न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० शरीरोत्पत्ति समादधानस्याकृताभ्यागमप्रसङ्गः । अकृते सुखदुःखहेतौ कर्मणि पुरुषस्य सुखं दुःखमभ्यागच्छतीति प्रसज्येत । ओमिति ब्रुवतः प्रत्यक्षानुमाना- गमविरोधः । प्रत्यक्षविरोधस्तावद्—भिन्नमिदं सुखदुःखं प्रत्यात्मवेदनीयत्वात् प्रत्यक्षं सर्वशरीरिणाम् । को भेदः ? तीव्रं मन्दं चिरमाशु नानाप्रकारमेकप्रकार- मिति एवमादिर्विशेषः । न चास्ति प्रत्यात्मनियतः सुखदुःखहेतुविशेषः, न चासति हेतुविशेषे फलविशेषो दृश्यते । कर्मनिमित्ते तु सुखदुःखयोगे कर्मणां तीव्रमन्दतोपपत्तेः कर्मसञ्चयानां चोत्कर्षापकर्षभावान्नानाविधैकविधभावाच्च कर्मणां सुखदुःखभेदोपपत्तिः । सोऽयं हेतुभेदाभावाद् दृष्टः सुखदुःखभेदो न स्या- दिति प्रत्यक्षविरोधः ! तथाऽनुमानविरोधः—दृष्टं हि पुरुषगुणव्यवस्थानात् सुखदुःखव्यवस्थानम् । यः खलु चेतनावान् साधननिर्वर्तनीयं सुखं बुद्ध्वा तदीप्सन् साधनावाप्तये प्रयतते स सुखेन युज्यते, न विपरीतः । यश्च साधननिर्वर्तनीयं दुःखं बुद्ध्वा तज्जिहासुः साधनपरिवर्जनाय यतते स च दुःखेन त्यज्यते, न विपरीतः । अस्ति अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति माननेवाले को अकृताभ्यागम-प्रसङ्ग होगा; क्योंकि तब पुरुष सुख-दुःख कारणों वाले कर्म को न करने पर भी सुख-दुःख प्राप्त करने लगेगा । यदि यह अकृताभ्यागम स्वीकार करते हो तो आपके इस मत में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम— तीनों ही प्रमाणों से विरोध उपस्थित होगा । १. प्रत्यक्षप्रमाण-विरोध, जैसे—सभी प्राणियों के ये प्रत्यात्मवेदनीय सुख-दुःख प्रत्यक्षतः भिन्न-भिन्न देखे जाते है। भेद क्या है ? कोई सुख-दुःख तीव्र तथा कोई मन्द होता है, कोई चिरकाल तथा कोई अल्पकाल तक ठहरता है । यों, नाना प्रकार तथा एक प्रकार का देखा जाने से उसमें भेद ज्ञात होता है । परन्तु आपके मत में नियत सुख- दुःखहेतु विशेष नहीं दिखायी देता, हेतुविशेष के न रहने पर फलभेद भी नहीं होगा । कर्मनिमित्तक सुख-दुःखसम्बन्ध मानने पर, कर्मों की तीव्रता या मन्दता के उपपादन से या कर्म-सञ्चय के उत्कर्ष-अपकर्ष से उससे होने वाले सुख-दुःख में नानाप्रकारता तथा एकप्रकारता आ ही जायेंगी—अतः कर्मों से सुख-दुःख-भेद बन जायेगा । परन्तु आपके मत में हेतुभेद न होने से प्रत्यक्षदृष्ट सुख-दुःख-भेद उपपन्न न होगा—यह प्रत्यक्षप्रमाण से विरोध है ! २. अनुमानप्रमाण-विरोध, जैसे-पुरुषगुणानुरोध से सुख-दुःख की उत्पत्ति लोक में उपपन्न होती है । जो चेतन प्राणी साधन से उत्पादनीय सुख को प्रमाणों द्वारा जानकर उसको चाहता हुआ उक्त साधनप्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है तो वह सुखी होता है, दूसरा नहीं । और जो साधनों से उत्पादनीय दुःख को प्रमाणों द्वारा जानकर उसको छोड़ने की इच्छा करता हुआ उक्त साधननिवृत्ति के लिये प्रयत्न करता है तो वह दुःखों से