भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० स्मृतिरुत्पन्ना' इति, असंवेदनात् प्रातिभमिव ज्ञानमिदं स्मार्तमित्यभिमन्यते । न त्वस्ति प्रणिधानाद्यनपेक्षं स्मार्तमिति । प्रातिभे कथमिति चेत् ? पुरुषकर्मविशेषादुपभोगवन्नियमः । प्रातिभमिदानीं ज्ञानं युगपत् कस्मान्नोत्पद्यते ? यथोपभोगार्थं कर्म युगपदु- पभोगं न करोति, एवं पुरुषकर्मविशेषः प्रतिभाहेतुर्न युगपदनेकं प्रातिभं ज्ञान- मुत्पादयति । हेत्वभावादयुक्तमिति चेद् ? न; करणस्य प्रत्ययपर्याये सामर्थ्यात् । 'उपभोगवन्नियमः' इत्यस्ति दृष्टान्तो हेतुर्नास्तीति चेन्मन्यसे ? न; करणस्य प्रत्ययपर्याये सामर्थ्याद् । नैकस्मिन् ज्ञेये युगपदनेकं ज्ञानमुत्पद्यते, न चानेकस्मिन् । तदिदं दृष्टेन प्रत्ययपर्यायेणानुमेयं करणसामर्थ्यमित्थम्भूतमिति न ज्ञातुर्विकरण- धर्मणो देहनानात्वे प्रत्यययोगपद्यादिति । अयं च द्वितीयः प्रतिषेधः-अवस्थितशरीरस्य चानेकज्ञानसमवायादेकप्रदेशे युगपदनेकार्थस्मरणं स्यात् । क्वचिद् देशेऽवस्थितशरीरस्य ज्ञातुरिन्द्रियार्थप्रबन्धेन ज्ञानमनेकमेकस्मिन्नात्मप्रदेशे समवैति । तेन यदा मनः संयुज्यते तदा ज्ञातपूर्व- 'मुझे ऐसी स्मृति उत्पन्न हुई है' । अतः असंवेदन से स्मार्तज्ञान भी प्रातिभज्ञान की तरह होता है—ऐसा वह अभिमान ( भ्रम ) करता है। वस्तुतः स्मार्त में भी सम्पूर्ण प्रणिधानादि की अपेक्षा रहती ही है । प्रातिभ में क्या व्यवस्था रहती है ? पुरुषकर्मविशेष से उपभोग की तरह उसमें नियम है। अब प्रातिभज्ञान युगपत् उत्पन्न क्यों नहीं होता ? जैसे उपभोगार्थक कर्म एक साथ उपभोग नहीं कराता, उसी तरह प्रतिभाहेतु पुरुषकर्मविशेष एक साथ अनेक प्रातिभज्ञानों को उत्पन्न नहीं कराता । 'हेतु के न होने से' यह आपकी उक्ति अयुक्त है ? नहीं; क्योंकि करण में अनेक प्रत्यय एक साथ उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं होती । और उपर्युक्त 'उपभोग- वन्नियमः' यह दृष्टान्त है, हेतु नहीं है—ऐसा आप नहीं कह सकते; क्योंकि हम अभी उत्तर दे चुके हैं कि करण ( साधन ) का क्रमिक ज्ञान में सामर्थ्य होता है । अनेक ज्ञान न तो एक ज्ञेय में युगपद् उत्पन्न हो सकते हैं, न अनेक में । इस लोकसिद्ध क्रमिकज्ञान से ऐसा ही करणसामर्थ्य अनुमित होता है । विकरणधर्मा ( योगी ) के अनेकदेह होने पर ज्ञानयोगपद्य दिखायी देता है । ज्ञाता होने की दशा में तो योगी को भी वैसा ज्ञान- योगपद्य नहीं होगा । दूसरा प्रतिषेध यह है—अवस्थित शरीर ज्ञाता के अनेक ज्ञानसमवाय से एक प्रदेश में युगपद् अनेकार्थ का स्मरण हो सकता है । किसी देश में अवस्थित शरीरज्ञाता से इन्द्रियार्थसम्बन्ध से अनेक ज्ञान एक ही आत्मप्रदेश में समवेत हो जाते हैं । उससे जब CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri