न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१. सू० ] प्रमेयप्रकरणम् २५ स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् ॥ ८ ॥ यस्येह दृश्यतेऽर्थः स दृष्टार्थः । यस्याऽमुत्र प्रतीयते सोऽदृष्टार्थः । एवमृषि- लौकिकवाक्यानां विभाग इति । किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? स न मन्येत—दृष्टार्थ एवाऽऽप्तोपदेशः प्रमाणम्, अर्थस्यावधारणादिति; अदृष्टार्थोऽपि प्रमाणम्, अर्थस्यानुमानादिति ॥ ८ ॥ इति प्रमाणभाष्यम् ॥ ३. प्रमेयप्रकरणम् [ ९-२२ ] ज्ञातुम् योग्यं किं पुनरनेन प्रमाणेनाऽर्थजातं प्रमातव्यमिति ? तदुच्यते— आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमनःप्रवृत्तिदोषप्रेत्यभावफलदुःखापवर्गास्तु प्रमेयम् ॥ ९ ॥ तत्राऽऽत्मा सर्वस्य द्रष्टा सर्वस्य भोक्ता सर्वज्ञः सर्वानुभावी । तस्य भोगायतनं शरीरम् । भोगसाधनानीन्द्रियाणि । भोक्तव्या इन्द्रियार्थाः । भोगो बुद्धिः । वह (शब्दप्रमाण) दृष्टार्थ तथा अदृष्टार्थ रूप से दो प्रकार का होता है ॥ ७ ॥ आप्त प्रयोक्ता द्वारा जिस शब्द का इसी लोक में अर्थ देख लिया गया हो वह 'दृष्टार्थ' कहलाता है । जिस अर्थ की परलोक में प्रतीति हो वह 'अदृष्टार्थ' है । इन दोनों से लौकिक वाक्यों और ऋषिवाक्यों (वेदमन्त्र) का विभाजन किया गया है । दृष्टार्थ, अदृष्टार्थ—इस विभाग की क्या आवश्यकता है, सामान्यतः एक शब्दप्रमाण ही क्यों न मान लिया जाये ? साधारण पुरुष इतना ही न समझ लें कि जिसका अर्थ इस लोक में प्रत्यक्ष किया जा सके—ऐसा आप्तोपदेश तो प्रमाण है, पर जिस (स्वर्गकामो यजेत-इत्यादि) का अर्थ इस लोक में प्रत्यक्ष न किया जा सके—वह आप्तोपदेश प्रमाण नहीं; वस्तुतः 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि आप्तोपदेश भी प्रमाण ही है क्योंकि उसके सहारे अदृष्ट अर्थ अनुमित होता है ॥ ८ ॥ प्रमाणभाष्यानुवाद समाप्त ॥ इस प्रमाणसमूह से किस अर्थसमूह (प्रमेयसमूह) का ज्ञान करना चाहिये ? इसके उत्तर में कहते हैं— आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ, बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, फल, दुःख, अपवर्ग—ये १२ प्रमेय (प्रमाणों से जानने योग्य) हैं ॥ ९ ॥ इनमें आत्मा सभी सुख-दुःख-साधनों का द्रष्टा है, सभी सुख-दुःखों का भोक्ता है, सभी सुख-दुःख-साधनों और सुख-दुःखों को जानता है, तथा अनुभव करता है । उस आत्मा का भोगाधिष्ठान शरीर है । इन्द्रियाँ भोग के साधन हैं । इन्द्रियार्थ भोगने योग्य होते हैं । भोग बुद्धि (साक्षात्कार करनेवाली) है । सभी अर्थों को एक साथ उपलब्ध CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri