भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० आत्मप्रत्यक्षत्वात् । अथापि दृष्टश्रुतानर्थान् चिन्तयतः क्रमेण बुद्धयो वर्त्तन्ते, न युगपत्-अनेनानुमातव्यमिति । वर्णपदवाक्यबुद्धीनां तदर्थबुद्धीनां चाशुवृत्ति- त्वात्क्रमस्याग्रहणम् । कथम् ? वाक्यस्थेषु खलु वर्णेषूच्चरत्सु प्रतिवर्णं तावच्छ्रवणं भवति, श्रुतं वर्णमेकमनेकं वा पदभावेन प्रतिसन्धत्ते, प्रतिसन्धाय पदं व्यवस्यति, पदव्यवसायेन स्मृत्या पदार्थं प्रतिपद्यते, पदसमूहप्रतिसन्धानाच्च वाक्यं व्यवस्यति, सम्बद्धांश्च पदार्थान् गृहीत्वा वाक्यार्थं प्रतिपद्यते । न चासां क्रमेण वर्त्तमानानां बुद्धीनामाशुवृत्तित्वात् क्रमो गृह्यते, तदेतदनुमानमन्यत्र बुद्धिक्रिया- यौगपद्याभिमानस्येति । न चास्ति मुक्तसंशया युगपदुत्पत्तिर्बुद्धीनाम्, यया मनसां बहुत्वमेक- शरीरेऽनुमीयेत इति ॥ ५८ ॥ यथोक्तहेतुत्वाच्चाणु ॥ ५९ ॥ अणु मन एकं चेति धर्मसमुच्चयः; ज्ञानायौगपद्यात् । महत्त्वे मनसः सर्वे- न्द्रियसंयोगाद् युगपद्विषयग्रहणं स्यादिति ॥ ५९ ॥ अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ ६०-७२ ] मनसः खलु भोः ! सेन्द्रियस्य शरीरे वृत्तिलाभः, नान्यत्र शरीरात् । ज्ञातुश्च बात और-दृष्ट या श्रुत अर्थों को विचारती हुई बुद्धि क्रम से ही प्रवृत्त होती है, एक साथ सर्वत्र नहीं, इससे अनुमान होता है कि ज्ञान क्रमिक होते हैं । वर्ण, पद, तथा वाक्य और उनके अर्थ ज्ञानों के क्रम का ग्रहण उनमें आशुवृत्तित्व होने से नहीं हो पाता । कैसे ? वाक्यस्थ वर्णों के उच्चारण करने पर प्रत्येक वर्ण का श्रवण होता है, सुना गया एक या अनेक वर्ण पदरूप से जोड़ा जाता है, जोड़ कर उसे पदरूप से समझा जाता है। पदरूप से समझकर अर्थ की स्मृति से उस पाद का अर्थ समझा जाता है; इसी तरह पदसमूह को याद कर उन्हें वाक्यरूप में समझा जाता है। पदों के सम्बद्ध रूप में अर्थ को याद कर वाक्यार्थ समझा जाता है। इन सभी क्रियाओं तथा बुद्धियों में, अतिशीघ्रता हो जाने से क्रम गृहीत नहीं हो पाता । वस्तुतः हैं तो ये सब क्रमिक ही। इसी तरह अन्यत्र भी क्रिया के बुद्धिगत यौगपद्य-भ्रम के बारे में समझ लें । वस्तुतः उभयवादिसम्मत ज्ञानों की ऐसी कोई संशयरहित युगपद् उत्पत्ति नहीं है, जिससे एक शरीर में मन का अनेकत्व अनुभूत हो सके ॥ ५८ ॥ यथोक्त (ज्ञानायौगपद्य ) हेतु से मन का अणुत्व भी सिद्ध होता है ॥ ५९ ॥ 'मन अणु है तथा एक है' यह धर्मसमुच्चय भी तभी सिद्ध होता है जब हम ज्ञानायौग- पद्य सिद्धान्त मानते हैं । अन्यथा मन के 'महत्' होने पर इसका एक ही समय में अनेक इन्द्रियों के साथ संयोग होकर अनेक ज्ञान उत्पन्न होने लगेंगे । होते हैं नहीं; अतः सिद्ध है कि मन अणु तथा एक है ॥ ५९ ॥ इन्द्रियसहित मन का शरीर में ही रहना मिलता है, शरीर से अन्यत्र नहीं । ज्ञाता