न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२३ चोपजनापायावन्तरेण त्रैकाल्यव्यक्तिः, ततश्च त्रैकाल्यव्यक्तेरनित्या बुद्धिरित्ये- तत्सिद्धम्। प्रमाणसिद्धं चेदं शास्त्रेऽप्युक्तम्-‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नम्’, ‘युगपज्- ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्’ इत्येवमादि, तस्मात्संशयप्रक्रियानुपपत्तिरिति ? दृष्टिप्रवादोपालम्भार्थं तु प्रकरणम्। एवं हि पश्यन्तः प्रवदन्ति सांख्याः-पुरुषस्यान्तःकरणभूता नित्या बुद्धिरिति। साधनं च प्रचक्षते— विषयप्रत्यभिज्ञानात् ॥ २ ॥ किं पुनरिदं प्रत्यभिज्ञानम् ? ‘यं पूर्वमज्ञासिषमर्थं तमिमं जानामि’ इति ज्ञानयोः समानेऽर्थे प्रतिसन्धिज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम्। एतच्चावस्थिताया बुद्धेरुप- पन्नम्। नानात्वे तु बुद्धिभेदेषूत्पन्नापवर्गिषु प्रत्यभिज्ञानानुपपत्तिः, नान्यज्ञात- मन्यः प्रत्यभिजानातीति ॥ २ ॥ साध्यसमत्वादहेतुः ॥ ३ ॥ यथा खलु नित्यत्वं बुद्धेः साध्यम् एवं प्रत्यभिज्ञानमपीति । किं कारणम् ? चेतनधर्मस्य करणेऽनुपपत्तिः। पुरुषधर्मः खल्वयम्—ज्ञानं दर्शनमुपलब्धिर्बोधः अनित्यता शास्त्र में पीछे कह आये हैं—‘इन्द्रिय-अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न ज्ञान (बुद्धि’) ( १.१.४ ) तथा ‘युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन का हेतु हैं’ ( १.१.१६ ) । इन प्रमाणों से ज्ञान की अनित्यता स्पष्ट सिद्ध है। अतः संशय नहीं बनेगा ? समाधान—सांख्यमत के प्रौढिवाद का उपालम्भ ( तिरस्कार ) करने के लिये यह प्रकरण प्रारम्भ किया गया है। साङ्ख्यमतानुयायी ऐसा मानते हैं—‘पुरुष की मनोरूप बुद्धि अविनाशिनी हैं’। इसमें कारण बतलाते हैं— विषय का प्रत्यभिज्ञान होने से ॥ २ ॥ यह प्रत्यभिज्ञान क्या है ? ‘जिस अर्थ को मैं पहले जानता था, उसी अर्थ को अब जान रहा हूँ’—इस तरह दो ज्ञानों का समान अर्थ में प्रतिसन्धिज्ञान ‘प्रत्यभिज्ञान’ कहलाता है। यह अवस्थित ( नित्य ) बुद्धि में ही उपपन्न हो सकता है। उत्पन्नविनाशी नाना बुद्धिभेद मानने पर यह प्रत्यभिज्ञान नहीं बनेगा; क्योंकि अन्य द्वारा ज्ञात को अन्य कैसे स्मरण करेगा ! ॥ २ ॥ सांख्यमत-निराकरण— साध्यसम होने से यह ( प्रत्यभिज्ञान ) हेतु हेत्वाभास है ॥ ३ ॥ जैसे बुद्धि का नित्यत्व साध्य हैं, इसी तरह प्रत्यभिज्ञान भी साध्य है। कारण, चेतन धर्म का अन्तःकरण में सम्भव नहीं है। यह सब—ज्ञान, दर्शन, उपलब्धि,