न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० आप्तकल्पश्चायम् । यथा पिताऽप त्यानाम्, तथा पितृभूत ईश्वरो भूतानाम् । न चात्मकल्पादन्यः कल्पः सम्भवति । न तावदस्य बुद्धिं विना कश्चिद्धर्मो लिङ्ग- भूत: शक्य उपपादयितुम् । आगमाच्च द्रष्टा, बोद्धा, सर्वज्ञाता, ईश्वर इति । बुद्ध्यादिभिश्चात्मलिङ्गैर्निरुपाख्यमीश्वरं प्रत्यक्षानुमानागमविषयातीतं कः शक्त उपपादयितुम् । स्वकृताभ्यागमलोपेन च प्रवर्तमानस्यास्य, यदुक्तम् प्रति- बेधजातमकर्मनिमित्ते शरीरसर्गे, तत्सर्वं प्रसज्यते इति ! ॥ २१ ॥ आकस्मिकत्वनिराकरणप्रकरणम् [ २२-२४ ] अपर इदानीमाह— अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः, कण्टकतैक्ष्ण्यादिदर्शनात् ? ॥ २२ ॥ अनिमित्ता शरीराद्युत्पत्तिः, कस्मात् ? कण्टकतैक्ष्ण्यादिदर्शनात् । कण्टकस्य तैक्ष्ण्यम्, पर्वतधातूनां चित्रता, ग्राव्णां श्लक्ष्णता, निर्निमित्तं चोपादानं दृष्टम्, तथा शरीरादिसर्गोऽपीति ? ॥ २२ ॥ यह ईश्वर आप्त पुरुष की तरह है। जैसे पिता अपने पुत्र के लिये ( पुत्र चाहे या न चाहे ) निःस्वार्थ अनुग्रह करता रहता है, उसी तरह ईश्वर भी इस जगत् के प्राणियों पर अनुग्रह करता रहता है ! इस ईश्वर को आत्म-सजातीय मानने के अतिरिक्त दूसरी कोई कोटि सम्भव नहीं है। इसके अनुमान में बुद्धिगुण के बिना कोई अन्य धर्म लिङ्गभूत उपपन्न नहीं किया जा सकता। शास्त्र भी इसे प्रसंग-प्रसंग पर द्रष्टा, बोद्धा, सर्वज्ञ, ईश्वर—इन विशेषणों से अभिहित करता है। बुद्धिगुण के बिना ये सब विशेषण सम्भव नहीं है। बुद्धि आदि आत्म-गुणों के बिना कौन नीरूप ईश्वर का, जो कि प्रत्यक्ष-अनुमान तथा आगम प्रमाणों से अतीत है, उपपादन कर सकता है ! करुणावशात् स्वकृत सिद्धान्त का विलोप कर प्रवृत्त होने वाले पुरुष के सम्बन्ध में फल की अपेक्षा न करता हुआ यदि यह ईश्वर जगत्सृष्टि में प्रवृत्त होगा तो अकर्मनिमित्तक सृष्टिपक्ष में जो दोष हम पीछे ( ३. २. ७२ में ) कह आये हैं वे सब इसमें भी आ जायेंगे ! अतः यही मानना चाहिये कि परम- कारुणिक होता हुआ भी यह ईश्वर वस्तुस्वभाव के अनुसार विधान करता हुआ धर्मा- धर्म के सहारे से जगद्वैचित्र्य में निमित्तकारण है ॥ २१ ॥ अब दूसरा दार्शनिक ( चार्वाक ) कहता है— कण्टक की तीक्ष्णता आदि देखने से सभी भावों की उत्पत्ति अनैमित्तिक ही है ॥ २२ ॥ शरीरादि की भी उत्पत्ति अनैमित्तिक ही है; क्योंकि लोक में कण्टकादि के तैक्ष्ण्य में कोई निमित्त नहीं दिखायी देता जो उसे किसी साधन से इतना तीक्ष्ण बना दे। जैसे कण्टकादि की तीक्ष्णता, पर्वतों में निकलने वाली धातुओं के नाना प्रकार, स्फटिक आदि शिलाओं की श्लक्ष्णता बिना किसी निमित्त या उपादान कारण के सहारे देखी जाती है, उसी तरह शरीर की उत्पत्ति भी निर्निमित्तक मान लें ? ॥ २२ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri