न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० तर्क इति । सोऽयमित्थम्भूतस्तर्कः प्रमाणसहितो वादे साधनाय, उपालम्भाय चार्थस्य भवतीत्येवमर्थं पृथगुच्यते प्रमेयान्तर्भूतोऽपीति । निर्णयस्तत्त्वज्ञानं प्रमाणानां फलम् । तदवसानो वादः । तस्य पालनार्थं जल्प- वितण्डे । तावेतौ तर्कनिर्णयौ लोकयात्रां वहत इति । सोऽयं निर्णयः प्रमेयान्त- र्भूत एवमर्थं पृथगुद्दिष्ट इति । वादः खलु नानाप्रवक्तृकः प्रत्यधिकरणसाधनोऽन्यतराधिकरणनिर्णयावसानो वाक्यसमूहः पृथगुद्दिष्ट उपलक्षणार्थम्; उपलक्षितेन व्यवहारस्तत्त्वज्ञानाय भवतीति । तद्विशेषौ जल्पवितण्डे तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थमित्युक्तम् ( ४. २. ५० ) । निग्रहस्थानेभ्यः पृथगुद्दिष्टा हेत्वाभासा वादे चोदनीया भविष्यन्तीति । जल्पवितण्डयोस्तु निग्रहस्थानानीति । सिद्धि में तर्क प्रमाणों का सहकारी बनकर तत्त्वज्ञान में सहायक होता है। इसीलिये इस तर्क को वाद में अर्थ की स्थापना तथा प्रतिषेध के लिए आचार्य ने पृथक् निर्दिष्ट किया है। वास्तव में इसका प्रमेय में ही अन्तर्भाव हो जायेगा । प्रमाणों के फल (प्रयोजन) तत्त्वज्ञान को निर्णय कहते हैं। किसी भी विषय का निष्कर्ष (निर्णय) निकले—इसी को लेकर 'वाद' किया जाता है। उस (निर्णय) की रक्षा (बाधकहेतुनिवारण तथा साधकहेतुधारण) के लिये ही जल्प तथा वितण्डा का प्रयोग किया जाता है। ये दोनों (तर्क और निर्णय) लोकव्यवहार को सफल बनाते हैं। इसलिये आचार्य ने निर्णय का पृथक् उल्लेख किया है। वस्तुतः यह प्रमेय के ही अन्त- र्भूत है। जो अनेक वक्ताओं (कम से कम दो) के रहने पर हो, प्रत्येक अधिकृत अर्थ उसका विषय हो, जिसके अन्त में किसी एक विषय के निर्णय पर पहुँचा जाये, ऐसे तर्क तथा पञ्चावयवसहित वाक्यसमूह को वाद कहते हैं। आचार्य ने इसे उपलक्षण (ज्ञान) के लिये अलग उद्दिष्ट किया है; क्योंकि ज्ञात वस्तु से ही व्यवहार तत्त्वज्ञान के लिये होता है। अपने आप में कुछ विशेषता रखनेवाले १ जल्प और वितण्डा तत्त्वनिश्चय-पालन के लिये हैं—ऐसा आगे कहेंगे (४. २. ५०) । निग्रहस्थानों से पृथक् करके उद्दिष्ट हेत्वाभासों का वाद में उपयोग होता है—ऐसा आगे (पंचम अध्याय में) कहेंगे। जल्प और वितण्डा निग्रहस्थान हैं। तात्पर्य यह है कि हेत्वाभासोद्भावन और वाद का तत्त्वनिर्णय में ही प्रयोजन है, वादविजय में नहीं; १. जल्प में छल, जाति, निग्रहस्थान के प्रयोग से अङ्गाधिक्य है, वितण्डा में स्वपक्षस्था- पन ही नहीं है—इस तरह ये दोनों क्रमशः अंगाधिक्य और अंगहानि वाले हैं। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri