और निःश्रेयसप्राप्ति 'मोक्षप्राप्ति' कहलाती है ॥ १ ॥ तो क्या यह निःश्रेयस (मोक्ष) तत्त्वज्ञान के बाद ही हो जाता है ? नहीं ! अपितु तत्त्वज्ञानसे— १. 'निःश्रेयसाधिगमश्च'—इति पाठ० ।