भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० नियमः स्यात्, यथा-भूतानां गुणान्तरनिमित्ता प्रवृत्तिर्गुणप्रतिबन्धाच्चानिवृ- त्तिर्भूतमात्रे भवति नियमेन; एवं भूतमात्रे ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्ते प्रवृत्तिनिवृत्तौ स्वाश्रये स्याताम् ! न तु भवतः । तस्मात् प्रयोजकाश्रिता ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नाः, प्रयोज्याश्रये तु प्रवृत्तिनिवृत्ती इति सिद्धम् । एकशरीरे तु ज्ञातृबहुत्वं निरनुमानम् । भूतचैतनिकस्यैकशरीरे बहूनि भूतानि ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नगुणानीति ज्ञातृबहुत्वं प्राप्तम् । ओमिति ब्रुवतः प्रमाणं नास्ति । यथा नानाशरीरेषु नानाज्ञातारो बुद्ध्यादिगुणव्यवस्थानात्, एवमेक- शरीरेऽपि बुद्ध्यादिव्यवस्थानुमानं स्याज्ज्ञातृबहुत्वस्येति । दृष्टश्चान्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषो भूतानाम्, सोऽनुमानमन्यत्रापि । दृष्टः करणलक्षणेषु भूतेषु परश्वादिषु उपादानलक्षणेषु च मृत्प्रभृतिष्वन्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषः । सोऽनुमानमन्यत्रापि-त्रसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः प्रवृत्तिविशेषो भूतानामन्यगुणनिमित्त इति । स च गुणः प्रयत्नसमानाश्रयः संस्कारो धर्माधर्मसमाख्यातः सर्वार्थः, पुरुषार्थाराधनाय प्रयोजको भूतानां

  • प्रयत्नवदिति । है, उसके यहाँ नियम बन सकता है। जैसे भूतसामान्य में गुरुत्वादि गुणान्तरनिमित्तक प्रवृत्ति तथा इसी गुणप्रतिबन्ध से नियमतः भूतमात्र में निवृत्ति देखी जाती है। इसी तरह भूतमात्र में ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति स्वाश्रय होने से होने लगेगी, जब कि होती नहीं है । अतः यही मानना चाहिये कि ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न प्रयोजक ( ज्ञाता ) के आश्रित हैं, तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रयोज्य ( भूतादि ) के आश्रित हैं । एक शरीर में अनेक ज्ञाता किसी भी अनुमान से सिद्ध नहीं किये जा सकते । भूत- चैतन्यवादी के मत में बहुत से भूत ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न गुणवाले हैं, अतः अनेक ज्ञाता होने लगेंगे । यदि वह उनका अनेकत्व स्वीकार करता है तो उसकी इस स्वीकृति में कोई प्रमाण नहीं है । जैसे अनेक शरीरों में बुद्ध्यादिगुणव्यवस्था से अनेक ज्ञाता होते हैं; वैसे ही एक में भी बुद्ध्यादिव्यवस्था से अनेक ज्ञाताओं का अनुमान होने लगेगा । भूतों का अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा गया है, वह अन्यत्र भी अनुमान करा देगा । करणलक्षण परशु-आदि तथा उपादानलक्षण मृदादि भूतों में अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा जाता है, तन्मूलक ही यह अनुमान होता है कि प्राणियों के अस्थिर शरीरों में भूतों का तदवयवव्यूहलिङ्गक प्रवृत्तिविशेष अन्यगुणनिमित्तक ही है । वह गुण प्रयत्नसमानाधिकरण धर्माधर्माख्य संस्कारविशेष ही है । वह पुरुषसम्बद्ध सकलार्थ- प्रयोजक पुरुषार्थ-सम्पादन के लिये भूतों का प्रयोजक है । जैसे पुरुष का प्रयत्न तत्तदर्थ सम्पादन के लिये भूतों को प्रेरणा देता है, उसी तरह तद्गत धर्माधर्मरूप संस्कार भी प्रेरणा देता है ।