भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६५. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६५ सत्त्वस्य गर्भवासानुभवनीयं कर्म, पित्रोश्च पुत्रफलानुभवनीये कर्मणो मातृ- गर्भाश्रये शरीरोत्पत्ति भूतेभ्यः प्रयोजयन्तीत्युपपन्नं बीजानुविधानमिति ॥ ६३ ॥ तथाऽऽहारस्य ॥ ६४ ॥ उत्पत्तिनिमित्तत्वादिति प्रकृतम् । भुक्तम् पीतम् = आहारः तस्य पक्तिनिर्वृत्तं रसद्रव्यम् मातृशरीरे चोपचिते बीजे गर्भाशयस्थे बीजसमानपाकम्, मात्रया चोपचयो बीजे यावद्व्यूहसमर्थं सञ्चयः इति । सञ्चितं चार्वुदमांसपेशी- कललकण्डरशिरःपाण्यादिना च व्यूहेनेन्द्रियाधिष्ठानभेदेन व्यूह्यते, व्यूहे च गर्भ- नाड्यावतारितं रसद्रव्यमुपचीयते यावत्प्रसवसमर्थमिति । न चायमन्नपानस्य स्थाल्यादिगतस्य कल्पत इति । एतस्मात् कारणात् कर्मनिमित्तत्वं शरीरस्य विज्ञायते इति ॥ ६४ ॥ प्राप्तौ चानियमात् ॥ ६५ ॥ न सर्वो दम्पत्योः संयोगो गर्भाधानहेतुर्दृश्यते । तत्रासति कर्मणि न भवति, 'मातापितृ'-शब्द से उनके रजःशुक्र बीजरूप में गृहीत होते हैं । उनमें से प्राणी को गर्भ- वास के दुःखादि अनुभावक कर्म के अनुरूप भोगने पड़ते हैं तथा माता-पिता को पुत्र- जन्म-सुखादि के अनुभावक कर्म होते हैं । इस प्रकार ये सब कर्म मिलकर माता के गर्भाशय में शरीरोत्पाद को भूतों के सहारे प्रयुक्त करते हैं—यों बीज शरीरोत्पत्ति में साक्षात्कारण सिद्ध हो गया ॥ ६३ ॥ तथा आहार के ॥ ६४ ॥ शरीरोत्पत्तिनिमित्तक होने से यह शरीरोत्पाद निर्निमित्तक नहीं हैं । खाया पीया हुआ अन्न-जल 'आहार' कहलाता है । उस आहार के पाक से बना रसद्रव्य मातृ-शरीर में उपचित गर्भाशयस्थ बीज में सम्मिलित होकर उसके तुल्य पाकवाला हो जाता है, वह उस बीज में इतनी मात्रा में सम्मिलित होता है कि गर्भ की आकृति बन जाये । सम्मि- लित हुआ वह रस अर्बुद, मांसपेशी, कलल, कण्डरा (स्नायु), सिर, हाथ-पैर आदि आकारों द्वारा इन्द्रियाधिष्ठान-भेद से अवयवी बनता जाता है । और गर्भनाडी से पहुँचा हुआ रस उस आकार में उपचित होता रहता है जब तक कि प्रसव न हो जाये । यह इतनी लम्बी-चौड़ी सूक्ष्म प्रक्रिया स्थाल्यादिगत अन्नपान ( आहार ) के बारे में कल्पित नहीं की जा सकती । इस कारण, 'शरीर कर्मनिमित्त है'—ऐसा समझा जाता है ॥ ६४ ॥ दम्पति-संयोग में नियम न होने से भी ॥ ६५ ॥ लोक में सभी स्त्री-पुरुषों का संयोग गर्भस्थिति का हेतु नहीं देखा जाता । वैसा (गर्भस्थित्यनुकूल) अदृष्ट कर्म न रहने से गर्भस्थिति नहीं होती, अनुकूल अदृष्ट होने से गर्भस्थिति हो जाती है । इस रीति से नियमाभाव उपपन्न नहीं हुआ । कर्मनिरपेक्ष भूतों को शरीरोत्पत्तिहेतु मानने पर नियम बन जायेगा कि सभी स्त्री-पुरुषों का संयोग शरीरो-

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