भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६०. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २१३ ग्रहणलिङ्गतत्वाद्विन्द्रियाणाम्, तदेतत् 'इन्द्रियार्थपञ्चत्वात्' ( ३. १. ५६ ) इत्ये- तस्मिन् सूत्रे कृतभाष्यमिति । तस्माद् बुद्धिलक्षणपञ्चत्वात् पञ्चेन्द्रियाणि । अधिष्ठानान्यपि खलु पञ्चेन्द्रियाणाम् । सर्वशरीराधिष्ठानं स्पर्शनं स्पर्श- ग्रहणलिङ्गम्, कृष्णताराधिष्ठानं चक्षुर्बहिर्निःसृतं रूपग्रहणलिङ्गम्, नासाधिष्ठानं घ्राणम्, जिह्वाधिष्ठानं रसनम्, कर्णच्छिद्राधिष्ठानं श्रोत्रम्; गन्धरसरूपस्पर्श- शब्दग्रहणलिङ्गतत्वादिति । गतिभेदादपीन्द्रियभेदः । कृष्णसारोपनिवद्धं चक्षुर्बहिर्निःसृतं रूपाधिकर- णानि द्रव्याणि प्राप्नोति । स्पर्शनादीनि त्विन्द्रियाणि विषया एवाश्रयोपसर्प- णात् प्रत्यासीदन्ति । सन्तानवृत्त्या शब्दस्य श्रोत्रप्रत्यासत्तिरिति । आकृतिः खलु परिमाणम्, इयत्ता । सा पञ्चधा—स्वस्थानमात्राणि घ्राण- रसन-स्पर्शनानि विषयग्रहणेनानुमेयानि; चक्षुः कृष्णसाराश्रयं बहिर्निःसृतं विषय- व्यापि; श्रोत्रं नान्यदाकाशात्, तच्च विभु शब्दमात्रानुभवानुमेयं पुरुषसंस्कारो- पग्रहाच्चाधिष्ठाननियमेन शब्दस्य व्यञ्जकमिति । हमने ऊपर 'इन्द्रियार्थों के पांच होने से' ( ३.१.५६. ) सूत्र में स्पष्ट कर दी है । अतः बुद्धिलक्षण पाँच होने से इन्द्रियाँ भी पाँच हैं । पाँचों इन्द्रियों के अधिष्ठान भी पाँच ही हैं । सम्पूर्ण शरीर का आश्रय लेनेवाली स्पर्शनेन्द्रिय स्पर्शज्ञान का हेतु है । कनीनिका का आश्रय लिये हुए चक्षुरिन्द्रिय बहिर्निःसृत रूपज्ञान का हेतु है । घ्राणेन्द्रिय नासाधिष्ठानवाली है, रसनेन्द्रिय जिह्वाधिष्ठानवाली है, श्रोत्रेन्द्रिय कर्णच्छिद्राधिष्ठानवाली है । इस प्रकार ये सभी पाँच विजातीय क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द ज्ञान की हेतु हैं । गतिभेद से भी इन्द्रियभेद सिद्ध होता है । कनीनिका से संयुक्त चक्षु बाहर निकल, रूपाश्रय द्रव्य तक पहुँचती है । स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषय ही उन इन्द्रियों के पास पहुँच जाते हैं । सन्तानवृत्ति से शब्द श्रोत्र के पास पहुँचता है । आकृति कहते हैं—परिमाण को, इयत्ता को । वह आकृति पाँच प्रकार की है । घ्राण, रसन, स्पर्शनेन्द्रियाँ स्वस्थानमात्र पर्याप्त हैं, तथा स्व स्व विषय के ग्रहण से अनुमित होती हैं । चक्षु कनीनिकाधिष्ठित हो, बाहर निकल कर विषय को व्याप्त करती है, श्रोत्रेन्द्रिय आकाश से भिन्न नहीं है, वह आकाश नित्य है, शब्दमात्र के अनु- भव से अनुमेय है, पुरुषों के दृष्टादृष्टाख्य संस्कारविशेष सम्बन्ध अथवा संस्कारबल से वह अधिष्ठान होकर शब्द का व्यञ्जक है । इस प्रकार आकृति से भी ये इन्द्रियाँ सिद्ध होती हैं ।