न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९. सू० ] ईश्वरौपादानताप्रकरणम् २८३ न; पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्तेः ? ॥ २० ॥ ईश्वराधीना चेत् फलनिष्पत्तिः स्यादपि तर्हि पुरुषस्य समीहामन्तरेण फलं निष्पद्येतेति ? ॥ २० ॥ तत्कारितत्वादहेतुः ॥ २१ ॥ पुरुषकारमीश्वरोऽनुगृह्णाति, फलाय पुरुषस्य यतमानस्येश्वरः फलं सम्पादय- तोति । यदा न सम्पादयति तदा पुरुषकर्माफलं भवतीति । तस्मादीश्वरकारित- त्वादहेतुः—'पुरुषकर्माभावे फलानिष्पत्तेः' इति । गुणविशिष्टमात्मान्तरम् ईश्वरः, तस्यात्मकल्पात्कल्पान्तरानुपपत्तिः। अधर्म- मिथ्याज्ञानप्रमादहान्या धर्मज्ञानसमाधिसम्पदा च विशिष्टमात्मान्तरमीश्वरः, तस्य च धर्मसमाधिफलमणिमाद्यष्टविधमैश्वर्यम् । सङ्कल्पानुविधायी चास्य धर्मः । प्रत्यात्मवृत्तीन् धर्माधर्मसञ्चयान् पृथिव्यादीनि च भूतानि प्रवर्तयति । एवं च स्वकृताभ्यागमस्य लोपेन निर्माणप्राकाम्यमीश्वरस्य स्वकृतकर्मफलं वेदितव्यम् । शङ्का— पुरुषप्रयत्न के विना फलनिष्पत्ति न होने से उक्त कथन युक्त नहीं ? ॥ २० ॥ यदि ईश्वर ही सब कर्मफल देनेवाला हो तो पुरुषप्रयत्न के विना ही फल निष्पन्न हो जाने चाहिये, जबकि लोक में ऐसा देखा नहीं जाता ? ॥ २० ॥ उत्तर— पुरुषकर्म में ईश्वर के सहायक होने से आपका उक्त हेतु नहीं बनता ॥ २१ ॥ पुरुष-प्रयत्न के लिये ईश्वर अनुग्रह ( विनियोग ) करता है। अर्थात् फल के लिये प्रयत्न करते हुए पुरुष के फलप्राप्ति में ईश्वर अनुग्रह करता है, जब प्रयत्न करने पर भी अनुकूल फल नहीं मिलता तो समझना चाहिये ईश्वर का अनुग्रह नहीं है। अतः फल- प्राप्ति में ईश्वर के निमित्त होने से आपका यह हेतु युक्त नहीं कि 'पुरुष प्रयत्न के अभाव में फलनिष्पत्ति नहीं होती'; क्योंकि वहाँ भी ईश्वर कारण है। ईश्वर कौन है ? परमात्मा जीवात्मा से अन्य तथा ( सङ्ख्या-परिमाणादि ) गुणों से युक्त 'ईश्वर' है। यह आत्मजातीय होने से आत्मा की ही कोटि में आता है, अन्य कोटि में नहीं। इस में अधर्म, मिथ्याज्ञान, तथा प्रमाद नहीं होते तथा यह धर्म-ज्ञान-समाधि सम्पत्ति से युक्त होता है, अतः जीवात्मा से भिन्न है। ईश्वर में धर्मसमाधि के फलभूत अणिमादि आठों ऐश्वर्य रहते हैं। सङ्कल्प के अनुसार यह करने, न करने में समर्थ है। यह प्रत्येक आत्मा में रहने वाले धर्म अधर्म को, तथा पृथिव्यादि भूतों को प्रवर्त्तित करता रहता है। इस तरह पुरुष के स्वकृत सिद्धान्त का लोप करता हुआ यह ईश्वर जगन्निर्माण करना चाहता है। यह जगन्निर्माण भी पुरुष के स्वकृत कर्म-फल के लिये ही समझना चाहिये ।