भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [३. अ० १. आ० किंकृतं पुनर्व्यवस्थानम्-किञ्चित् पार्थिवमिन्द्रियं न सर्वाणि, कानिचिदाप्य- तैजसवायव्यानि इन्द्रियाणि न सर्वाणीति ? तद्व्यवस्थानं तु भूयस्त्वात् ॥ ६९ ॥ अर्थनिर्वृत्तिसमर्थस्य प्रविभक्तस्य द्रव्यस्य संसर्गः पुरुषसंस्कारकारितः 'भूयस्त्वम्' । दृष्टो हि प्रकर्षे भूयस्त्वशब्दः, प्रकृष्टो यथा विषयो भूयानित्युच्यते । यथा पृथगर्थक्रियासमर्थानि पुरुषसंस्कारवशाद्विषौषधिमणिप्रभृतीनि द्रव्याणि निर्वर्त्यन्ते, न सर्वं सर्वार्थम्; एवं पृथग्विषयग्रहणसमर्थानि घ्राणादीनि निर्वर्त्यन्ते, न सर्वविषयग्रहणसमर्थानीति ॥ ६९ ॥ स्वगुणान्नोपलभन्ते इन्द्रियाणि । कस्मादिति चेत् ? सगुणानामिन्द्रियभावात् ॥ ७० ॥ स्वान् गन्धादीन्नोपलभन्ते घ्राणादीनि । केन कारणेनेति चेत् ? स्वगुणैः सह घ्राणादीनामिन्द्रियभावात् । घ्राणं स्वेन गन्धेन समानार्थकारिणा सह बाह्यं गन्धं गृह्णाति, तस्य स्वगन्धग्रहणं सहकारिवैकल्यान्न भवति । एवं शेषाणामपि ॥ ७० ॥ यह व्यवस्था कैसे बन गयी कि कोई इन्द्रिय ही पार्थिव है सब इन्द्रियाँ नहीं, या कोई इन्द्रिय ही आप्य है, कोई इन्द्रिय ही तैजस है, कोई इन्द्रिय ही वायव्य है, सब नहीं ? उस द्रव्य का भूयस्त्व ( प्रकृष्टत्व ) होने से ऐसी व्यवस्था बन जाती है ॥ ६९ ॥ पुरुष के कर्मविशेष से किया गया, कार्योत्पत्ति में समर्थ, प्रविभक्त द्रव्य के संसर्ग को 'भूयस्त्व' कहते हैं । प्रकर्ष अर्थ में 'भूयस्त्व' का प्रयोग देखा जाता है, जैसे- प्रकृष्ट विषय को 'भूयान्' कह देते हैं । यथा-पुरुषसंस्कारवश से विषौषधि, मणि-आदि द्रव्य पृथक्-पृथक् क्रिया करने में समर्थ उत्पन्न होते हैं । अतएव सब द्रव्य सभी क्रिया नहीं कर सकते । इसी प्रकार, अलग-अलग विषय को ग्रहण करने में समर्थ इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, न कि सब विषयों को ग्रहण करने में समर्थ ॥ ६९ ॥ शङ्का-इन्द्रियाँ स्वगुणों को उपलब्ध नहीं करतीं; क्योंकि उनका इन्द्रियत्व स्वविषयसहित होता है ॥ ७० ॥ घ्राणादि इन्द्रियाँ स्वविषय गन्धादि को ग्रहण नहीं करतीं; क्योंकि स्वविषयों के साथ मिलकर घ्राणादिकों में 'इन्द्रियत्व' आता है । घ्राण अपने समानार्थकारी गन्ध के साथ होकर बाह्य गन्ध को ग्रहण करता है । उसका स्वगन्धग्रहण सहकारिकारण के असम्बन्ध से नहीं बनता । इसी तरह अन्य इन्द्रियों के विषय में भी समझना चाहिए ॥७०॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri