न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वप्रकरणम् २७३ चेदं यत्नमन्तरेण चेतनानां सुखदुःखव्यवस्थानम्, तेनापि चेतनगुणान्तरव्यव- स्थाकृतेन भवितव्यमित्यनुमानम् । तदेतदकर्मनिमित्ते सुखदुःखयोगे विरुध्यते इति । तच्च गुणान्तरमसंवेद्यत्वाददृष्टं विपाककालनियमाच्चाव्यवस्थितम् । बुद्ध्यादयस्तु संवेद्याश्चापवर्गिणश्चेति । अथागमविरोधः—बहु खल्विदमार्षमृषीणामुपदेशजातमनुष्ठानपरिवर्जना- श्रयमुपदेशफलं च । शरीरिणां वर्णाश्रमविभागेनानुष्ठानलक्षणा प्रवृत्तिः, परि- वर्जनलक्षणा निवृत्तिः । तच्चोभयमेतस्यां दृष्टौ, नास्ति कर्म सुचरितं दुश्चरितं वा, कर्मनिमित्तः पुरुषाणां सुखदुःखयोग इति विरुध्यते । सेयं पापिष्ठानां मिथ्यादृष्टिः—'अकर्मनिमित्ता शरीरसृष्टिः, अकर्मनिमित्तः सुखदुःखयोगः' इति ॥ ७२ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये तृतीयाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ❀ समाप्तश्चायं तृतीयोऽध्यायः ❀ छुटकारा पा जाता है, दूसरा नहीं पाता । हाँ, कभी-कभी प्रत्यक्षतः पुरुषप्रयत्न के बिना हो अतर्कित सुख-दुःख उपस्थित हो जाते हैं, इस प्रसङ्ग में यही अनुमान करना पड़ता है कि यह अतर्कित सुख-दुःख भी इस चेतन के किसी अन्य गुणविशेष के कारण उपपन्न हुआ है । यह अनुमान अकर्मनिमित्तक सृष्टि मानने पर नहीं बन सकता । यह अतर्कित सुखदुःखोत्पादक पुरुषगुणान्तर न प्रत्यक्ष है, न क्षणिक, अपितु बुद्ध्यादि पुरुषगुणों की तरह विलक्षण है; क्योंकि यह अदृष्ट गुणविशेष असंवेद्य है, परन्तु विपाककालनियम से बँधा हुआ नहीं है । जैसे बुद्ध्यादि मात्र संवेद्य भी हैं, तथा विनाशी भी ।- ३. आगमप्रमाण-विरोध, जैसे—यह हमारा साङ्गोपाङ्ग ऋषिप्रणीत धर्मशास्त्र, जिसमें ऋषियों के विधिनिषेधपरक उपदेश भरे पड़े हैं, तथा उन उपदेशों पर आचरण करने वालों के दृष्टान्त भी वर्णित हैं ! इन शास्त्रों में प्राणियों के लिये वर्णाश्रमभेद से विधिपरक प्रवृत्ति तथा निषेधपरक निवृत्ति दिखायी गयी हैं । यह प्रवृत्ति-निवृत्ति अकर्म- निमित्तक सृष्टि माननेवालों के मत में कैसे बनेगी; क्योंकि इनके मत में शुभाचरण या दुराचरण रूप कोई कर्म नहीं कि जिसका फल मिले, जब कि सुकर्म तथा निमित्त से ही सुख-दुःखोत्पत्ति होती हुई देखी जाती है । अतः 'शरीरोत्पत्ति अकर्मनिमित्तक है, सुख-दुःखसम्बन्ध भी अकर्मनिमित्तक है'— यह मिथ्यादृष्टि अतिशयेन पापपङ्कनिमग्न पुरुषों को ही हो सकती है, शास्त्रप्रमाणसम्पन्न आस्तिकजन तो समग्र सृष्टि को कर्मनिमित्तक ही मानते हैं, अतः उनके मत में कर्मों के क्षीण होने से अत्यन्तापवर्ग सम्पन्न होना उचित ही है ॥ ७२ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में तृतीय अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ तृतीय अध्याय भी समाप्त ❀ न्या० द० : १८