न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० व्यक्ताद् घटनिष्पत्तेरप्रतिषेधः ॥ १३ ॥ न ब्रूमः—'सर्वं सर्वस्य कारणम्' इति, किन्तु 'यदुत्पद्यते व्यक्तं द्रव्यम्, तत्त- थाभूतादेवोत्पद्यते' इति । व्यक्तं च तन्मृद् द्रव्यं कपालसंज्ञकं यतो घट उत्पद्यते । न चैतन्निह्नुवानः क्वचिदभ्यनुज्ञां लब्धुमर्हतीति । तदेतत् तत्त्वम् ॥ १३ ॥ अतः परं प्रावादुकानां दृष्टयः प्रदर्श्यन्ते— शून्यतोपादाननिराकरणप्रकरणम् [ १४–१८ ] अभावाद्भावोत्पत्तिः, नानुपमृद्य प्रादुर्भावात् ? ॥ १४ ॥ असतः सदुत्पद्यते इत्ययं पक्षः, कस्मात् ? उपमृद्य प्रादुर्भावात् । उपमृद्य बीजमङ्कुर उत्पद्यते नानुपमृद्य, न चेद्बीजोपमर्दोऽङ्कुरकारणम्, अनुपमर्देऽपि बीजस्याङ्कुरोत्पत्तिः स्यादिति ? ॥ १४ ॥ अत्राभिधीयते— व्याघातादप्रयोगः ॥ १५ ॥ उपमृद्य प्रादुर्भावादित्ययुक्तः प्रयोगः, व्याघातात् । यदुपमृद्नाति न तदुपमृद्य व्यक्त से घटनिष्पति न देखे जाने से हमारा मत खण्डित नहीं होता ॥ १३ ॥ हम नहीं कहते कि 'सव सबके कारण हैं', किन्तु 'जो व्यक्त द्रव्य उत्पन्न होता है, वह वैसे ही व्यक्त कारण से उत्पन्न होता है । जैसे कपालसंज्ञक मृत्पदार्थ व्यक्त ही है, जिससे घटनिष्पत्ति हुई है । इस बात को छिपाकर आप हमसे अपनी बात नहीं मनवा सकते ॥ १३ ॥ आगे कुछ भिन्नमतावलम्बी दार्शनिकों के मत-मतान्तरों पर विचार किया जा रहा है [ सर्वप्रथम शून्यवादी बौद्धों के मत पर विचार किया जा रहा है ]— अभाव से भाव ( कार्य ) की उत्पत्ति होती है; क्योंकि विना विनाश हुए उत्पत्ति नहीं होती ॥ १४ ॥ 'असत् से सत् उत्पन्न होता है' यह भी एक दार्शनिक दृष्टि है । इसमें वे हेतु देते हैं कि विना विनाश हुए उत्पत्ति नहीं हो पाती । इसमें दृष्टान्त है—बीज के विनष्ट होने से ही उसमें से अंकुर उत्पन्न होता है न कि बिना विनष्ट हुए । यदि बीजविनाश अङ्कुर का कारण न होता तो भाण्डागार (गोदामों) में पड़े बीजों से भी उत्पत्ति हो जानी चाहिये ? ॥ १४ ॥ इसका उत्तर यह है— वचनविरोध होने से यह 'अभाव से भावोत्पत्ति' प्रयोग उचित नहीं ॥ १५ ॥ 'विनष्ट होकर प्रादुर्भूत होता है'—यह बात परस्पर विरुद्ध होने से अयुक्त है । जो