भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 26

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० भवति । वाक्यसमूहश्च स्थापनाहीनो वितण्डा, तस्य यद्यभिधेयं प्रतिपद्यते ? सोऽस्य पक्षः स्थापनीयो भवति । अथ न प्रतिपद्यते ? प्रलापमात्रमनर्थकं भवति, वितण्डात्वं निवर्त्तत इति । अथ दृष्टान्तः प्रत्यक्षविषयोऽर्थः—यत्र लौकिकपरीक्षकाणां दर्शनं न व्याह- न्यते, स च प्रमेयम् । तस्य पृथग्वचनं च—तदाश्रयावनुमानागमौ । तस्मिन् सति स्यातामनुमानागमौ, असति च न स्याताम् । तदाश्रया च न्यायप्रवृत्तिः । दृष्टान्तविरोधेन च परपक्षप्रतिषेधो वचनीयो भवति, दृष्टान्तसमाधिना च स्वपक्षः साधनीयो भवति । नास्तिकश्च दृष्टान्तमभ्युपगच्छन्नास्तिकत्वं जहाति, अनभ्युपगच्छन् किंसाधनः परमुपालभेतेति ! निरुक्तेन च दृष्टान्तेन शक्यमभि- धातुम्—'साध्यसाधर्म्यात् तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्' (१. १. ३६), तद्वि- पर्ययाद्वा विपरीतम्' (१. १. ३७) इति । 'अस्त्ययम्' इत्यनुज्ञायमानोऽर्थः सिद्धान्तः, स च प्रमेयम् । तस्य पृथग्वचनम्—सत्सु सिद्धान्तभेदेषु वादजल्पवितण्डाः प्रवर्त्तन्ते, नातोऽन्येथेति । कार करता है तो उसका 'परपक्षखण्डन मेरा प्रयोजन है'—यह वाक्य निष्प्रयोजन हो जायेगा । (स्वपक्ष) स्थापनाहीन वाक्यसमूह 'वितण्डा' कहलाता है । यदि वैतण्डिक वाक्य का अभिधेय स्वीकार कर लेता है तो वही उसका पक्ष-स्थापन कहलायेगा, यदि नहीं स्वीकार करता है तो शास्त्रार्थ में उसका सब कुछ कहा-सुना प्रलापमात्र तथा निरर्थक होगा, वितण्डात्व कहाँ रहेगा ! अब दृष्टान्त का निरूपण करते हैं—प्रत्यक्ष (प्रमाणमात्र) से जहाँ साध्य अर्थ को लौकिक स्वीकार करते हैं वह 'दृष्टान्त' कहलाता है, अर्थात् जहाँ लौकिक परीक्षकों की बात न कट पाये । वह भी प्रमेय के ही अन्तर्भूत है । उसको सूत्र में अलग इसलिये पढ दिया गया कि अनुमान और आगम प्रमाण उसके अधीन हैं—उसके होने पर वे होंगे, उसके न होने पर नहीं होंगे । न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति भी तदाश्रित ही है । विरुद्ध दृष्टान्त से परपक्ष का खण्डन किया जाता है, तथा अनुकूल दृष्टान्त से स्वपक्ष-समर्थन । नास्तिक पुरुष यदि शास्त्रार्थ में दृष्टान्त का सहारा लेगा तो वह अपना 'नास्तिकत्व' ही खो बैठेगा, यदि सहारा न लेगा तो वह किस साधन से परपक्ष का खण्डन कर पायेगा ! दृष्टान्त का निर्वचन करने के लिये हम कह सकते हैं—'साध्य की समानधर्मता से युक्त तद्धर्मभावी दृष्टान्त कहलाता है' ( १. १. ३६ ), तथा 'उसके विपर्यय से विपरीत' ( १. १. ३७ ) । प्रमाणजन्य प्रतीति के बाद 'यह प्रमाण का विषय है' या 'ऐसा ही है'—इस तरह स्वीक्रियमाण अर्थ सिद्धान्त कहलाता है । यह भी प्रमेय है । सिद्धान्तों के भिन्न होने पर ही वाद, जल्प, वितण्डा ( इन प्रमेयों ) की प्रवृत्ति होती है, अन्यथा नहीं । इसलिये सिद्धान्त को एक पृथक् प्रमेय माना है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri