न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८. सू० ] प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २८१ प्रादुर्भवितुमर्हति; विद्यमानत्वात् । यच्च प्रादुर्भवति न तेनाप्रादुर्भूतेनाविद्य- मानेनोपमर्द इति ॥ १५ ॥ न; अतीतानागतयोः कारकशब्दप्रयोगात् ? ॥ १६ ॥ अतीते चानागते चाविद्यमाने कारक शब्दाः प्रयुज्यन्ते । पुत्रो जनिष्यते, जनिष्यमाणं पुत्रमभिनन्दति, पुत्रस्य जनिष्यमाणस्य नाम करोति; अभूत्कुम्भः, भिन्नं कुम्भमनुशोचति, भिन्नस्य कुम्भस्य कपालानि, अजाताः पुत्राः पितरं ताप- यन्ति—इति बहुलं भाक्ताः प्रयोगा दृश्यन्ते । का पुनरियं भक्तिः ? आनन्तर्यं भक्तिः, आनन्तर्यसामर्थ्यादुपमृद्य प्रादुर्भा- वार्थः—प्रादुर्भविष्यन्नङ्कुर उपमृद्नातीति भाक्तं कर्तृत्वमिति ॥ १६ ॥ न; विनष्टेभ्योऽनिष्पत्तेः ॥ १७ ॥ न विनष्टाद् बीजादङ्कुर उत्पद्यते इति तस्मान्नाभावाद्भावोत्पत्तिरिति ॥१७॥ क्रमनिर्देशादप्रतिषेधः ॥ १८ ॥ उपमर्दप्रादुर्भावयोः पौर्वापर्यनियमः क्रमः । स खल्वभावाद्भावोत्पत्तेर्हेतुर्नि- र्दिश्यते, स च न प्रतिषिध्यते इति । व्याहतव्यूहानामवयवानां पूर्वव्यूहनिवृत्तौ बीज का नाश करता है वह नष्ट होकर पुनः प्रादुर्भूत नहीं हो सकता; क्योंकि वह तो विद्यमान है । तथा जो प्रादुर्भूत होता है वह अप्रादुर्भूत द्रव्य अविद्यमान होने से बीज को विनष्ट कैसे करेगा ! ॥ १५ ॥ नहीं; अतीतानागतकाल में भी कारक शब्द का प्रयोग देखा जाता है ? ॥ १६ ॥ भूत तथा भविष्यत् में, जो कि वर्तमान नहीं है, उनके बारे में भी कारकशब्दों का प्रयोग दिखायी देता है ! जैसे—'उसको पुत्र होगा', 'होने वाले पुत्र के लिए वह खुशियाँ मना रहा हैं' 'पैदा होने वाले पुत्र का नाम रख रहा हैं'; या 'घट विनष्ट हो गया' 'विनष्ट घट के विषय में सोच रहा हैं' 'ये उस विनष्ट घट के खण्ड हैं' 'पैदा न हुए पुत्र पितृगण को कष्ट देते हैं'—आदि बहुत से भाक्त प्रयोग लोक में देखे जाते हैं । यह भक्ति क्या है ? आनन्तर्य (अव्यवधान) को भक्ति कहते हैं । इस आनन्तर्य के सामर्थ्य से ही 'विनष्ट होकर प्रादुर्भूत'—यह बोला जाता है । 'प्रादुर्भूत होनेवाला अङ्कुर ( बीज को ) विनष्ट कर रहा है, ऐसा यह आरोपित कर्तृ प्रयोग है ? ॥ १६ ॥ नहीं; क्योंकि विनष्ट से उत्पत्ति नहीं होती ॥ १७ ॥ विनष्ट बीज से अङ्कुर उत्पन्न नहीं हुआ करता, अतः अभाव से भाव की उत्पत्ति- वाला सिद्धान्त उचित नहीं ॥ १७ ॥ ( उक्त सिद्धान्त में ) क्रमनिर्देशक का प्रतिषेध नहीं ॥ १८ ॥ विनाश-प्रादुर्भाव में जो पौर्वापर्यनियम है वही 'क्रम' कहलाता है । यह क्रम उक्त वादी ने 'अभाव से भाव की उत्पत्ति' सिद्धान्त में हेतु बताया, उस क्रम को हम स्वीकार करते हैं । परन्तु उस क्रम के सहारे अभाव से भावोत्पत्ति हम नहीं मानते । किन्तु उस हेतु के CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri