न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें६०. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६३ पुरुषस्य शरीरायतना बुद्ध्यादयो विषयोपभोगो जिहासितहानमीप्सितावाप्तिश्च, सर्वे च शरीराश्रया व्यवहाराः । तत्र खलु विप्रतिपत्तेः संशयः—किमयं पुरुष- कर्मनिमित्तः शरीरसर्गः ? आहोस्विद् भूतमात्रादकर्मनिमित्त इति ?—श्रूयते खल्वत्र विप्रतिपत्तिरिति । तत्रेदं तत्त्वम्— पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः ॥ ६० ॥ पूर्वशरीरे या प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भलक्षणा तत्पूर्वकं कर्मोक्तम्, तस्य फलं तज्जनितौ धर्माधर्मौ, तत्फलस्यानुबन्ध आत्मसमवेतस्यावस्थानम्, तेन प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यस्तस्योत्पत्तिः शरीरस्य, न स्वतन्त्रेभ्य इति । यदधिष्ठानोऽय- मात्मा—'अयमहम्' इति मन्यमानो यत्राभियुक्तो यत्रोपभोगतृष्णया विषयमनुप- लभमानो धर्माधर्मौ संस्करोति तदस्य शरीरम् । तेन संस्कारेण धर्माधर्मलक्षणेन भूतसहितेन पतितेऽस्मिन् शरीरे उत्तरं निष्पद्यते, निष्पन्नस्य चास्य पूर्वशरीर- वत् पुरुषार्थक्रिया, पुरुषस्य च पूर्वशरीरवत् प्रवृत्तिरिति कर्मापेक्षेभ्यो भूतेभ्यः शरीरसर्गे सत्येतदुपपद्यते इति । दृष्टा च पुरुषगुणेन प्रयत्नेन प्रयुक्तेभ्यो भूतेभ्यः पुरुषार्थक्रियासमर्थानां द्रव्याणां रथप्रभृतीनामुत्पत्तिः । तयाऽनुमातव्यम्— पुरुष के बुद्ध्यादि गुण, विषयोपभोग—हेय का त्याग और ईप्सित की प्राप्ति—आदि सभी व्यवहार शरीर का ही आश्रय लिये हुए हैं। यहाँ विप्रतिपत्ति होने पर संशय होता है कि क्या यह शरीर पुरुषकर्मनिमित्तक है ? या विना किसी कर्मनिमित्त से भूतों के सम- वाय से हो जाता है ? यहाँ यह विप्रतिपत्ति सुनायी देती है । यद्यपि वास्तविकता यह है— पूर्वजन्मकृत फलानुबन्ध से शरीर की उत्पत्ति होती है ॥ ६० ॥ पूर्व जन्म में शरीर, वाणी या बुद्धि द्वारा किये गये कार्य पूर्वकृत कर्म कहलाते हैं। उससे उत्पन्न हुए धर्म तथा अधर्म उसके फल हैं। उस फल का अनुबन्ध जीव का आत्मा में रहना है। उस अनुबन्ध से प्रयुक्त भूतों द्वारा ही उस जीव की शरीरोत्पत्ति होती है; न कि स्वतन्त्रतया भूतों से । जिसका सहारा लेकर यह आत्मा 'यह मैं हूँ'—ऐसा मानता हुआ सम्बद्ध हो, विषयोपभोग की कामना से विषयों को चाहता हुआ विषयों की उपलब्धि नहीं करता हुआ धर्म तथा अधर्म का संस्कार करता है, स्थिर बनाये रखता है वह 'शरीर' है । इस शरीर के विनष्ट होने पर भूतसहित धर्माधर्मलक्षणक उस संस्कार से दूसरा शरीर बनता है। बनने पर इस दूसरे शरीर की भी पहले की तरह पुरुषार्थ-क्रियाएँ प्रारम्भ होती हैं। पुरुष ( आत्मा ) की भी पहले की तरह प्रवृत्ति होने लगती है। ये उपर्युक्त सब बातें कर्म की अपेक्षा रखनेवाले भूतों से शरीर-सृष्टि होने से ही उपपन्न हो पाती हैं। लोक में भी पुरुषसम्बन्धी प्रयत्न द्वारा प्रयुक्त भूतों से