न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७३. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २२१ यदि पुनर्गन्धः सहकारो च स्याद्, घ्राणस्य ग्राह्यश्च ? इत्यत आह— तैनैव तस्याग्रहणाच्च ॥ ७१ ॥ न गुणोपलब्धिरिन्द्रियाणाम् । यो ब्रूते-यथा वाह्यं द्रव्यं चक्षुषा गृह्यते तथा तेनैव चक्षुषा तदेव चक्षुर्गृह्यतामिति, तादृगिदम्; तुल्यो ह्युभयत्र प्रति- पत्तिहेत्वभाव इति ॥ ७१ ॥ न, शब्दगुणोपलब्धेः ? ॥ ७२ ॥ स्वगुणान्नोपलभन्त इन्द्रियाणीति एतन्न भवति । उपलभ्यते हि स्वगुणः शब्दः श्रोत्रेणेति ? ॥ ७२ ॥ तदुपलब्धिरितरेतरद्रव्यगुणवैधर्म्यात् ॥ ७३ ॥ न शब्देन गुणेन सगुणमाकाशमिन्द्रियं भवति, न शब्दः शब्दस्य व्यञ्जकः । न च घ्राणादीनां स्वगुणग्रहणं प्रत्यक्षम्, नाप्यनुमीयते । अनुमीयते तु श्रोत्रेणा- काशेन शब्दस्य ग्रहणम्, शब्दगुणत्वं च आकाशस्येति । परिशेषश्चानुमानं वेदितव्यम् । आत्मा तावत् श्रोता न करणम्, मनसः श्रोत्रत्वे बधिरत्वाभावः, इस पर पूर्वपक्षी कहता है कि यदि गन्ध को सहकारी भी मान लें और घ्राणेन्द्रिय का ग्राह्य भी मान लें ? उसी से उसका ग्रहण न होने से ॥ ७१ ॥ इन्द्रियों से स्वगुणोपलब्धि नहीं होती, क्योंकि जैसे कोई कहे—'यथा बाह्य द्रव्य चक्षु से गृहीत होता है उसी तरह उसी चक्षु से वह चक्षु गृहीत हो जायेगी', ऐसी ही बात यह हुई । मतलब कहने का यह है कि दोनों ही जगह ज्ञान के हेतु का अभाव समान है ॥ ७१ ॥ ऐसा नहीं; क्योंकि शब्द गुण श्रोत्र से उपलब्ध होता है ? ॥ ७२ ॥ 'इन्द्रियां अपने गुणों को उपलब्ध नहीं करतीं'—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा स्वगुण शब्द गृहीत होता देखा जाता है ? ॥ ७२ ॥ इतरेतर द्रव्य के गुणवैधर्म्य से उसकी उपलब्धि होती है ॥ ७३ ॥ शब्द गुण से सगुण होकर आकाश इन्द्रिय ( शब्दाभिन्न गुण सहित ) नहीं हैं; क्योंकि शब्द शब्द का व्यञ्जक नहीं होता । घ्राणादि का भी स्वगुण प्रत्यक्ष नहीं होता, और न उनका अनुमान होता है । श्रोत्ररूप आकाश से शब्दग्रहण का अनुमान अवश्य होता है, और तब यह भी अनुमान होता है कि शब्द आकाश का गुण है । यहाँ कौन- सा अनुमान है ? परिशेष अनुमान समझना चाहिये । अनुमानप्रकार दिखाते हैं—'आत्मा श्रोता है, श्रोत्र नहीं; मन को श्रोत्र मानने पर दुनियाँ में कहीं बहरापन रह ही न जायेगा;