न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २११ मर्थानां बहुत्वात् । बहवः खल्विमे इन्द्रियार्थाः—स्पर्शास्तावच्छीतोष्णानुष्ण- शीता इति, रूपाणि शुक्लहरितादीनि, गन्धा इष्टानिष्टोपेक्षणीयाः, रसाः कटुकादयः, शब्दा वर्णात्मानो ध्वनिमात्राश्च भिन्नाः । तद्यस्येन्द्रियार्थपञ्च- त्वात् पञ्चेन्द्रियाणि, तस्येन्द्रियार्थबहुत्वाद् बहूनि इन्द्रियाणि प्रसज्यन्त इति ? ॥ ५७ ॥ गन्धत्वाद्यव्यतिरेकाद् गन्धादीनामप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥ गन्धत्वादिभिः स्वसामान्यैः कृतव्यवस्थानां गन्धादीनां यानि गन्धादि- ग्रहणानि तान्यसमानसाधनसाध्यत्वात् ग्राहकान्तराणि प्रयोजयन्ति । अर्थ- समूहोऽनुमानमुक्तः, नार्थैकदेशः; नार्थैकदेशं चाश्रित्य विषयपञ्चत्वमात्रं भवान् प्रतिषेधति; तस्मादयुक्तोऽयं प्रतिषेध इति । कथं पुनर्गन्धत्वादिभिः स्वसामान्यैः कृतव्यवस्था गन्धादय इति ? स्पर्शः खल्वयं त्रिविधः—शीत उष्णोऽनुष्णाशीतश्च स्पर्शत्वेन स्वसामान्येन संगृहीतः । नहीं होतीं; क्योंकि उनके प्रयोजन बहुत से हैं। इन इन्द्रियप्रयोजनों की बहुलता है, जैसे— एक स्पर्श को ही लें—यह अकेला शीत, उष्ण, अनुष्ण भेदवाला है । इसी तरह शुक्ल, हरित आदि भेद से रूप अनेक प्रकार का है; गन्ध भी इष्ट, अनिष्ट, उपेक्षणीय भेद से; रस मधुर, कटु आदि भेद से; शब्द वर्ण तथा ध्वनि भेद से अनेक प्रकार के होते हैं । अतः जो वादी यह कहता है कि ‘इन्द्रियों के पाँच ही प्रयोजन होने से इन्द्रियाँ पांच हैं’, उसके सामने अनेक प्रयोजन सिद्ध होने से अनेक इन्द्रियों का प्रसंग आ पड़ा ? ॥ ५७ ॥ उत्तर— गन्धसमूह के गन्धत्वेन एक होने से गन्धादिक का प्रतिषेध नहीं होता ॥ ५८ ॥ गन्धत्वादि स्वसामान्य ( एकत्वजाति ) से व्यवस्थित ( अनुगत ) गन्धादि का ज्ञान विजातीय तत्तत् साधनों ( ग्राहकों ) से साध्य हैं, अतः वे इन्द्रियान्तर का अनुमान कराने लगते हैं । क्योंकि हम अर्थसमूह को ही अनुमापक हेतु कहते हैं, न कि प्रयोजनैक- देश को; जब कि प्रयोजनैकदेश के सहारे आप विषयपञ्चत्व का प्रतिषेध करने खड़े हो गये । अतः आपका यह प्रतिषेध उचित नहीं । गन्धत्वादि स्वसामान्य से गन्धादि कैसे व्यवस्थित हैं ? यह स्पर्श तीन प्रकार का है—शीत, उष्ण, अनुष्णाशीत भेद से । ये तीनों स्पर्शत्व स्वसामान्य से संगृहीत हो जाते हैं । शीतस्पर्श के गृहीत होते हुए उष्ण या अनुष्णशीत स्पर्श गृहीत होता है, उनका ग्रहण शीतस्पर्श ग्राहक से ही होता है । अतः एकसाधनसाध्य होने से