न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें६७. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २६७ तस्यैवोपभोगायतनं शरीरमुत्पाद्य व्यवस्थापयति । तदेवम् ‘शरीरोत्पत्तिनिमित्त- वत्संयोगनिमित्तं कर्म' इति विज्ञायते । प्रत्यात्मव्यवस्थानं तु शरीरस्यात्मना संयोगं प्रचक्ष्महे इति ॥ ६६ ॥ एतेनानियमः प्रत्युक्तः ॥ ६७ ॥ योऽयमकर्मनिमित्ते शरीरसर्गे सत्यनियम इत्युच्यते, अयं शरीरोत्पत्ति- निमित्तवत् संयोगोत्पत्तिनिमित्तं कर्मेत्यनेनानियमः प्रत्युक्तः । कस्तावदयं नियमः ? यथैकस्यात्मनः शरीरं तथा सर्वेषामिति नियमः । अन्यस्यान्यथा, अन्यस्यान्यथेत्यनियमो भेदो व्यावृत्तिर्विशेष इति । दृष्टा च जन्मव्यावृत्तिः-उच्चा- भिजनो निकृष्टाभिजन इति, प्रशस्तं निन्दितमिति, व्याधिबहुलमरोगमिति, समग्रं विकलमिति, पीडाबहुल सुखबहुलमिति, पुरुषातिशयलक्षणोपपन्नं विप- रीतमिति, प्रशस्तलक्षणं निन्दितलक्षणमिति, पट्विन्द्रियं मृद्विन्द्रियमिति । सूक्ष्मश्च भेदोऽपरिमेयः । सोऽयं जन्मभेदः प्रत्यात्मनियतात् कर्मभेदादुपपद्यते । असति कर्मभेदे प्रत्यात्म- नियते निरतिशयित्वादात्मनां समानत्वाच्च पृथिव्यादिगतस्य नियमहेतोरभावात् जैसे वह अदृष्ट शरीरोत्पत्ति में निमित्त है, उसी तरह उस आत्मा का उस शरीर से उपभोगक्षम सम्बन्ध कराने में भी वही निमित्त है, ऐसा समझ में आता है। 'प्रत्यात्म- व्यवस्था' का तात्पर्य हम 'उस शरीर से उसी आत्मा का संयोग' कहते हैं ॥ ६६ ॥ अब अकर्मनिमित्त शरीरोत्पत्तिरूप साङ्ख्यमत का खण्डन करते हैं- इस ( उपर्युक्त व्यवस्था ) से ( सांख्यसम्मत ) अनियमवाद का भी उत्तर दे दिया गया ॥ ६७ ॥ जो यह 'अकर्मनिमित्तक ही शरीरसृष्टि होती है, इसमें अनियम होगा'-ऐसा कहा था, वह भी प्रत्याख्यात हो गया । नियम क्या है ? 'एक आत्मा के शरीर की तरह सब आत्माओं को शरीर होता है'-यह नियम है । 'किसी की एक तरह और किसी की दूसरी तरह शरीरोत्पत्ति होती है' यह अनियम है । इसी को भेद, व्यावृत्ति या विशेष कह देते हैं । यह विशेषता लोक में देखी भी जाती है, जैसे-एक शरीर उच्च कुल में उत्पन्न होता है, दूसरा नीच कुल में; एक शरीर पूजित होता है, दूसरा निन्दित; एक शरीर सुन्दर, सभी अवयवों से सम्पन्न होता है, दूसरा बेडोल, टेढे-मेढे अवयवों वाला; एक शरीर सुख भोगनेवाला, दूसरा हमेशा दुःख के पालने में झूलनेवाला; एक शरीर सत्पुरुषों के लक्षणों से युक्त, दूसरा चोर डाकू-आदि परवञ्चक पुरुषों के चिह्नों से युक्त; एक सुलक्षण, दूसरा कुलक्षण; एक कार्यकुशल, दूसरा अकुशल-ये कुछ मोटे-मोटे भेद गिना दिये । सूक्ष्म भेद तो अपरिममेय तथा असंख्य हैं । यह उपर्युक्त जन्मभेद प्रत्यात्मनियत कर्मभेद से उपपन्न होता है । यदि प्रत्यात्मनियत कर्मभेद न मानोगे तो आत्माओं में समानता होने तथा पृथिवी- आदि के पृथिव्यादिगत नियमहेतु के अभाव से सभी आत्माओं को समान शरीर उत्पन्न