भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१. सू० ] दोषत्रैराश्यप्रकरणम् २७७ नीयाः सङ्कल्पा रागहेतवः, कोपनीयाः सङ्कल्पा द्वेषहेतवः, उभये च सङ्कल्पा न मिथ्याप्रतिपत्तिलक्षणत्वान्मोहादन्ये, ताविमौ मोहयोनी रागद्वेषाविति । तत्त्वज्ञानाच्च मोहनि वृत्तौ रागद्वेषानुत्पत्तिरित्येकप्रत्यनीकाभावोपपत्तिः । एवं च कृत्वा तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्गः' ( १. १.. २ ) इति व्याख्यातमिति ॥ ६ ॥ प्राप्तस्तर्हि— निमित्तनैमित्तिकभावादर्थान्तरभावो दोषेभ्यः ? ॥ ७ ॥ अन्यद्धि निमित्तम्, अन्यच्च नैमित्तिकमिति दोषनिमित्तत्वाददोषो मोह इति ? ॥ ७ ॥ न; दोषलक्षणावरोधान्मोहस्य ॥ ८ ॥ 'प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः' ( १. १. १८ ) इत्यनेन दोषलक्षणेणावरुध्यते दोषेषु मोह इति ॥ ८ ॥ निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च तुल्यजातीयानामप्रतिषेधः ॥ ९ ॥ की उत्पत्ति हो जाती है । विषयों में रागविषयक सङ्कल्प रागहेतु हैं, कोपविषयक संकल्प द्वेष हेतु हैं । ये दोनों ही प्रकार के संकल्प मिथ्याज्ञानरूप होने से वस्तुतः मोह से अतिरिक्त नहीं हैं, अतः मोह के कारण ही ये रागद्वेष होते हैं । तत्त्वज्ञान से मोह निवृत्त होने पर रागद्वेष भी नहीं होते —यों एकविरोधिभाव भी बन जाता है । इसी अर्थ का समर्थक पूर्वसूत्र—तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों में से उत्तरोत्तर के नष्ट हो जाने पर उससे पीछे वाले के न होने से अपवर्ग हो जाता है' ( १. १. २) है, जिसकी विस्तृत व्याख्या पीछे यथास्थान की जा चुकी है ॥६॥ तब तो मोह का— निमित्त-नैमित्तिकभाव होने के कारण दोषों से अर्थान्तरत्व ॥ ७ ॥ प्राप्त हुआ ? 'कारण कार्य से भिन्न होता है' यह सभी मानते हैं । इस तरह मोह यदि दोषों का निमित्त कारण है तो वह उनसे भिन्न होगा, तब मोह में दोषत्व कैसे रहेगा ? ॥ ७ ॥ मोह के दोषलक्षणों में जकड़ा रहने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ८ ॥ 'दोष प्रवृत्ति के हेतु हैं' ( १. १. १८ ) इस दोषलक्षण के मोह में भी घट जाने से यह भी दोषों में ही परिगणित हैं ॥ ८ ॥ निमित्त-नैमित्तिकोपपादन से तुल्यजातियों का प्रतिषेध नहीं होता ॥ ९ ॥