भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ७ अथ प्रयोजनम् । येन प्रयुक्तः प्रवर्तते, तत् प्रयोजनम् । यमर्थमभीप्सन् जिहासन् वा कर्मारभते, तेनानेन सर्वे प्राणिनः सर्वाणि कर्माणि सर्वाश्च विद्या व्याप्ताः, तदाश्रयश्च न्यायः प्रवर्तते । कः पुनरयं न्यायः ? प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः । प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानं साऽन्वीक्षा । प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा, तया प्रवर्तत इत्यान्वी- क्षिकी = न्यायविद्या, न्यायशास्त्रम् । यत् पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धं न्याया- भासः स इति । तत्र वादजल्पौ सप्रयोजनौ । वितण्डा तु परीक्ष्यते—वितण्डया प्रवर्तमानो वैतण्डिकः । स प्रयोजनमनु- युक्तो यदि प्रतिपद्यते ? सोऽस्य पक्षः, सोऽस्य सिद्धान्तः इति वैतण्डिकत्वं जहाति । अथ न प्रतिपद्यते ? नायं लौकिको न परीक्षक इत्यापद्यते । अथापि परपक्षप्रति- षेधज्ञापनं प्रयोजनं ब्रवीति ? एतदपि तादृगेव; 'योज्ञापयति, यो जानाति, येन ज्ञाप्यते, यच्च ज्ञाप्यते'-एतच्च प्रतिपद्यते यदि ? तदा वैतण्डिकत्वं जहाति । अथ न प्रतिपद्यते ? 'परपक्षप्रतिषेधज्ञापनं प्रयोजनम्' इत्येतदस्य वाक्यमनर्थकं 'प्रयोजन—जिससे प्रेरित होकर पुरुष अर्थ में प्रवृत्त होता है, उसे 'प्रयोजन' कहते हैं । जिस अर्थ को चाहता हुआ या छोड़ने की इच्छा करता हुआ क्रिया प्रारम्भ करता है, उसी ( प्रयोजन ) से सब प्राणी, सब कर्म तथा सभी विद्यायें सम्बद्ध हैं । और उसी के अधीन न्याय भी प्रवृत्त होता है । यह न्याय क्या है ? अनुमानादि प्रमाणों से अर्थ का परीक्षण ( परिशोधन ) 'न्याय' ( निश्चय ) कहलाता है । प्रत्यक्ष तथा आगम से अविरुद्ध अनुमान को 'अन्वीक्षा' कहते हैं । प्रत्यक्ष तथा आगम के बाद का ईक्षण ( अनुमान ) 'अन्वीक्षा' कहलाता है । उसका आश्रय लेकर जो प्रवृत्त हो उसे ही 'आन्वीक्षिकी' 'न्यायविद्या', या 'न्यायशास्त्र' कहते हैं । और जो अनुमान प्रत्यक्ष तथा आगम के विरुद्ध हो वह 'न्यायाभास' कहलाता है । उस न्यायविद्या में वाद तथा जल्प 'प्रयोजन' के साथ रहते हैं । ( वाद का प्रयोजन है तत्त्वज्ञान और जल्प का प्रयोजन है विजय । ) वितण्डा पर भी विचार कर लें । शास्त्रार्थ में वितण्डा से प्रवर्तमान पुरुष को 'वैतण्डिक' कहते हैं । यदि वह प्रयोजन पूछे जाने पर 'यह उसका पक्ष है', या 'यह उसका सिद्धान्त है' ऐसा स्वीकार करता है तो अपने वैतण्डिकत्व को ही छोड़ बैठता है । यदि कुछ भी नहीं स्वीकार करता है तो साधारणजन उसे न तो लौकिक समझेंगे, न परीक्षक ही । यदि वह 'परपक्ष का खण्डन' ही अपना प्रयोजन बतावे ? तो इससे भी उसका वैतण्डिकत्व कहाँ रह पायेगा ! क्योंकि यदि वह 'जिसके द्वारा बोध कराया जाता है', 'जो जानता है', 'जो बोध कराया जाता है' या 'जिसको बोध कराया जाता है'— इन चार बातों को स्वीकार कर लेता है तो उसका वैतण्डिकत्व कैसा ? यदि नहीं स्वी- CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri