भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२५२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० स्मरति । रागाद्—यस्यां स्त्रियां रक्तो भवति तामभीक्ष्णं स्मरति । धर्मात्— जात्यन्तरस्मरणमिह चाधीतश्रुतावधारणमिति । अधर्मात्—प्रागनुभूतदुःख- साधनं स्मरति । न चैतेषु निमित्तेषु युगपत्संवेदनानि भवन्तीति युगपदस्मरण- मिति । निदर्शनं चेदं स्मृतिहेतूनाम्, न परिसंख्यानमिति ॥ ४१ ॥ बुद्धेरुत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ४२-४५ ] अनित्यायां च बुद्धौ उत्पन्नापवर्गित्वात् कालान्तरावस्थानाच्चानित्यानां संशयः—किमुत्पन्नापवर्गािणी बुद्धिः शब्दवत् ? आहोस्वित् कालान्तरावस्थायिनी कुम्भवदिति ? उत्पन्नापवर्गािणीति पक्षः परिगृह्यते । कस्मात् ?— कर्मानवस्थाथिग्रहणात् ॥ ४२ ॥ कर्मणोऽनवस्थायिनो ग्रहणादिति । क्षिप्तस्येषोरापतनात् क्रियासन्तानो गृह्यते, प्रत्यर्थनियमाच्च बुद्धीनां क्रियासन्तानवद् बुद्धिसन्तानोपपत्तिरिति । अवस्थित- ग्रहणे च व्यवधीयमानस्य प्रत्यक्षनिवृत्तेः । अवस्थिते च कुम्भे गृह्यमाणे सन्तानेनैव बुद्धिर्वर्त्तते प्राग् व्यवधानात्, तेन व्यवहिते प्रत्यक्षं ज्ञानं निवर्त्तते । रहता है । 'क्रिया' से—रथ को देखकर उसके निर्माता रथकार का स्मरण । 'राग' से— जैसे जिस स्त्री में जिसका राग हो वह उस स्त्री को हमेशा याद रखता है । 'धर्म से'— जैसे इस जन्म में जात्यन्तर का स्मरण या अधिक श्रुत का अवधारण होता है । 'अधर्म से'—जैसे पहले अनुभव किये दुःख के कारणों को स्मरण करता है । इन हेतुओं के रहने में युगपत्संवेदन नहीं होता, अतः स्मृति युगपत् नहीं हो सकती । स्मृति हेतुओं का यह निदर्शनमात्र है, परिगणन नहीं । अतः उन्मादादि लोकसिद्ध अन्य हेतुओं का भी यहां ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ ४१ ॥ अनित्य बुद्धि में उत्पन्नविनाशित्व होने से तथा साथ ही कालान्तरावस्थिति से अनित्यों में संशय होता है कि क्या यह बुद्धि शब्द की तरह उत्पन्नविनाशी है, या कुम्भ की तरह कालान्तरावस्थायी है ? । पहले उत्पन्नविनाशी पक्ष पर विचार करते हैं; क्योंकि— अनवस्थाथी कर्म का ग्रहण होता है ॥ ४२ ॥ जैसे—फेंके गये तीर की भूमिपतनावधिपर्यन्त क्रिया की अनेक धाराएँ गृहीत होती हैं, उसी तरह बुद्धि भी, प्रत्यर्थनियत (अर्थ रहने तक) होने से अनेक क्रियाओं की तरह उपपन्न होती है । अतः यह आशुतरविनाशिनी है । अवस्थित घटादि के ग्रहण में तो यह प्रक्रिया है कि जब तक कोई व्यवधान न आ जाये तब तक वे उपस्थित रहते हैं, जब कोई व्यवधान आ जाता है तो उनका प्रत्यक्ष निवृत्त हो जाता है । बुद्धि तो सन्तत धारा