न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० मिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुपलभमानः 'अस्य गवयशब्दः संज्ञा' इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यते इति । 'यथा मुद्गस्तथा मुद्गपर्णी', 'यथा माषस्तथा माषपर्णी' इत्युपमाने प्रयुक्ते उपमानात् संज्ञासंज्ञिसम्बन्धं प्रतिपद्यमानस्तामोषधीं भैषज्याया- ऽऽहरति । एवमन्योऽप्युपमानस्य लोके विषयो बुभुत्सितव्य इति ॥ ६ ॥ (घ) शब्दलक्षणम् अथ शब्दः । आप्तोपदेशः शब्दः१ ॥ ७ ॥ आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा । साक्षात्करणमर्थस्याऽऽप्तिः, तया प्रवर्त्तत इत्याप्तः । ऋष्यार्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम् । तथा च सर्वेषां व्यवहाराः प्रवर्त्तन्त इति । एवमेभिः प्रमाणैर्देवमनुष्यतिरश्चां व्यवहाराः प्रकल्पन्ते, नाऽतोऽन्यथेति ॥७॥ है । अर्थात् 'जैसी गौ वैसा गवय होता है' इस उपमान के प्रयुक्त होने पर समानधर्म (सदृश) अर्थ को इन्द्रियार्थसन्निकर्ष (प्रत्यक्ष) से प्राप्त करता हुआ 'इसकी संज्ञा गवय- शब्द है' ऐसा संज्ञा-संज्ञिसम्बन्ध उपमान प्रमाण से जान लेता है । 'जैसा मूंग वैसी मुद्- गपर्णी' 'जैसा उड़द वैसी माषपर्णी' यह उपमान प्रयुक्त होने पर संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध को जानता हुआ उस औषध को दवा के लिये ले आता है । इसी तरह लोक में व्यवहृत अन्य उपमानों को भी समझना चाहिये ॥ ६ ॥ उपमान प्रमाण का व्याख्यान समाप्त ॥ अब शब्द का निरूपण करते हैं— आप्त के उपदेश को 'शब्द' प्रमाण कहते हैं ॥ ७ ॥ साक्षात्कृतधर्मा (जिसने सुदृढ़ प्रमाणों द्वारा अर्थ का निश्चय कर लिया हो), यथा- दृष्ट (सही) अर्थ को बतलाने का इच्छा से प्रवृत्त उपदेष्टा पुरुष 'आप्त' कहलाता है । साक्षात्कृत (अर्थ के प्रत्यक्षज्ञान) के पश्चात् प्रवृत्त पुरुष आप्त कहलाता है । 'आप्त' का यह लक्षण ऋषि (त्रिकालज्ञ), आर्य (निष्पाप साधारण जन) तथा म्लेच्छ (डाकू-लुटेरे)— तीनों में समान रूप से घट सकता है । (लुटेरे भी घोर जंगल में किसी धनिक को लूट कर उस पर दया कर उसे नगर का सही मार्ग बतला देते हैं ।) इसलिये इन सभी के ऐसे शब्दव्यवहार प्रवृत्ति में सहायक होते हैं । इस प्रकार इन (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) प्रमाणों से ही सभी देवता, मनुष्य व पशु-पक्षियों के समग्र (लौकिक-अलौकिक) व्यवहार चलते हैं, उन व्यवहारों का इनसे भिन्न अन्य कोई साधन नहीं है ॥ ७ ॥ १. बौद्धाचार्यास्तु शब्दोपमानयोर्नातिरिक्तं प्रामाण्यमङ्गीकुर्वन्ति ।