न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० अकृताभ्यागमाच्च । 'प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः' (१.१.१७) इति चैतन्ये भूतेन्द्रियमनसां परकृतं कर्म पुरुषेणोपभुज्यत इति स्यात् । अचैतन्ये तु तत्सा- धनस्य स्वकृतकर्मफलोपभोगः पुरुषस्येत्युपपद्यत इति ॥ ३८ ॥ अथायं सिद्धोपसङ्ग्रहः— परिशेषाद्यथोक्तहेतूपपत्तेश्च ॥ ३९ ॥ आत्मगुणो ज्ञानमिति प्रकृतम् । परिशेषो नाम 'प्रसक्तप्रतिषेधे अन्यत्रा- प्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः' ( १.१.५ सू० भा० ) । भूतेन्द्रियमनसां प्रतिषेधे द्रव्यान्तरं न प्रसज्यते, शिष्यते चात्मा, तस्य गुणो ज्ञानमिति ज्ञायते । यथोक्तहेतूपपत्तेश्चेति । 'दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्' (३.१.१) इत्ये- वमादीनामात्मप्रतिपत्तिहेतूनामप्रतिषेधादिति । परिशेषज्ञापनार्थं प्रकृतस्थापनादिज्ञानार्थं च यथोक्तहेतूपपत्तिवचनमिति । अकृताभ्यागम दोष से भी बुद्धि मन का गुण नहीं है । "वाणी, बुद्धि तथा शरीर से किये जाने वाले कार्यों का आरम्भ 'प्रवृत्ति' कहलाता है" (१. १. १७) यह पहले कह आये हैं, इस स्थिति में शरीरादि को चैतन्य मानने पर चेतन के स्वतन्त्र होने से वे ही कर्ता हो जायेंगे, तब शरीरनाश के बाद परलोक का फलभोग कैसे सम्भव होगा ! अन्यथा दूसरे के कर्म का दूसरा उपभोग करेगा । शरीरादि को अचेतन मानने पर स्वकृत कर्म का फलभोग पुरुष (आत्मा) को उपपन्न होगा, क्योंकि वह नित्य है ॥ ३८ ॥ अब इस समग्र प्रकरण का उपसंहार यह है— परिशेष से तथा यथोक्त हेतुओं द्वारा उपपादन से ॥ ३९ ॥ ज्ञान आत्मा का ही गुण है । 'परिशेष' से तात्पर्य है 'प्रसक्त का निषेध कर दिये जाने पर, अन्यत्र प्रसङ्ग प्राप्त न होने से अवशिष्ट को मान लेना' । यहाँ साधक हेतुओं से भूत, इन्द्रिय तथा मन का बुद्धिगुणत्व प्रतिषिद्ध कर दिया गया, तब द्रव्यान्तर में यह गुण प्रसक्त नहीं हो सकता, अब बाकी बच गया—आत्मा, अतः यह सिद्ध हुआ कि बुद्धि आत्मा का ही गुण है । यथोक्त हेतुओं के उपपादन से भी । 'दर्शन स्पर्शन द्वारा एक ही अर्थ के ग्रहण से' (३. १. १) इत्यादि आत्मप्रतिपादक हेतुओं के, प्रतिपक्षियों द्वारा खण्डित न किये जाने से भी बुद्धि आत्मा का गुण सिद्ध होती है । अथवा—परिशेष-ज्ञापन कराने के लिए सूत्र में 'यथोक्तहेतु' शब्द का प्रयोग है । अर्थात् तृतीयाध्याय-प्रथमाह्निकरोक्त हेतु आत्मा के साधक हैं । अथ च प्रकृत (बुद्धि का आत्मगुणत्व) स्थापनादिज्ञान के लिये 'उपपत्ति' शब्द का प्रयोग है, अर्थात् बुद्धि को आत्मगुण मानने में भी वे हेतु खण्डित नहीं होते । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri