न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४१ सिध्यतीत्येवं चेन्मन्यसे ? समानम् । स्मृतिहेतावपि संयोगविशेषो भवितुमर्हति । तत्र यदुक्तम्- 'आत्मप्रेरणयहच्छाज्ञातृभिश्च न संयोगविशेषः' (३.२.३१) इति, अयमप्रतिषेध इति । पूर्वस्तु प्रतिषेधः 'नान्तःशरीरवृत्तित्वान्मनसः' (३.२.२६) इति ? ॥ ३२ ॥ कः खल्विदानीं कारणयौगपद्यसद्भावे युगपदस्मरणस्य हेतुरिति ? प्रणिधानलिङ्गादिज्ञानानामयुगपद्भावादयुगपत्स्मरणम् ॥ ३३ ॥ यथा खल्वात्ममनसोः सन्निकर्षः संस्कारश्च स्मृतिहेतुः, एवं प्रणिधानं लिङ्गा- दिज्ञानानि, तानि च न युगपद्भवन्ति, तत्कृता स्मृतानां युगपदनुत्पत्तिरिति । प्रातिभवत्तु प्रणिधानाद्यनपेक्षे स्मार्ते यौगपद्यप्रसङ्गः१ । यत्खल्विदं प्रातिभमिव ज्ञानं प्रणिधानाद्यनपेक्षं स्मार्तमुत्पद्यते, कदाचित्तस्य युगपदुत्पत्तिप्रसङ्गः; हेत्वभावात् । सतः स्मृतिहेतोरसंवेदनात् प्रातिभेन समाना- भिमानः । बह्वर्थविषये वै चिन्ताप्रबन्धे कश्चिदेवार्थः कस्यचित्स्मृतिहेतुः, तस्या- नुचिन्तनात् तस्य स्मृतिर्भवति, न चायं स्मर्ता सर्वं स्मृतिहेतुं संवेदयते-'एवं मे भोग के लिये मन में क्रियाहेतु बन जायेगा एवं सुखाद्युपभोग भी उसको प्राप्त होगा- ऐसा मानोगे ? तो हमारे मत में भी यही उत्तर है । अर्थात् स्मृतिहेतु में भी संयोगविशेष उस प्रकार हो सकता है । अतः वहाँ जो आपने प्रतिषेध दिया था कि- 'आत्मप्रेरणा, यदृच्छा तथा ज्ञातृता से संयोगविशेष नहीं होता' ( ३.२.३१ ) - यह नहीं बनेगा । अपितु मन के 'अन्तःशरीरवृत्ति होने से शरीर के बाह्य प्रदेशों में उसका संयोग नहीं होता' ( ३.२.२६ ) - यह पहला प्रतिषेध ही बनेगा ॥ ३२ ॥ शंका-स्मृतियौगपद्य के रहते अब कौन युगपद् स्मरण न होने में हेतु है ? प्रणिधान, लिङ्गादि ज्ञान के अयुगपद्भाव से युगपत् स्मरण नहीं होता ॥ ३३ ॥ जैसे आत्ममनःसन्निकर्ष तथा संस्कार स्मृतिहेतु हैं, उसी तरह प्रणिधान तथा लिङ्गादिज्ञान भी स्मृतिहेतु हैं । वे युगपद् उद्भूत नहीं होते; अतः तत्कृत स्मृतियाँ भी युगपत् उत्पन्न नहीं होतीं । प्रातिभ ज्ञान स्मृत्यनुरूप ही है, वह प्रणिधानादि के बिना ही संस्कारसहित आत्म- मनःसंयोगमात्र से जो स्मृतियाँ उत्पन्न होती हैं वैसी अन्य स्मृतियाँ भी युगपत् सम्भव होने लगेंगी ? अर्थात् जो प्रणिधानाद्यनपेक्ष स्मार्त ज्ञान प्रातिभ ज्ञान के सदृश उत्पन्न होता है, उनके हेतु (प्रणिधानादि) की अपेक्षा न होने से कदाचित् वैसी स्मृतियों की युगपदुत्पत्ति होने लगेगी ? स्मृतिहेतु के असंवेदन ( समझमें न आने ) से स्मार्त ज्ञान में प्रातिभज्ञान के साथ तुल्यारोप है । पर अनेकार्थविषयक चिन्ता ( अनुभवधारा ) में कोई ही अर्थ किसी चिन्तन का स्मृतिहेतु बनता है, उसके अनुचिन्तन से उसकी स्मृति होती है, और स्मर्ता इस प्रकार सभी स्मृतिहेतुओं का तो संवेदन नहीं कर पाता कि १. इदं भाष्यमेव न सूत्रम्; प्रमाणाभावात् । न्या० : द० १६