भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२६४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० शरीरमपि पुरुषार्थक्रियासमर्थमुत्पद्यमानम् पुरुषस्य गुणान्तरापेक्षेभ्यो भूतेभ्य उत्पद्यत इति ॥ ६० ॥ अत्र नास्तिक आह— भूतेभ्यो मूर्त्युपादानवत् तदुपादानम् ? ॥ ६१ ॥ यथा कर्मनिरपेक्षेभ्यो भूतेभ्यो निर्वृत्ता मूर्तयः सिकताशर्करापाषाणगैरिका- ञ्जनप्रभृतयः पुरुषार्थकारित्वादुपादीयन्ते, तथा कर्मनिरपेक्षेभ्यो भूतेभ्यः शरीरमुत्पन्नं पुरुषार्थकारित्वादुपादीयते इति ? ॥ ६१ ॥ न; साध्यसमत्वात् ॥ ६२ ॥ यथा शरीरोत्पत्तिरकर्मनिमित्ता साध्या, तथा सिकताशर्करापाषाणगैरिका- ञ्जनप्रभृतीनामप्यकर्मनिमित्तः सर्गः साध्यः । साध्यसमत्वादसाधनमिति । 'भूतेभ्यो मूर्त्युत्पादनवत्' इति चानेन साध्यम् ॥ ६२ ॥ न; उत्पत्तिनिमित्तत्वान्मातापित्रोः ॥ ६३ ॥ विषमश्चायमुपन्यासः । कस्मात् ? निर्बीजा इमा मूर्तय उत्पद्यन्ते, बीजपू- र्विका तु शरीरोत्पत्तिः । मातापितृशब्देन लोहितरेतसी बीजभूते गृह्येते । तत्र पुरुषार्थक्रियासमर्थ रथ-आदि द्रव्यों की उत्पत्ति देखी जाती है । उससे अनुमान करना चाहिये कि शरीर भी पुरुषार्थक्रियासमर्थ उत्पन्न होता हुआ पुरुष के (धर्माधर्म) गुणान्तरापेक्ष भूतों से उत्पन्न होता है ॥ ६० ॥ तथापि यहाँ पुनर्जन्म न माननेवाला नास्तिक (चार्वाक) कहता है— भूतों से अन्यद्रव्योत्पत्ति की तरह शरीरोत्पत्ति होती है ॥ ६१ ॥ जैसे लोक में कर्मनिरपेक्ष भूतों द्वारा निर्मित, मिट्टी, धूल, पत्थर, गेरु, अञ्जन आदि द्रव्य उपभोग साधन होने से प्राप्त किये जाते मिलते हैं; उनमें अदृष्ट सहायक नहीं होता; उसी तरह यह शरीर भी भूतों से उत्पन्न हुआ पुरुषार्थ-साधन होने से उपा- देय है, इसमें कर्म (अदृष्ट) की क्या अपेक्षा है ? इस हेतु के साध्यसम होने से (आप ऐसा) नहीं (कह सकते) ॥ ६१ ॥ जैसे आपको 'अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति' सिद्ध करनी है, उसी तरह 'उक्त सिक- तादि द्रव्यों की सृष्टि भी अकर्मनिमित्तक हैं'—यह भी आपको सिद्ध करना पड़ेगा; अतः इस हेतु के साध्यसम होने से यह हेत्वाभास है, अतः इससे कोई अनुमान नहीं बन सकता ॥ ६२ ॥ अथवा, भूतों द्वारा सिकता-पाषाणादि के उत्पादन से इस शरीरोत्पत्ति की समानता नहीं है; क्योंकि इस में माता-पिता निमित्त हैं ॥ ६३ ॥ आपका सिकतापाषाणादि का दृष्टान्त प्रकृत से विरुद्ध है, क्योंकि उक्त सिकतादि द्रव्य निर्बीज उत्पन्न होते हैं और यह शरीरोत्पत्ति (माता-पिता के) बीज से होती है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri