न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० गृह्यमाणे च शीतस्पर्शे, नोष्णस्यानुष्णाशीतस्य वा स्पर्शस्य ग्रहणं ग्राहकान्तरं प्रयोजयति; स्पर्शभेदानामेकसाधनसाध्यत्वाद्-येनैव शोतस्पर्शो गृह्यते तेनैवे- तरावपीति । एवं गन्धत्वेन गन्धानाम्, रूपत्वेन रूपाणाम्, रसत्वेन रसानाम्, शब्दत्वेन शब्दानामिति । गन्धादिग्रहणानि पुनरसमानसाधनसाध्यत्वाद् ग्राह- कान्तराणां प्रयोजकानि । तस्मादुपपन्नम्-‘इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् पञ्चेन्द्रियाणि' इति ॥ ५८ ॥ यदि सामान्यं संग्राहकम्, प्राप्तमिन्द्रियाणाम् विषयत्वाव्यतिरेकादेकत्वम् ? ॥ ५९ ॥ विषयत्वेन हि सामान्येन गन्धादयः सङ्गृहीता इति ॥ ५९ ॥ न; बुद्धिलक्षणाधिष्ठानगत्याकृतिजातिपञ्चत्वेभ्यः ॥ ६० ॥ न खलु विषयत्वेन सामान्येन कृतव्यवस्था विषया ग्राहकान्तरनिरपेक्षा एक- साधनग्राह्या अनुमीयन्ते, अनुमीयन्ते च पञ्च गन्धादयो गन्धत्वादिभिः स्वसा- मान्यैः कृतव्यवस्था इन्द्रियान्तरग्राह्याः, तस्मादसम्बद्धमेतत् । अयमेव चार्थोऽनूच्यते-बुद्धिलक्षणपञ्चत्वादिति । बुद्धय एव लक्षणानि विषय- उष्ण आदि स्पर्शान्तर का ग्रहण ग्राहकान्तर ( इन्द्रियान्तर ) का अनुमापक नहीं है । इसी प्रकार गन्धत्वसामान्य से समग्र गन्धों का, रूपत्वसामान्य से सभी रूपों का, रस- त्वसामान्य से सम्पूर्ण रसों का, शब्दत्वसामान्य से सब शब्दों का ग्रहण सिद्ध हो सकता है। गन्धादि विजातीय गुणविशेष का ज्ञान असमान साधनों द्वारा साध्य होने से ग्राह- कान्तर का अनुमान करा सकते हैं । अतः प्रयोजन समूहभेद के पाँच प्रकार के होने से इन्द्रियाँ भी पाँच ही हैं ॥ ५८ ॥ यदि जाति ही संग्रहिका हैं तो इन्द्रियों का— विषयत्वाभेद से एकत्व उपपन्न होने लगेगा ? ॥ ५९ ॥ विषयत्वसामान्य से गन्धादि का संग्रह होने से एक ही इन्द्रिय में सबका संग्रह हो जायेगा ? ॥ ५९ ॥ नहीं; बुद्धि, लक्षण, अधिष्ठान, गति, आकृति—इन से ( वे गन्धादि संगृहीत होते ) ॥ ६० ॥ विषयत्वसामान्य से व्यवस्थित विषय ग्राहकान्तरनिरपेक्ष होते हुए एकेन्द्रियग्राह्यत्वेन अनुमित नहीं होते । गन्धादि पाँच गन्धत्वादि स्वसामान्य से व्यवस्थित होकर इन्द्रिया- न्तरग्राह्य हैं । अतः यह इन्द्रिय का एकत्व असम्बद्ध है । इसी बात को इस सूत्र में बुद्धिलक्षणपञ्चत्व से स्पष्ट कर रहे हैं । तत्तद्बुद्धियाँ ही इन्द्रियत्वसाधक विषयग्रहण के पाँच भेद होने से उनके पञ्चत्व के लक्षण हैं । यह बात CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri