न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० सति च भवतीत्यनुपपन्नो नियमाभाव इति, कर्मनिरपेक्षेषु भूतेषु शरीरोत्पत्ति- हेतुषु नियमः स्यात् । न ह्यत्र कारणाभाव इति ॥ ६५ ॥ अथापि— शरीरोत्पत्तिनिमित्तवत् संयोगोत्पत्तिनिमित्तं कर्म ॥ ६६ ॥ यथा खल्विदं शरीरं धातुप्राणसंवाहिनीनां नाडीनां शुक्रान्तानां धातु- नां च स्नायुत्वगस्थिशिरापेशीकललकण्डराणां च शिरोबाहूदराणां सक्थ्नां च कोष्ठगानां वातपित्तकफानां च मुखकण्ठहृदयामाशयपक्वाशायाधःस्रोतसां च परम- दुःखसम्पादनीयेन सन्निवेशेन व्यूहनमशक्यं पृथिव्यादिभिः कर्मनिरपेक्षैरुत्पाद- यितुमिति 'कर्मनिमित्ता शरीरोत्पत्तिः' इति विज्ञायते । एवं च प्रत्यात्मनियतस्य निमित्तस्याभावान्निरतिशयैरात्मभिः सम्बन्धात् सर्वात्मनां च समानः पृथिव्यादिभिरुत्पादितं शरीरम्, पृथिव्यादिगतस्य च नियम- हेतोरभावात् सर्वात्मना सुख-दुःखसंवित्त्यायतनं समानं प्राप्तम् ? यत्तु प्रत्यात्मं व्यवतिष्ठते, तत्र शरीरोत्पत्तिनिमित्तं कर्म व्यवस्थाहेतुरिति विज्ञायते । परिपच्यमानो हि प्रत्यात्मनियतः कर्माशयो यस्मिन्नात्मनि वर्तते त्पत्ति कर सकेगा; क्योंकि इस नियम के न बनने में कोई विरोधी कारण आप नहीं दिखा सकते। हमारे मत में तो अदृष्ट कर्म विरोधी कारण है ॥ ६५ ॥ एक बात और— वह अदृष्टकर्म शरीरोत्पत्तिनिमित्त की तरह संयोगोत्पत्ति का भी निमित्त है ॥ ६६ ॥ जैसे यह सूक्ष्मावयवारब्ध शरीर बना हुआ है, जिसमें कि स्थूलसूक्ष्म धातु तथा प्राणवाही नाडियों, शुक्रपर्यन्त सात धातुओं, स्नायु-त्वक्-अस्थि-शिरा-पेशी-कलल-कण्ड- राओं, शिर-बाहु-उदर, जाँघ, कोष्ठगत वात-पित्त-कफ, मुख-कण्ठ-हृदय-आमाशय-पक्वा- शय-अधःस्रोतों ( मलमूत्रेन्द्रियों ) को यथास्थान एकत्र कर उन्हें आकार देना अतीव कष्टसाध्य है, अतएव कर्मनिरपेक्ष पृथिवी-आदि जड़ महाभूतों द्वारा ऐसा उत्पाद होना अशक्य ही है, अतः 'शरीरोत्पत्ति कर्मनिमित्तक ही है'—ऐसा समझ में आता है । शङ्का—इस तरह प्रत्यात्मनियत किसी निमित्त के अभाव होने से समानतया स्थित सभी जीवात्माओं से सम्बन्ध होने के कारण सभी आत्माओं के लिये पृथिवी-आदि से उत्पादित यह शरीर समान है और पृथिव्यादि में भी कोई व्यावर्तक हेतु न होने से सभी आत्माओं के सभी शरीर होने से सुख-दुःखसंवित्ति का समान रूप से अधिष्ठान होने लगेगा ? उत्तर—'एक आत्मा का एक शरीर अधिष्ठान है—इस व्यवस्था में शरीरोत्पत्ति- निमित्तक कर्म हेतु हैं'—ऐसा समझा जाता है । परिपाक को प्राप्त हुआ प्रत्यात्मनियत कर्माशय जिस आत्मा में रहता है, उसी के लिये एक उपभोगाधिष्ठान शरीर उत्पन्न कर उसी शरीर के साथ उस आत्मा के संयोग को उपभोग का साधन बनाता है। इस प्रकार