न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ १. आ० अस्ति मेऽध्यात्मं रागधर्म इति, विरागं च विजानाति-नास्ति मेऽध्यात्मं रागधर्म इति । एवमितरयोरपीति । मानेर्ष्यासूयाप्रभृतयस्तु त्रैराश्यमनुपतिता इति नोप- संख्यायन्ते ॥ ३ ॥ न; एकप्रत्यनीकभावात् ? ॥ ४॥ नार्थान्तरं रागादयः, कस्मात् ? एकप्रत्यनीकभावात् । तत्त्वज्ञानम् = सम्य- ङ्ग्मतिः, आर्यप्रज्ञा, सम्बोधः-इत्येकमिदं प्रत्यनीकं त्रयाणामिति ? ॥ ४ ॥ व्यभिचारादहेतुः ॥ ५ ॥ एकप्रत्यनीकाः पृथिव्यां श्यामादयोऽग्निसंयोगेनैकेन, एकयोनयश्च पाकजा इति ॥ ५ ॥ सति चार्थान्तरभावे— तेषां मोहः पापीयान्, नामूढस्येतरोत्पत्तेः ॥ ६ ॥ मोहः पापः, पापत्तरो वा द्वावभिप्रेत्योक्तम्, कस्मात् ? नामूढस्येतरोत्पत्तेः । अमूढस्य रागद्वेषौ नोत्पद्येते, मूढस्य तु यथासङ्कल्पमुत्पत्तिः । विषयेषु रञ्ज- उसके मन में रागधर्म उत्पन्न हो गया है। जब इसे वैराग्य होता है तब भी जानता है कि उसके मन में अब रागधर्म नहीं है। इसी तरह द्वेष तथा मोह के वारे में भी सम- झना चाहिये। मान, ईर्ष्या, तथा असूया-आदि इसी समूह में अन्तर्भूत हो जाते हैं— अतः उनकी पृथक् गणना नहीं की गयी ॥ ३ ॥ उनका एक ही विरोधी होने से अर्थभेद नहीं है ? ॥ ४ ॥ रागादि अर्थान्तर नहीं हैं; क्योंकि उनका एक ही विरोधी है। तत्त्वज्ञान अर्थात् यथार्थमति, आर्यप्रज्ञा या सम्यग्बोध—यह एक इन तीनों का ही विरोधी है ॥ ४ ॥ व्यभिचारी होने से उक्त हेतु नहीं बनता ॥ ५ ॥ एकप्रत्यनीकत्व हेतु व्यभिचारी है; क्योंकि एकप्रत्यनीकत्व से किसी का नानात्व नष्ट नहीं हुआ करता; जैसे—पृथिवी में श्यामादि गुण एक ही अग्निसंयोग से नष्ट हो जाते हैं, तो क्या उनमें नानात्व न माना जाये ! इसी तरह रूपादि गुण पाकरूपैककारणजन्य हैं, तो क्या उन सब में एकत्व मान लिया जाये ! ॥ ५ ॥ यों अर्थान्तर सिद्ध करने के बाद कहते हैं— उन तीनों में मोह अधिक अनर्थ की जड़ है; क्योंकि अमूढ को रागद्वेष नहीं हुआ करते ॥ ६ ॥ रागद्वेष की अपेक्षा से अतिशयबोधन के लिये मोह को पापतर कहा गया है; क्योंकि मोहरहित को रागद्वेष नहीं हुआ करते। मोहसम्पन्न को संकल्पानुसार रागद्वेष