न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७ आत्मास्तित्वहेतुभिरात्मनित्यत्वहेतुभिश्च भूतचैतन्यप्रतिषेधः कृतो वेदि- तव्यः । 'नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात्' ( ३.२.१८ ) इति च समानः प्रतिषेध इति । क्रियामात्रं क्रियोपरममात्रं चारम्भनिवृत्ती इत्यभिप्रेत्यो- क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा त्विमे आरम्भनिवृत्ती आख्याते, न च तथाविधे पृथिव्यादिषु दृश्येते, तस्मादयु- क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' इति ॥ ३७ ॥ भूतेन्द्रियमनसां समानः प्रतिषेधः, मनस्तूदाहरणमात्रम् । यथोक्तहेतुत्वात् पारतन्त्र्यादकृताभ्यागमाच्च न मनसः ॥ ३८ ॥ ‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' (१.१.१०) इत्यतः प्रभृति यथोक्तं संगृह्यते, तेन भूतेन्द्रियमनसां चैतन्यप्रतिषेधः । पारतन्त्र्यात् । परतन्त्राणि भूतेन्द्रियमनांसि धारणप्रेरणव्यूहनक्रियासु प्रय- त्नवशात् प्रवर्तन्ते, चैतन्ये पुनः स्वतन्त्राणि स्युरिति । इसी प्रकार, आत्मास्तित्वसाधक तथा आत्मनित्यत्वसाधक हेतुओं से भी भूतचैतन्य का प्रतिषेध समझना चाहिये । 'इन्द्रिय-अर्थ को बुद्धि नहीं कह सकते; क्योंकि उनके विनाश पर भी ज्ञानस्थिति देखी जाती है' ( ३.२.१८ ) — यह प्रतिषेध भी भूतचैतन्या- भाव का ही समर्थन करता है। क्रिया तथा क्रियोपरममात्र को आरम्भ-निवृत्ति समझ कर पूर्वपक्षी ने कह दिया था कि 'तल्लिङ्ग होने से इच्छाद्वेष का पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा हमारे मत में हितप्राप्ति तथा अहितपरिहार के लिये चेष्टा ( प्रयत्न ) विशेष आरम्भ-निवृत्ति कहलाते हैं। इस लक्षणवाले आरम्भ तथा निवृत्ति भूतों में दिखायी नहीं देते । अतः यह कहना असमीचीन ही है कि 'तल्लिङ्ग होने से पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ॥ ३७ ॥ बुद्धि के आश्रितत्व के वारे में भूत, इन्द्रिय तथा मन का प्रतिषेध समान ही है; मन तो एक उदाहरणमात्र है । यथोक्त हेतुओं से, पारतन्त्र्य से, तथा अकृताभ्यागम दोष से बुद्धि मन का ( गुण नहीं हो सकती ) ॥ ३८ ॥ 'यथोक्त' का तात्पर्य 'इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख, ज्ञान को ही आत्मा का हेतु समझें' ( १. १. १० ) इत्यादि सूत्र से है। उक्त हेतुओं से भूत, इन्द्रिय, तथा मन का चैतन्य प्रतिषिद्ध समझना चाहिए । पारतन्त्र्य हेतु से भी इनमें चैतन्य का प्रतिषेध समझें । भूत, इन्द्रिय तथा मन परतन्त्र हैं, वे किसी अन्य के प्रयत्न से धारण, प्रेरण तथा व्यूहन ( संग्रह ) क्रियाओं में प्रवृत्त होते हैं। इनको चैतन्य मानने पर ये स्वतन्त्र होने लगेंगे ।