न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २५१ तेषु वस्तुषु स्मर्तव्यानामुपनिःक्षेपो निबन्ध इति। अभ्यासस्तु समाने विषये ज्ञाना- नामभ्यावृत्तिः, अभ्यासजनितः संस्कार आत्मगुणोऽभ्यासशब्देनोच्यते, स च स्मृति- हेतुः समान इति । लिङ्गं पुनः संयोगि समवाय्येकार्थसमवायि विरोधि चेति । यथा—धूमोऽग्नेः, गोर्विषाणम्, पाणिः पादस्य, रूपं स्पर्शस्य, अभूतं भूतस्येति । लक्षणं पश्ववयवस्थं गोत्रस्य स्मृतिहेतुः—विदानामिदम्, गर्गाणामिदमिति । सादृश्यं चित्रगतं प्रतिरूपकं देवदत्तस्येत्येवमादि । परिग्रहात्—स्वेन वा स्वामी, स्वामिना वा स्वं स्मर्यते । आश्रयाद्—ग्रामण्या तदधीनं संस्मरति । आश्रितात्- तदधीनेन ग्रामण्यमिति । सम्बन्धात्—अन्तेवासिना युक्तं गुरुं स्मरति, ऋत्विजा याज्यमिति । आनन्तर्यादिति करणीयेष्वर्थेषु । वियोगाद्—येन विप्रयुज्यते तद्वियोगप्रतिसंवेदी भृशं स्मरति । एककार्यात्—कर्त्रन्तरदर्शनात् कर्त्रन्तरे स्मृतिः । विरोधात्—विजिगीषमाणयोरन्यतरदर्शनादन्यतरः स्मर्यते । अतिश- याद्—येनातिशय उत्पादितः । प्राप्तेः—यतोऽनेन किञ्चित्प्राप्तमाप्तव्यं वा भवति तमभीक्ष्णं स्मरति। व्यवधानात्—कोशादिभिरसिप्रभृतीनि स्मर्यन्ते, सुखदुःखाभ्यां तद्धेतुः स्मर्यते । इच्छाद्वेषाभ्यां यमिच्छति यं च द्वेष्टि तं स्मरति । भयाद्—यतो बिभेति । अर्थित्वाद्—येनार्थी भोजनेनाच्छादनेन वा । क्रिया—रथेन रथकारं वह स्मृतिहेतु होता है । समान विषयों में ज्ञान को वार वार दुहराने को 'अभ्यास' कहते हैं। अभ्यासजनित संस्कार जो कि आत्मगुण है, 'अभ्यास' कहलाता है । वह भी स्मृति- हेतु है। 'लिङ्ग' कहते हैं—संयोगिद्रव्य या समवायी या एक अर्थ में समवेत होता हो, या विरोधी हो । क्रमशः उदाहरण, जैसे—धूम अग्नि का लिङ्ग है, शृंग गौ का, हाथ पैर का या रूप स्पर्श का, तथा अभूत भूत का । 'लक्षण' पश्ववयवस्थ गोत्र (वंश) की स्मृति का हेतु होता है, जैसे 'यह विदों का' 'यह गर्गों का' । 'सादृश्य'—जैसे देवदत्त की चित्रगत प्रति- कृति । 'परिग्रह' स्मृति कहलाता है, जैसे—स्व से स्वामी का, या स्वामी से स्वस्मरण । 'आश्रय' से—ग्रामनेता से उसके अधीन का स्मरण । 'आश्रित' से—उसके अधीन से ग्रामनेता का स्मरण । 'सम्बन्ध' से—अन्तेवासी ( छात्र ) से युक्त गुरु का, या ऋत्विज् से याज्य का स्मरण । 'आनन्तर्य' से भी कर्तव्यविषयक स्मरण होता है । 'वियोग' से—जिससे वियुक्त हुआ जाता है, वह वियोगप्रतिसंवेदी अत्यधिक याद आता है । 'एककार्य' से—अन्यकर्ता के दर्शन से अन्यकर्ता की स्मृति होती है । 'विरोध' से—विजय के इच्छुक किन्हीं दो में एक को देखकर दूसरे का स्मरण । 'अतिशय' से—जिसके द्वारा अतिशय उत्पन्न किया गया हो । 'प्राप्ति' से—जिसको जिससे कुछ प्राप्त हो या प्राप्त करना हो वह उसे हमेशा याद करता है। 'व्यवधान' से—जैसे म्यान से तलवार का याद आना या सुख- दुःख से उसके हेतु का स्मरण होना । 'इच्छा' या 'द्वेष' से—जिसकी इच्छा करता है या जिससे द्वेष करता है, उसे हमेशा याद रखता है । 'भय' से—जिससे डरता हो वह भी स्मृत रहता है । 'अर्थित्व' से—जिसकी चाह हो भोजन या वस्त्र से, वह भी हमेशा याद