न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० पृथिव्यादीनां घ्राणादिभावे सामर्थ्यं श्रोत्रभावे चासामर्थ्यम् । अस्ति चेदं श्रोत्रम्, आकाशं च शिष्यते । परिशेषादाकाशं श्रोत्रमिति १ ॥ ७३ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये तृतीयाध्यायस्याद्यमाह्निकम् । [ अथ द्वितीयमाह्निकम् ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १-९ ] परीक्षितानीन्द्रियाणि अर्थांश्च । बुद्धेरिदानीं परीक्षाक्रमः—सा किमनित्या ? नित्या वेति ? कुतः संशयः ? कर्माकाशसाधर्म्यात् संशयः ॥ १ ॥ अस्पर्शवत्त्वं ताभ्यां समानो धर्म उपलभ्यते बुद्धौ, विशेषश्चोपजनापायधर्म- वत्त्वं विपर्ययश्च यथास्वमनित्यनित्ययोस्तस्यां बुद्धौ नोपलभ्यते, तेन संशय इति ॥ १ ॥ अनुपपन्नः खल्वयं संशयः । सर्वशरीरिणां हि प्रत्यात्मवेदनीया अनित्या बुद्धिः सुखादिवत् । भवति च संवित्तिः—ज्ञास्यामि, जानामि, अज्ञासिषमिति; न पृथिव्यादि में घ्राणादि इन्द्रियों को उत्पन्न करने की सामर्थ्य हैं, श्रोत्रेन्द्रिय को उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं । यह श्रोत्र फिर है अवश्य; अतः अवशिष्ट रहने से भाव मानने पर परिशेषात् अनुमान होता है कि आकाश ही श्रोत्र हैं ॥ ७३ ॥ वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य (सहित न्यायदर्शन) के तृतीय अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त । इन्द्रिय तथा उनके विषयों की परीक्षा की जा चुकी । अब बुद्धि की परीक्षा आरम्भ करते हैं—वह बुद्धि नित्य है, या अनित्य ? यह संशय क्यों हुआ ? कर्म तथा आकाश के सादृश्य से यहाँ संशय हुआ ॥ १ ॥ कर्म तथा आकाश का अस्पर्शवत्त्व बुद्धि में भी समान रूप से मिलता है। इस बुद्धि में अनित्य के उत्पत्तिविनाशधर्मवत्त्व तथा नित्य के उत्पत्तिविनाशधर्माभाववत्त्व—दोनों ही नहीं मिलते, अतः संशय होता है ॥ १ ॥ शंका—यह संशय युक्त नहीं है; क्योंकि सभी प्राणियों को बुद्धि का अनित्यत्व प्रत्यात्मवेदनीय होने से सुखादि की तरह अनित्य ही है । जैसे—'जानूँगा' 'जानता हूँ' 'जानता था' यह त्रैकाल्ययुक्त संवेदन भी उत्पत्ति विनाश के बिना कैसे होगा ! अतः सिद्ध होता है कि बुद्धि द्वारा त्रैकाल्याभिव्यक्ति होने से बुद्धि अनित्य है। यह प्रमाणसिद्ध १. अत्रत्यं वार्त्तिकं मननीयं जिज्ञासुभिः ।